द ग्रेट इंडियन स्लीप क्राइसिस: 1947 से 2026 तक, इतनी बदतर कैसे हो गई हम भारतीयों की नींद?

हेल्थ

  • Authored by: सुनीत सिंह
  • Updated Aug 15, 2026, 01:32 PM IST

फिटबिट समेत दूसरी ग्लोबल स्लीप ट्रैकिंग स्टडीज के आंकड़ों की मानें तो भारतीय औसतन 6 से 6.5 घंटे ही सो पाते हैं। यह एशिया में जापान के बाद सबसे कम है।

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पिछले 80 सालों में कितनी खराब हो चुकी है हम भारतीयों की नींद

याद कीजिए सन 1947 का भारत। देश नया-नया आजाद हुआ था। तब भारत कृषि प्रधान देश था। देश की करीब 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी गांवों में रहती थी। तब लोगों की दिनचर्या सूरज से तय होती थी। सूरज उगा, तो लोग जागे। सूरज ढला, तो काम बंद। बिजली की रोशनी बहुत कम घरों तक पहुंची थी। रात का मतलब सिर्फ अंधेरा और आराम था। लोग औसतन 8 से 9 घंटे की गहरी नींद सोते थे।

अब साल 2026 में आ जाइए। भारत की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। हमारे शहर 24 घंटे जगमगा रहे हैं। काम की शिफ्ट्स रात-दिन चल रही हैं। हाथ में स्मार्टफोन है। कमरे में ट्यूबलाइट और एलईडी हैं। इस विकास की एक बड़ी कीमत हमने चुकाई है। वह कीमत है- हमारी नींद।

हम कितने स्लीप डिप्राइव्ड हो चुके हैं?

आज भारत दुनिया के सबसे खराब नींद लेने वाले देशों की कतार में बहुत आगे खड़ा है। फिटबिट समेत दूसरी ग्लोबल स्लीप ट्रैकिंग स्टडीज के आंकड़ों की मानें तो भारतीय औसतन 6 से 6.5 घंटे ही सो पाते हैं। यह एशिया में जापान के बाद सबसे कम है।

देश की राजधानी दिल्ली में AIIMS के पल्मोनोलॉजी एंड स्लीप मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञों के मुताबिक, पिछले तीस-चालीस सालों में भारतीयों की नींद का पैटर्न बेहद खतरनाक तरीके से बिगड़ा है। एम्स के स्लीप स्टडी क्लिनिक में आने वाले मरीजों में से लगभग 30 से 40 प्रतिशत मरीज इंसोम्निया यानी अनिद्रा या ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एप्निया से पीड़ित पाए जाते हैं।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) के आंकड़ों का अगर हम अपनी जीवनशैली से तुलनात्मक अध्ययन करें, तो शहरीकरण के साथ-साथ मोटोपा, हाइपरटेंशन और नींद न आने की समस्याएं एक साथ तेजी से बढ़ी हैं।

कितनी बदल गई है हमारी सोने की आदत

कितनी बदल गई है हमारी सोने की आदत

हमारे बायोलॉजिकल क्लॉक का विज्ञान

हम इंसानों का शरीर एक प्राकृतिक घड़ी से चलता है। इसे 'सर्केडियन रिदम' (Circadian Rhythm) कहते हैं। यह घड़ी सूरज की रोशनी से सिंक होती है। जब अंधेरा होता है, तो दिमाग में मेलाटोनिन नाम का हार्मोन रिलीज होता है। यह हार्मोन हमें बताता है कि अब सोने का समय हो गया है। 1947 में यह सिस्टम बिल्कुल प्राकृतिक था।

आज क्या हो रहा है?

रात को 11 बजे भी हमारे कमरे में तेज रोशनी होती है। हमारे चेहरे के ठीक सामने मोबाइल की ब्लू लाइट होती है। यह नीली रोशनी दिमाग को धोखा देती है। दिमाग को लगता है कि अभी दिन ही है। मेलाटोनिन का बनना रुक जाता है। नतीजा? नींद आंखों से दूर चली जाती है।

स्लीप ऑनसेट लैटेंसी का बढ़ता गणित

स्लीप मेडिसिन में एक शब्द इस्तेमाल होता है- स्लीप ऑनसेट लैटेंसी। इसका सीधा सा मतलब है कि बिस्तर पर लेटने के बाद आपको सोने में कितना समय लगता है? एक्सपर्ट्स के मुताबिक किसी भी स्वस्थ इंसान के लिए यह समय 10 से 20 मिनट होना चाहिए।

