समय से पहले मानसून की विदाई, 1901 के बाद सबसे गर्म अगस्त; खरीफ की फसलों का क्या होगा? - early monsoon withdrawal heatwave threaten kharif crops
सितंबर में सामान्य से कम बारिश और अधिक तापमान से खरीफ फसलों पर दोहरा दबाव पड़ने का अनुमान है।

मानसून की समय से पहले विदाई से खरीफ फसलें प्रभावित होंगी

समय कम है?
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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। मानसून के आखिरी महीने में भी मौसम किसानों की मुश्किल बढ़ाने वाला है। सितंबर में देश में औसतन 167.9 मिलीमीटर बारिश होती है। इस बार इसके मुकाबले बारिश 91 प्रतिशत के आसपास रहने का अनुमान है। यानी मानसून की विदाई के आखिरी महीने में भी बारिश में करीब नौ प्रतिशत या उससे अधिक की कमी रह सकती है।
दूसरी चिंता गर्मी की है। सितंबर में देश के ज्यादातर हिस्सों में अधिकतम तापमान सामान्य से ऊपर रह सकता है। खेतों में नमी घटेगी तो तापमान में वृद्धि से फसलों पर दोहरा दबाव पड़ेगा।
इस बीच, निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट ने मानसून की वापसी सामान्य समय से करीब एक सप्ताह पहले शुरू होने का अनुमान जताया है। गुजरात एवं राजस्थान के कुछ हिस्सों से मानसून की विदाई सामान्य तौर पर 17 सितंबर से शुरू होती है।
खरीफ की खड़ी फसलों के लिए सितंबर बेहद अहम होता है। धान, मक्का, सोयाबीन एवं कपास की फसलें इस समय परिपक्व होने के दौर में होती हैं। इन्हें इस समय पर्याप्त नमी की जरूरत होती है। बारिश में लंबा अंतर आया तो उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
अगस्त में 16 प्रतिशत कम बारिश
अगस्त में भी देश में सामान्य से करीब 16 प्रतिशत कम बारिश हुई है। ऐसे में सितंबर की कमजोर बारिश मिट्टी में बची नमी और जलस्रोतों पर दबाव बढ़ा सकती है। किसानों के लिए अब बारिश की कुल मात्रा से ज्यादा उसका समय और वितरण महत्वपूर्ण होगा।
मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के महानिदेशक डा. मृत्युंजय महापात्रा ने बताया कि सितंबर में भी मौसम की चुनौती एक जैसी नहीं रहेगी। एक हिस्से में बारिश की कमी परेशान करेगी तो दूसरे हिस्से में तेज बारिश खेतों के लिए खतरा बनेगी।
बंगाल की खाड़ी में बने कम दबाव के क्षेत्र के कारण सितंबर की शुरुआत में बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं।
किन राज्यों में हुई भारी बारिश?
ओडिशा और छत्तीसगढ़ में कुछ जगह भारी से बहुत भारी बारिश का खतरा भी है। जाहिर है, कम समय में ज्यादा बारिश खेती के लिए नुकसानदेह है। धान, मक्का, तिल, अरहर और सब्जियों के खेतों में पानी जमा होने से जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है।
खेतों में लंबे समय तक पानी रहने से फसलें प्रभावित होंगी। जहां बारिश कम होगी, वहां मिट्टी तेजी से सूख सकती है। इससे रबी फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है। यानी किसान को पहले जलभराव और फिर नमी की कमी, दोनों का सामना करना पड़ सकता है।
अगस्त ने भी मौसम की बदलती तस्वीर
आईएमडी के अनुसार अगस्त ने भी मौसम की बदलती तस्वीर के संकेत दिए हैं। अगस्त 2026 का औसत तापमान 28.01 डिग्री सेल्सियस रहा, जो 1901 के बाद सबसे अधिक है। औसत न्यूनतम तापमान भी 24.36 डिग्री सेल्सियस रहा, जो 1901 के बाद अगस्त का सबसे अधिक न्यूनतम तापमान है।
सामान्य औसत तापमान 27.34 डिग्री और सामान्य न्यूनतम तापमान 23.68 डिग्री सेल्सियस है। यानी अगस्त में दिन के साथ रात का तापमान भी सामान्य से ऊपर रहा।
बारिश के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। अगस्त में देश में बारिश सामान्य से करीब 16 प्रतिशत कम रही। इसके साथ ही एक जून से शुरू हुए पूरे मानसून सीजन की बारिश में भी कमी बढ़ी है। प्रशांत महासागर में अलनीनो की स्थिति मानसून की कमजोर गतिविधि का एक प्रमुख कारण है।
सितंबर में इसे और मजबूत होने का अनुमान है। इसका असर मानसून की चाल पर पड़ सकता है। जाहिर है, इस बार खेती पर मानसून का असर सिर्फ इस बात से तय नहीं होगा कि कितनी बारिश हुई। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा कि बारिश कब, कहां और कितनी तेज हुई।
1901 के बाद सबसे गर्म अगस्त
मौसम विभाग ने बताया कि अगस्त का महीना, जिसमें देश के कुछ हिस्सों में अच्छी बारिश के बावजूद कुल मासिक बारिश में 16 प्रतिशत से ज्यादा की कमी दर्ज की गई, 1901 के बाद से भारत में सबसे गर्म अगस्त रहा।इस दौरान औसत तापमान 28.01 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।
इलाके के हिसाब से देखें तो, दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में अगस्त का महीना 1901 के बाद दूसरा सबसे गर्म अगस्त था, जबकि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के लिए यह तीसरा सबसे गर्म और उत्तर-पश्चिम भारत के लिए पिछले 126 सालों में पांचवां सबसे गर्म अगस्त रहा।