महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल का कार्यकाल 13 जनवरी तक बढ़ा: 44 साल से चल रहा छत्तीसगढ़-ओडिशा के बीच जल विवाद छह माह में सुलझेगा - Raipur News

रायपुर36 मिनट पहले

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छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच पिछले 44 साल से चल रहे महानदी जल विवाद का फैसला अब अंतिम दौर में पहुंच गया है। केंद्र सरकार ने महानदी जल विवाद ट्रिब्यूनल का कार्यकाल 13 जनवरी 2027 तक बढ़ा दिया है। इसके साथ ही विवाद पर फैसला छह महीने में आने की संभावना है। इस अवधि में ट्रिब्यूनल को शेष प्रक्रिया पूरी कर अपनी अंतिम रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपनी है।

1983 में तत्कालीन मध्यप्रदेश और ओडिशा के बीच शुरू हुआ यह विवाद आज छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच सबसे बड़े अंतरराज्यीय जल विवाद के रूप में खड़ा है। 2018 में ट्रिब्यूनल के गठन के बाद दोनों राज्यों ने हजारों पन्नों के दस्तावेज, जल उपलब्धता के आंकड़े, सिंचाई और औद्योगिक जरूरतों का ब्यौरा तथा तकनीकी रिपोर्टें पेश कीं। ट्रिब्यूनल की टीम ने रायपुर, बिलासपुर, कोरबा सहित दोनों राज्यों की प्रमुख परियोजनाओं का स्थल निरीक्षण भी किया। सूत्रों के अनुसार ट्रिब्यूनल के समक्ष दोनों पक्षों की दलीलें लगभग पूरी हो चुकी हैं। अब शेष प्रक्रियाओं के बाद अंतिम रिपोर्ट तैयार की जानी है।

यही वजह है कि कार्यकाल बढ़ने को केवल औपचारिक विस्तार नहीं, बल्कि अंतिम निर्णय की तैयारी माना जा रहा है। जल्द आने वाले एक निर्णय की एक बड़ी वजह है दोनों राज्य और केंद्र में भाजपा की सरकार। अब तक ओडिशा में बीजद की सरकार थी। छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस की सरकार रही। इस वजह से विवाद पर निर्णय में मुश्किलें आ रही थी। अब दोनों राज्यों के अलावा केंद्र में भी भाजपा की सरकार है। विवाद पर जल्द फैसले के लिए इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

फैसले से पहले क्या-क्या बाकी

  • अंतिम तकनीकी परीक्षण और दस्तावेजों की समीक्षा।
  • आवश्यक होने पर दोनों राज्यों से अतिरिक्त स्पष्टीकरण।
  • अंतिम रिपोर्ट का मसौदा तैयार करना।
  • रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपना।
  • केंद्र की अधिसूचना के बाद निर्णय लागू होने की प्रक्रिया।

छत्तीसगढ़ के लिए अहम है फैसला

  • सिंचाई परियोजनाओं को दीर्घकालिक स्पष्टता मिलेगी।
  • भविष्य के बैराज और जलाशयों पर नीति तय होगी।
  • उद्योगों और पेयजल योजनाओं के लिए जल आवंटन का आधार मजबूत होगा।
  • लंबे समय से चले आ रहे अंतरराज्यीय विवाद के समाधान की दिशा साफ होगी।

फैसले का पड़ेगा व्यापक असर: इस फैसले का असर सिर्फ पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं रहेगा। छत्तीसगढ़ में सिंचाई विस्तार, नए बैराज, औद्योगिक जल आवंटन और भविष्य की जल परियोजनाओं की दिशा भी इसी पर निर्भर करेगी। वहीं ओडिशा के लिए हीराकुंड बांध, सिंचाई व्यवस्था और डाउनस्ट्रीम जल प्रवाह का सवाल इससे जुड़ा हुआ है। जल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतिम निर्णय में जल हिस्सेदारी, पर्यावरणीय प्रवाह और भविष्य की परियोजनाओं के लिए स्पष्ट मानक तय होते हैं तो दशकों पुराना विवाद स्थायी रूप से सुलझ सकता है।

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