आधुनिक भारतीय लाइफस्टाइल ने इस गणित को बिगाड़ दिया है। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि अब लोगों को बिस्तर पर जाने के बाद सोने में 45 मिनट से 1.5 घंटे तक का समय लग रहा है। बहुत से लोग तो बिस्तर पर लेटकर रील स्क्रॉल करते हैं। इसे मेडिकल साइंस की भाषा में 'बेडटाइम प्रोक्रास्टिनेशन' कहा जाता है। यानी सोने के समय को जानबूझकर टालना।

हमने खुद बिगाड़ दिया है अपना बायोलॉजिकल क्लॉक

हमने खुद बिगाड़ दिया है अपना बायोलॉजिकल क्लॉक

इंडियन जेनेटिक्स और मॉडर्न लाइफस्टाइल का कॉकटेल

विज्ञान कहता है कि हम भारतीयों के शरीर की आनुवंशिक संरचना (जेनेटिक्स) में पेट के आसपास चर्बी जमा होने की प्रवृत्ति ज्यादा होती है। कम नींद लेने से शरीर में कोर्टिसोल नाम का स्ट्रेस हार्मोन बढ़ता है। इससे इंसुलिन रेजिस्टेंस पैदा होता है। नतीजतन, नींद की कमी हम भारतीयों में डायबिटीज और कार्डियक अरेस्ट के खतरे को दोगुना कर देती है।

1947 में हमारे पास स्वास्थ्य को लेकर कई तरह की चुनौतियां थीं। सबसे बड़ी ये थी कि तब हम संक्रामक बीमारियों से जूझ रहे थे। आज 2026 में हमारी सबसे बड़ी चुनौती ये लाइफस्टाइल डिसीज हैं। हमारी जीवनशैली से उपजी इन बीमारिये के चक्रव्यूह के केंद्र में हमारी खराब नींद ही है।

कैसे सुधारें अपनी नींद

विशेषज्ञों का मानना है कि हमें अपनी नींद को लेकर एक नया 'स्वराज्य' शुरू करना होगा। जिस तरह स्वराज का अर्थ अपना नियंत्रण होता है, ठीक उसी तरह अपनी दिनचर्या और नींद पर अपना नियंत्रण पाना ही 'नींद का स्वराज्य' है। इसके लिए तीन छोटे लेकिन पुख्ता नियम जरूरी हैं:

डिजिटल कर्फ्यू

आज के समय में नींद खराब होने का सबसे बड़ा कारण हमारी स्क्रीन है। सोने से ठीक पहले तक मोबाइल स्क्रॉल करना, टीवी देखना या लैपटॉप पर काम करना मस्तिष्क को गलत संकेत देता है। सोने से कम से कम 1 से 2 घंटे पहले सभी डिजिटल गैजेट्स को बंद कर दें। कोई किताब पढ़ें, हल्का संगीत सुनें या फिर ध्यान लगाएं।

फिक्स स्लीप टाइम

रोजाना एक ही समय पर सोने और एक ही समय पर जागने की आदत डालें। जब आप अपने सोने का समय बार-बार बदलते हैं, तो शरीर का यह प्राकृतिक चक्र बिगड़ जाता है। बहुत से लोगों की आदत है कि वो वर्किंग डेज में जल्दी उठते हैं और शनिवार-रविवार को देर तक सोते हैं। इसे 'सोशल जेटलैग' कहा जाता है। वीकेंड पर भी अपने सोने-जागने का समय न बदलें ताकि शरीर की लय बनी रहे।

स्लीप एनवायरनमेंट

आपका बेडरूम केवल सोने के लिए होना चाहिए, काम या तनाव के लिए नहीं। कमरे में अंधेरा, शांति और आरामदायक तापमान होना बेहद जरूरी है।

सोने से पहले की आदतें

सोने से 4-6 घंटे पहले कैफीन (चाय, कॉफी) या भारी भोजन का सेवन करने से बचें। रात का खाना हल्का और सुपाच्य होना चाहिए।

इन नियमों का पालन करके आप अपनी नींद की क्वालिटी तो सुधारेंगे ही, पूरे दिन ऊर्जावान और तनावमुक्त भी महसूस करेंगे।

आजादी के 8 दशक बाद अब समय आ गया है कि हम यह समझें कि देर तक जागना किसी भी मायने में समझदारी की निशानी नहीं है। एक स्वस्थ शरीर और मजबूत देश के लिए गहरी नींद कोई लग्जरी नहीं, बुनियादी जरूरत है।

(सोर्स: AIIMS दिल्ली के पल्मोनोलॉजी एंड स्लीप मेडिसिन डिपार्टमेंट के स्टडी पेपर्स, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) डेटा और अमेरिकन एकेडमी ऑफ स्लीप मेडिसिन की रिपोर्ट्स।)

Suneet Singh

सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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