मिसिर का 17 साल का ‘अभेद्य' सारंडा-कोल्हान किला ढहा: जॉब के लिए नहीं दे सका रिश्वत तो बन गया माओवादी, 100 से अधिक केस दर्ज - Ranchi News
1986 में प्राथमिक शिक्षक की नौकरी के लिए मांगे गए आठ हजार रुपए की कथित रिश्वत नहीं दे पाने का गुस्सा मिसिर बेसरा को माओवादी संगठन तक ले गया। करीब 40 साल बाद एक करोड़ रुपए का इनामी भाकपा(माओवादी) का पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर अब पुल
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कभी झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के त्रि-सीमांत सारंडा और कोल्हान के जंगलों में जिस माओवादी का प्रभाव था, उसका 17 साल पुराना अभेद्य गढ़ अब पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि मिसिर की गिरफ्तारी सारंडा और कोल्हान क्षेत्र में माओवादी नेटवर्क के लिए बड़ा झटका है।
लंबे समय तक जिस क्षेत्र को संगठन का मजबूत गढ़ माना जाता था, वहां सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई से माओवादियों का प्रभाव लगातार कमजोर हुआ है।
तीन-स्तरीय सुरक्षा घेरा, जिसे भेदना आसान नहीं था मिसिर बेसरा सिर्फ एक माओवादी नेता नहीं, बल्कि संगठन के सबसे सुरक्षित ठिकानों में से एक का प्रमुख संचालक माना जाता था। उसकी सुरक्षा के लिए तीन-स्तरीय सुरक्षा चक्र बनाया गया था।
बाहरी घेरा (आउटर रिंग) : कोल्हान और सारंडा के प्रवेश मार्गों पर अत्याधुनिक हथियारों से लैस जन-मिलिशिया और सेंट्री पोस्ट तैनात रहते थे। रास्तों को आईईडी और स्पाइक होल्स से सुरक्षित किया गया था। मध्य घेरा (मिडिल रिंग) : ''अनल मांझी'' और ''अनमोल'' जैसे दुर्दांत कमांडरों के दस्ते हर गतिविधि पर नजर रखते थे और किसी भी हलचल पर सुरक्षा बलों का मुकाबला करते थे। भीतरी घेरा (इनर रिंग) : 10-12 चुनिंदा प्रशिक्षित बॉडीगार्ड 24 घंटे ऑटोमैटिक हथियारों के साथ 100 मीटर के दायरे में उसकी सुरक्षा में तैनात रहते थे।

गिरिडीह के पीरटांड़ स्थित मदनडीह निवासी मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर भाकपा माओवादी पोलित ब्यूरो सदस्य है।
रणनीति बदलकर पुलिस ने कमजोर किया सुरक्षा कवच सुरक्षा बलों ने सीधे टकराव के बजाय पिछले दो वर्षों में ऑपरेशन मेगाहातुबुरु और ऑपरेशन कोल्हान के तहत मिसिर बेसरा के बाहरी रसद नेटवर्क, आईईडी तंत्र और सुरक्षा घेरे को व्यवस्थित तरीके से कमजोर किया। धीरे-धीरे उसकी सुरक्षा ढाल टूटती चली गई और संगठन का प्रभाव भी घटने लगा।
2007 में गिरफ्तारी, 2009 में पुलिस हिरासत से दुस्साहसिक फरारी मिसिर बेसरा का आपराधिक इतिहास कई चर्चित घटनाओं से जुड़ा रहा है। 2007:झारखंड पुलिस और केंद्रीय बलों ने एक गुप्त अभियान में उसे पहली बार गिरफ्तार किया। 23 जून 2009:चाईबासा कोर्ट में पेशी के दौरान माओवादी दस्ते ने पुलिस वाहन पर हमला कर ताबड़तोड़ फायरिंग की और उसे पुलिस हिरासत से छुड़ा लिया। इस फरारी के बाद उसने सारंडा और कोल्हान के जंगलों को अपना स्थायी ठिकाना बना लिया और लंबे समय तक संगठन की गतिविधियों का संचालन करता रहा। पीरटांड़ के मदनडीह निवासी मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर भाकपा माओवादी पोलित ब्यूरो सदस्य है। उस पर हत्या, आईईडी ब्लास्ट, पुलिस पर हमला और आर्म्स एक्ट के 100 से ज्यादा मामले दर्ज हैं। सारंडा, कोल्हान, पारसनाथ और ट्राइजंक्शन (झारखंड-ओडिशा-बंगाल) उसका मुख्य कार्यक्षेत्र था। 2003-04 में पश्चिम सिंहभूम के बिटकिलसोय और बलिबा में आईईडी ब्लास्ट की साजिश उसी ने रची थी, जिसमें 55 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे। 2009 में बिहार के लखीसराय कोर्ट परिसर से सशस्त्र नक्सलियों ने पुलिस पर हमला कर उसे छुड़ा लिया था, इसके बाद से ही वह फरार था।

गिरफ्तार होने के बाद मिसिर बेसरा।
बॉडीगार्ड्स ने छोड़ा साथ, कैडर भी हो गए थे अलग पिछले कुछ महीनों में संगठन के भीतर कई बड़े बदलाव हुए। शीर्ष कमांडर अनल मांझी के मारे जाने के बाद मिसिर बेसरा का सुरक्षा तंत्र कमजोर पड़ गया। लगातार पुलिस कैंप स्थापित होने और रसद आपूर्ति बाधित होने से उसके दस्ते के 16 से 18 माओवादी कैडरों ने आत्मसमर्पण कर दिया।
संसाधन घटने और गिरफ्तारी के बढ़ते खतरे के कारण उसके कई बॉडीगार्ड भी संगठन छोड़कर भाग निकले। अलग-थलग पड़ चुके मिसिर बेसरा को आखिरकार झारखंड पुलिस और सीआरपीएफ की संयुक्त टीम ने गिरफ्तार कर लिया।