सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनने के बाद कितना बदला इलाहाबाद विश्वविद्यालय? 139 साल का हुआ पूरब का ऑक्सफोर्ड

भारत में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी को ‘पूरब का ऑक्सफोर्ड’ कहा जाता है. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी ने 23 सितंबर को अपनी स्थापना के 139 साल पूरे कर लिए हैं. यानी कि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी अब 139 साल की हो गई है. 18वीं सदी के अंत में देश में हायर एजुकेशन को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई इलाहाबाद यूनिवर्सिटी मौजूदा समय में एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी के तौर पर देश की प्रमुख हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूट के तौर पर सेवा दे रही है.

आइए, इसी कड़ी में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की स्थापना, सफल यात्रा और एलुमनाई पर एक नजर डालते हैं. साथ ही जानते हैं कि सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनने के बाद पूरब का ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में क्या बदलाव हुआ है.

1987 में हुई स्थापना, देश का चौथी पुरानी यूनिवर्सिटी

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की स्थापना 23 सितंबर 1987 को संयुक्त प्रांत के लेफ़्टिनेंट गवर्नर सर विलियम म्योर के प्रयासों से हुई थी. ये देश की चौथा माॅर्डन यूनिवर्सिटी है. इससे पहले कलकत्ता, बाॅम्बे और मद्रास में यूनिवर्सिटी की स्थापना की गई थी. इससे पहले ये म्योर सेंट्रल कॉलेज के तौर पर संचालित होता था, जिसकी स्थापना 1872 में की गई थी.इलाहाबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी अपने ऐतिहासिक भवन का डिजाइन के लिए जाना जाता है, जिसेप्रसिद्ध वास्तुविद् सर विलियम एमर्सन ने तैयार किया था.

लीडर्स की फैक्ट्री और साहित्यकारों की शिल्पी है इलाहाबाद यूनिवर्सिटी

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की सफल यात्रा का अंदाजा उसके एलुमनाई यानी पूर्व छात्रों की सफलता को देखकर ही लगाया जा सकता है. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी को लीडर्स की फैक्ट्री और साहित्यकारों की शिल्पी माना जाता है. आजादी से पूर्व इलाहाबाद यूनिवर्सिटी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था, जो आजादी के बाद राजनीतिक का सेंटर बना. इसी कड़ी में देश के कई राजनेताओं को इलाहाबाद यूनिवर्सिटी ने ही तैयार किया है. इसके साथ ही कई IAS और साहित्यकार भी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी ने तैयार किए है.

इसमें राजनेताओं की बात करें तो भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त की थी, जबकि पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने भी यूनिवर्सिटी से शिक्षा ग्रहण की थी. इसी तरह पंडित गोविंद वल्लभ पंत, नारायण दत्त तिवारी और अर्जुन सिंह जैसे नेताओं ने भी यूनिवर्सिटी से ही शिक्षा ग्रहण की थी.वहीं भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा और केएन सिंह समेत महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन, फिराक गोरखपुरी, डॉ. रामकुमार वर्मा, धर्मवीर भारती, भगवती चरण वर्मा और कमलेश्वर ने भी यूनिवर्सिटी से शिक्षा ग्रहण की थी.

2025 में बना सेंट्रल यूनिवर्सिटी, तब से अब तक क्या बदला?

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी को भारत सरकार ने 14 जुलाई 2025 को सेंट्रल यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया था. सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनने के बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में कई बदलाव दर्ज किए हैं. इसमें अकादमिक सुधार, नेशनल रैंकिंग, एडमिशन प्रोसेस, रिक्रूटमेंट, बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े बदलाव शामिल है. आइए, इनके बारे में संक्षेप में जानते हैं.

NAAC A+ ग्रेड: सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनने के बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अकादमिक सुधार दर्ज कियाह है. तो वहीं इसी कड़ी में राष्ट्रीय रैंकिंग भी यूनिवर्सिटी को मिली है. NAAC ने यूनिवर्सिटी A+ ग्रेड मिला दिया है. वहीं सेंट्रल यूनिवर्सिटी ने पहले नई शिक्षा नीति 2020 को अपनाया, जोअकादमिक सुधार के लिए महत्वपूर्ण रही है.

नियुक्तियां: सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनने के बाद बनने के बाद बड़ी संख्या में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में नियुक्तियां हुई हैं. इसमें बीते एक दशक में ही 400 नए शिक्षकों की नियुक्ति, 280 से अधिक शिक्षकों के प्रमोशन और 636 गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती की गई है.

बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट: सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनने के बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी को मिलने वाले बजट में बढ़ोतरी हुई है. इसे यूनिवर्सिटी में नया इंफास्ट्रक्चर डेवलेप हो रहा है. इसमें नव विकसित मुइर सेंट्रल कॉलेज का सेंट्रल ब्लॉक, साइंस फैकल्टी में नए डे-केयर सेंटर, आधुनिक लैब, सेंट्रल लाइब्रेरी का डिजिटलीकरण शामिल है.

एडमिशन : सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनने के बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के एडमिशन प्रोसेस में व्यापक बदलाव हुआ है. अब इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में CUET स्कोर के आधार पर एडमिशन मिलता है. इससे देशभर के स्टूडेंट्स के लिए इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेना आसान हुआ है.

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