'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' योजना में ₹1075 करोड़ खर्च, आखिर देश की बेटियों को क्या फायदा हुआ?

बेटा बचाओ बेटी पढ़ाओ स्कीम
‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना के 11 साल पूरे हो चुके हैं. सरकार ने योजना को लेकर पूछे गए सवालों का लोकसभा में जवाब दिया. जनवरी 2015 से जून 2026 तक इस योजना पर ₹1,075.37 करोड़ खर्च किए गए. इस दौरान देशभर में 78,305 अवेयरनेस प्रोग्राम आयोजित हुए, जिनमें 3.37 करोड़ से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया. योजना का मुख्य मकसद लड़कियों के जन्म को बढ़ावा देना, फीमेल फीटसाइड (कन्या भ्रूण हत्या) रोकना और बेटियों की पढ़ाई को बढ़ावा देना था. आंकड़ों के मुताबिक, जन्म के समय सेक्स रेशियो 2014-15 के 918 से बढ़कर 2025-26 में 929 हो गया, जबकि सेकेंडरी लेवल पर लड़कियों का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) 75.51% से बढ़कर 83.4% पहुंच गया. हालांकि सुधार हुआ है, लेकिन अभी भी प्राकृतिक सेक्स रेशियो और बेटियों को हायर एजुकेशन व रोजगार से जोड़ने की चुनौती बाकी है. अब यह योजना ‘मिशन शक्ति’ के तहत देश के सभी जिलों में लागू है और इसकी थर्ड पार्टी इवैल्यूएशन के जरिए निगरानी की जा रही है.
देश में बेटियों को बचाने और पढ़ाने के मकसद से शुरू की गई सरकार की सबसे चर्चित योजनाओं में से एक ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ (BBBP) को इस साल 11 साल पूरे हो गए हैं. इस मौके पर लोकसभा में कई सांसदों ने योजना की रिव्यू, इसके नतीजों और आगे की स्ट्रैटेजी को लेकर सरकार से सवाल पूछे. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री श्रीमती सावित्री ठाकुर ने 31 जुलाई 2026 को इन सवालों का लिखित जवाब दिया, जिसमें योजना की पूरी तस्वीर सामने आई.
कब और क्यों शुरू हुई थी योजना
‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना 22 जनवरी 2015 को शुरू की गई थी. यह महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की जॉइंट पहल है. इसका मकसद जेंडर बेस्ड भ्रूण चयन को रोकना, बेटियों के जन्म और जीवन को सुरक्षित बनाना और उनकी पढ़ाई सुनिश्चित करना है. योजना को लागू करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासन की है. यह पूरी तरह केंद्र प्रायोजित योजना है और केंद्र सरकार राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों को 100% फाइनेंशियल सपोर्ट देती है.

जन्म के समय सेक्स रेशियो में सुधार
सरकार के जवाब के मुताबिक, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के हेल्थ मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (HMIS) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार जन्म के समय सेक्स रेशियो में सुधार देखा गया है. यह 2014-15 में 918 था, जो 2025-26 में (अस्थायी आंकड़ों के अनुसार) बढ़कर 929 हो गया है. सरकार का कहना है कि इसमें PCPNDT Act के तहत स्वास्थ्य मंत्रालय की कार्रवाई की भी अहम भूमिका रही है.
पढ़ाई के मोर्चे पर भी योजना का असर दिखा है. शिक्षा मंत्रालय के UDISE आंकड़ों के मुताबिक, सेकेंडरी लेवल पर लड़कियों का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) 2014-15 के 75.51% से बढ़कर 2025-26 में 83.4% हो गया है. सरकार ने इसका श्रेय समग्र शिक्षा अभियान के तहत किए गए प्रयासों को भी दिया है.
मिशन शक्ति के तहत सभी जिलों तक पहुंच
15वें वित्त आयोग की अवधि में BBBP को मिशन शक्ति की SAMBAL ब्रांच का हिस्सा बनाया गया और अब यह देश के सभी जिलों में कई विभागों के साथ मिलकर लागू की जा रही है. सरकार के अनुसार, इसका मकसद जमीनी स्तर पर असर डालने वाली गतिविधियों पर ज्यादा खर्च करना था. मंत्रालय के मुताबिक, BBBP अब सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि एक नेशनल कैंपेन बन चुकी है, जिसमें सरकारी एजेंसियां, मीडिया, सिविल सोसायटी और आम लोग सभी जुड़े हैं.
बेहतर तरीके से योजना लागू करने के लिए 11 अक्टूबर 2022 को एक ऑपरेशनल मैनुअल जारी किया गया. यह मैनुअल राष्ट्रीय स्तर से लेकर जिला स्तर तक योजना बनाने, लागू करने, रिपोर्टिंग और मॉनिटरिंग करने वालों के लिए गाइड का काम करता है. इसमें हर महीने के लिए अलग-अलग थीम कैलेंडर भी बनाया गया है, ताकि पूरे साल बेटियों और उनके परिवारों से जुड़ाव बना रहे. राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को फंड खर्च करने में भी लचीलापन दिया गया है.

अब तक कितना खर्च हुआ
सरकार के जवाब के मुताबिक, योजना शुरू होने से जून 2026 तक इस पर कुल ₹1,075.37 करोड़ खर्च किए जा चुके हैं. इस दौरान देशभर में 78,305 गतिविधियां आयोजित हुईं, जिनमें 3.37 करोड़ से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया. राज्यों को यह छूट भी दी गई है कि वे कुल बजट का एक हिस्सा एडवरटाइजिंग और मीडिया प्रचार पर खर्च कर सकते हैं, ताकि योजना ज्यादा लोगों तक पहुंचे.
सरकार ने बताया कि मिशन शक्ति और उसके तहत चल रही BBBP का थर्ड पार्टी इवैल्यूएशन दो बार कराया गया है. पहला 2020 में और दूसरा 2025 में. दोनों बार यह इवैल्यूएशन नीति आयोग के जरिए कराया गया. इन रिपोर्टों में योजना की उपयोगिता, असर और लंबे समय तक चलने की क्षमता को संतोषजनक बताया गया.
चुनौती अब भी बरकरार
सरकार के आंकड़े सुधार की तस्वीर दिखाते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि असली चुनौती अभी भी बाकी है. जन्म के समय सेक्स रेशियो 929 तक पहुंचना सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह अभी भी प्राकृतिक स्तर (करीब 950) से काफी कम है. इसी तरह, स्कूलों में लड़कियों का दाखिला बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन उन्हें हायर एजुकेशन और रोजगार से जोड़ना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है.
11 साल के सफर में ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना ने समाज की सोच बदलने और सरकारी सिस्टम को बेटियों के मुद्दे पर ज्यादा संवेदनशील बनाने में अहम भूमिका निभाई है. लेकिन जब तक सेक्स रेशियो प्राकृतिक स्तर तक नहीं पहुंचता और बेटियों को पढ़ाई के साथ बेहतर आर्थिक मौके नहीं मिलते, तब तक इस योजना की असली सफलता पर सवाल बने रहेंगे.

देवेश कुमार पांडेय
देवेश कुमार पांडेय TV9 Hindi में बतौर सब-एडिटर काम कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के अमेठी के रहने वाले देवेश को राजनीति के अलावा इतिहास, साहित्य में दिलचस्पी है. साल 2024 में भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) के अमरावती कैंपस से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. देवेश को घूमना, लिखना, पढ़ना और पॉडकास्ट सुनना पसंद है.
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