12 साल में पहली बार, मंत्री के इस्तीफे की मांग पर झुकी सरकार, क्या इन वजहों से धर्मेंद्र प्रधान को देना पड़ा त्यागपत्र?

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कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का यह प्रदर्शन दिल्ली से निकलकर अन्य राज्यों तक पहुंच गया था। सीजेपी के आह्वान पर छात्र देशों की राजधानियों में विरोध-प्रदर्शन करने लगे थे। जयपुर, मुंबई, कोलकाता, पटना सहित देश के अन्य राजधानियों में छात्र एवं युवाओं ने सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन किया।

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PTI

शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान ने दिया इस्तीफा।

Dharmendra Pradhan Resignation: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से शनिवार को इस्तीफा दे दिया। सड़क पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और संसद में राहुल गांधी की अगुवाई में चल रहे विरोध प्रदर्शनों का दबाव रंग लाया और आखिरकार शिक्षा मंत्री को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। 2014 के बाद यह पहली बार है जब केंद्र की एनडीए सरकार में छात्र आंदोलन की वजह से किसी मंत्री का इस्तीफा हुआ है। यह लोकतंत्र और जनतंत्र की जीत है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने कहा कि 'यह युवाशक्ति की जीत है।' एक तरह से भारत में Gen Z का यह पहला बड़ा प्रदर्शन था जिसमें उनकी जीत हुई है। यह दिन भारतीय राजनीति में एक अलग महत्व रखेगा।

विपक्ष और सीजेपी की इस्तीफे की मांग पर सरकार की तरफ से जिस तरह के संकेत आ रहे थे, उससे तो यही लग रहा था कि सरकार यह मांग स्वीकार करने नहीं जा रही है लेकिन उसे इस्तीफे की मांग के आगे झुकते हुए प्रधान से इस्तीफा दिलाना पड़ा। अब चूंकि प्रधान का इस्तीफा हो गया है तो सरकार यह उम्मीद करेगी कि सीजेपी जंतर-मंतर से हटेगी और विपक्ष संसद की कार्यवाही में बाधा नहीं बनेगा क्योंकि सरकार पर प्रदर्शन खत्म कराने और संसद चलाने दोनों का दबाव बना हुआ था।

Abhijit Dipke

Abhijit Dipke

छात्र प्रदर्शन को बढ़ाना नहीं चाहती थी सरकार

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का यह प्रदर्शन दिल्ली से निकलकर अन्य राज्यों तक पहुंच गया था। सीजेपी के आह्वान पर छात्र देशों की राजधानियों में विरोध-प्रदर्शन करने लगे थे। जयपुर, मुंबई, कोलकाता, पटना सहित देश के अन्य राजधानियों में छात्र एवं युवाओं ने सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन किया। जंतर-मंतर का प्रदर्शन यदि लंबा खिंचता तो यह आंदोलन देशव्यापी हो जाता और इसे संभालने में सरकार को भारी चुनौती का सामना करना पड़ता। जाहिर है कि प्रदर्शन में जिस तरह असमाजिक एवं आपराधिक तत्व घुसपैठ कर जाते हैं, उससे प्रदर्शन हिंसक एवं उग्र हो जाता है। हिंसा एवं उपद्रव पर नियंत्रण पाने के लिए पुलिस एवं सुरक्षाबलों को सख्ती करनी पड़ती है। इस सख्ती से संदेश जाता कि सरकार छात्रों के प्रति असंवेदनशील और उनके खिलाफ है। विपक्ष उसकी छवि छात्र विरोधी के रूप में पेश करता। यही नहीं, आंदोलन के एक बार उग्र या हिंसक हो जाने पर उसे काबू में कर पाना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। छात्र और युवा अपने आंदोलनों एवं प्रदर्शनों से सरकारें बदल देते हैं। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में हुए आंदोलनों के नतीजे भी कहीं न कहीं सरकार के दिलो-दिमाग में रही होगी।

संसद में सरकार को पेश करने हैं अहम बिल

20 जुलाई से संसद के मानसून सत्र की शुरुआत हुई और इसी दिन सीजेपी ने भी 'चलो संसद' मार्च शुरू किया। मानसून सत्र के पहले दिन ही राहुल गांधी की अगुवाई में विपक्ष ने मांग कर दी कि वह NEET पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था में सुधार सहित अन्य विषयों की चर्चा में तभी भाग लेगा जब प्रधान का इस्तीफा होगा। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रधानवासी आवास के बाहर धरने पर बैठ गए। संसद की कार्यवाही बार-बार स्थगित हो रही है, इससे कोई कामकाज नहीं हो पाया। 24 अगस्त तक संसद की कार्यवाही विपक्ष के हंगामे और शोरशराबे की भेंट चढ़ता रही। विपक्ष ने शर्त रख दी कि जब तक प्रधान का इस्तीफा नहीं होगा, तब तक संसद नहीं चल पाएगी। चूंकि, इस मानसून सत्र में सरकार को परिसीमन सहित कई अन्य महत्वपूर्ण विधेयक पेश करने हैं, ऐसे में जरूरी है कि संसद चले और विपक्ष की उसमें भागीदारी हो।

Rahul Gandhi

Rahul Gandhi

विश्व में भारत की छवि को लग रहा था धक्का

सीजेपी के विरोध प्रदर्शनों की कवरेज अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी हो रही थी। इससे यह संदेश जा रहा था कि सरकार छात्रों की मांग नहीं सुन रही है। सोशल मीडिया के इस दौर में कोई भी चीज छिपी नहीं रह सकती। भारत में प्रदर्शन से जुड़ी हर एक चीज इंस्टाग्राम, X सहित अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के जरिए दुनिया के कोने-कोने में पहुंच रही थी। लोग पेपर लीक की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे थे। इसमें मंत्री का इस्तीफा भी शामिल था। यानी इतनी बड़ी परीक्षा का पेपर लीक हुआ और मंत्री का इस्तीफा नहीं हुआ, यह बात दुनिया भर में लोगों को चौंका रही थी। छात्रों का प्रदर्शन यदि समाप्त नहीं होता तो सरकार पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता जाता।

तो सरकार इसलिए नहीं ले रही थी प्रधान का इस्तीफा?

एक्सपर्ट का कहना है कि सवाल केवल प्रधान के इस्तीफे भर का नहीं है। सरकार को लगता था कि प्रधान का इस्तीफा आगे उसके लिए कई मुसीबतें और चुनौतियां लेकर आ सकता है। प्रधान का इस्तीफा सरकार क्यों नहीं ले रही है। इस बारे में इंडियन एक्सप्रेस ने वरिष्ठ मंत्रियों की बैठक से जुड़े सूत्रों के हवाले से कहा कि 'सरकार किसी समहू अथवा प्रदर्शनकारी संगठन के दबाव के आगे झुकते हुए दिखना नहीं चाहती। कल कोई और समूह आगे आ सकता है और अन्य मंत्रियों यहां तक कि प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांग सकता है। एक बार शुरू हो जाने पर इसका अंत नहीं होगा।' लेकिन इन अटकलों और बहसों को पीछे छोड़ते हुए सरकार ने प्रधान का इस्तीफा कराया। जाहिर है कि इस पूरे प्रदर्शन के राजनीतिक नफे-नुकसान का आकलन करने के बाद ही सरकार ने इस्तीफे पर फैसला किया है।