अगर कुंभ मेले पर खर्च राशि का 0.1% हिस्सा भी दे देते तो 125 स्कूल बंद नहीं होते; SC जज की बड़ी टिप्पणी
Aug 24, 2026 09:26 pm ISTलाइव हिन्दुस्तान

SC के जज जस्टिस प्रसन्ना बी वराले ने क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने स्थानीय नगरपालिका और जिला परिषद के मराठी माध्यम के स्कूलों में 10वीं कक्षा तक पढ़ाई करने के अपने निजी अनुभव को भी साझा किया।

सर्वोच्च न्यायालय के जज जस्टिस प्रसन्ना बी वराले।
देश के सर्वोच्च न्यायालय के जज जस्टिस प्रसन्ना बी वराले ने हाल ही में भाजपा शासित महाराष्ट्र में शिक्षा पर घटते बजट पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने सरकारी मराठी माध्यम के स्कूलों के बंद होने और नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ या नासिक कुंभ मेले जैसे आयोजनों पर होने वाले भारी सरकारी खर्च के बीच अंतर को उजागर करते हुए इस बात की ओर इशारा किया कि नासिक कुंभ मेले पर हुए खर्च का अगर सिर्फ 0.01 फीसदी हिस्सा भी शिक्षा पर खर्च किया जाता तो राज्य के करीब 100 से 125 स्कूलों को बंद होने से बचाया जा सकता था।
जस्टिस वराले महाराष्ट्र के धुले जिले के एक हाई स्कूल में आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे, जहां वे कुछ साल तक छात्र रहे थे। यह कार्यक्रम 'स्मार्ट क्लास' के उद्घाटन के लिए आयोजित किया गया था। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस वराले ने अपने संबोधन में बताया कि कैसे अन्य पहलों के लिए सरकार द्वारा भारी फंड दिए जाने के बावजूद जरूरी शिक्षा से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर पर सरकारी खर्च के बारे में हालिया घोषणाओं का ज़िक्र किया।
तो राज्य भर में 100 से 125 स्कूल बंद नहीं होते
जस्टिस वराले ने कहा, "सरकार विभिन्न पहलों के लिए भारी फंड देने का दावा करती है। उप मुख्यमंत्री ने कुंभ मेले के लिए 32,000 करोड़ रुपये और मुख्यमंत्री ने 34,000 करोड़ रुपये का ज़िक्र किया। मैंने कहीं और पढ़ा कि एक कॉरिडोर प्रोजेक्ट के लिए 11,000 करोड़ रुपये दिए गए हैं।" उन्होंने आगे कहा कि इस तरह के खर्च का एक छोटा सा हिस्सा भी राज्य भर में संघर्ष कर रहे सैकड़ों शैक्षणिक संस्थानों को फिर से खड़ा कर सकता था। उन्होंने कहा, “मुझे सरकार द्वारा विभिन्न विकास पहलों पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने पर कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि, अगर इन हजारों करोड़ रुपये के फंड में से सरकार सिर्फ 0.1% यानी लगभग 32 करोड़ रुपये भी खर्च किया जाता तो राज्य भर में 100 से 125 मराठी मीडियम स्कूल बंद नहीं होते।”
क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा के महत्व पर भी जोर
जस्टिस प्रसन्ना बी वराले ने क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा के महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने स्थानीय नगरपालिका और जिला परिषद के मराठी माध्यम के स्कूलों में 10वीं कक्षा तक पढ़ाई करने के अपने निजी अनुभव को भी साझा किया। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई करने से उनके करियर में कभी कोई रुकावट नहीं आई, बल्कि इससे उनका नज़रिया और बेहतर हुआ। उन्होंने 13वीं सदी के संत-दार्शनिक संत ज्ञानेश्वर और 20वीं सदी के कवि सुरेश भट का ज़िक्र करते हुए कहा, “मराठी भाषा में सीखने से मुझे दूसरों के प्रति एक व्यापक और खुले विचारों वाला नजरिया मिला। मेरी भाषा ने मुझे भाईचारे की सीख दी।”
शिक्षा बजट आवंटन में आई कमी
जस्टिस वराले ने पिछले कुछ सालों में सरकारी बजट में शिक्षा के लिए आवंटित हिस्से में आई कमी की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि बढ़ती छात्र संख्या की जरूरतों को पूरा करने के लिए बजट आवंटन बढ़ाने के बजाय, राज्यों ने इसमें कटौती की जा रही है। उन्होंने कहा, "केंद्र स्तर पर, शिक्षा के लिए बजट आवंटन 8%, 12% और 11% के बीच हुआ करता था। ज़ाहिर है, छात्रों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह बजट बढ़ना चाहिए था। इसके उलट, बजट में आवंटित फंड कम हो गया है और कई सालों से यह 13% तक भी नहीं पहुँच पाया है।" उन्होंने ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की खराब हालत पर जोर दिया और एक हालिया घटना का हवाला देते हुए कहा कि अधिकारियों को बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राथमिकता देनी चाहिए।