जब 'सोनम' से मिली थीं इंदिरा गांधी; 1984 में खुद अपने हाथों से तुड़वाया था अनशन, आखिर क्या है 42 साल पुराना इतिहास?
देश
- Edited by: निलेश द्विवेदी
- Updated Jul 18, 2026, 07:59 PM IST
दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन के दौरान बिगड़ी तबीयत के बाद सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल ले जाने की घटना ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस घटनाक्रम के बीच 42 साल पुराना एक ऐतिहासिक प्रसंग फिर चर्चा में है। ऐसे में आइए जानते हैं 1984 के उस आंदोलन की कहानी जिसके चलते इंदिरा गांधी को लेह पहुंचा पड़ा था।
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सोनम वांगचुक अस्पताल पहुंचे तो ताजा हुईं 1984 की यादें
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PTI
Sonam Wangchuk: आज जाने-माने जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) का नाम देशभर में चर्चा का मुद्दा है। उन्हें आज बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण जबरन जंतर-मंतर से हटाकर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में ले जाया गया। पुलिस ने कहा कि चिकित्सकीय सलाह और हाई कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक ही उन्हें अस्पताल ले जाया गया है। लेकिन इस घटनाक्रम के बीच एक बार फिर साल 1984 की यादें ताजा हो रही हैं। आज हम आपको उसी 42 साल के इतिहास के बारे में बताएंगे जिसकी चर्चा इन दिनों हो रही है।

इंदिरा गांधी और सोनम वांग्याल की मुलाकात
क्या है साल 1984 का इतिहास?
आज से चार दशक पहले साल 1984 में सोनम वांगचुक के पिता और लद्दाख के वरिष्ठ नेता सोनम वांग्याल ने क्षेत्र के विभिन्न समुदायों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिलाने की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया था। लद्दाख स्टडीज में प्रकाशित उनके संस्मरणों और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, यह आंदोलन लद्दाख के संवैधानिक अधिकारों और पहचान की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। ऐसे में उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद लेह पहुंची थीं और वांग्याल को भरोसा दिलाया था कि उनकी मांग पर विचार किया जाएगा और उन्हें अनशन समाप्त करने के लिए राजी किया था। पर 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। बाद में साल 1989 में उनके बेटे राजीव गांधी की सरकार ने लद्दाख के प्रमुख समुदायों को अनुसूचित जनजाति (SIT) का दर्जा दिया।

सोनम वांग्याल, सोनम वांगचुक के पिता
एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचाने वाले सबसे कम उम्र पर्वतारोही
गौरतलब है कि साल 1942 में जन्मे सोनम वांग्याल भारतीय अर्धसैनिक बल के पूर्व जवान और पर्वतारोही हैं, जिन्होंने 1965 में महज 23 साल की उम्र में माउंट एवरेस्ट (Mount Everest) पर चढ़ाई की और सबसे कम उम्र के शिखर पर पहुंचने वाले पर्वतारोही बन गए। वे कप्तान एमएस कोहली के नेतृत्व में मई 1965 में माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाले पहले सफल भारतीय अभियान के नौ शिखर विजेताओं में से एक थे। वे माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाले तीसरे भारतीय पुरुष और विश्व के 18वें पुरुष हैं। 22 मई 1965 को पहली बार सबसे अधिक उम्र के (42 वर्ष की आयु में सोनम ग्यात्सो) और सबसे कम उम्र के (23 वर्ष की आयु में सोनम वांग्याल) पर्वतारोही एक साथ एवरेस्ट पर चढ़े।
1965 के एवरेस्ट अभियान का नेतृत्व करने वाले कोहली ने वांग्याल को नंदा देवी पर्वत पर एक सिक्रेट मिशन के लिए अपनी टीम में शामिल किया था। सीआईए / भारतीय खुफिया ब्यूरो के संयुक्त मिशन में 1965 में पर्वत पर एक परमाणु निगरानी उपकरण स्थापित करना और उसके बाद 1966 और 1967 में भी वहां जाना शामिल था। साथ ही लद्दाख के प्रमुख नेताओं में वे शामिल रहे और अविभाजित जम्मू-कश्मीर सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। लद्दाख की संवैधानिक और राजनीतिक आकांक्षाओं को लेकर जनमत तैयार करने में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है। उन्हें 1965 में पद्म श्री और अर्जुन पुरस्कार तथा 2017 में तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्तमान में, वे सोनम ग्यात्सो पर्वतारोहण संस्थान में प्रिंसिपल के रूप में कार्यरत हैं ।
पिता का परिचय किसान के तौर पर क्यों दिया वांगचुक ने?
वांग्याल की भूमिका को लेकर एक बार फिर बढ़ी चर्चा के बीच सोनम वांगचुक के कई पुराने वीडियो भी सोशल मीडिया पर फिर से शेयर किए जा रहे हैं। ऐसे ही एक चर्चित वीडियो में वांगचुक बताते हैं कि इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिले के दौरान उन्होंने अपने पिता का परिचय जम्मू-कश्मीर सरकार के मंत्री के बजाय किसान के रूप में दिया था, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनके पारिवारिक प्रभाव का उनकी प्रवेश प्रक्रिया पर कोई असर पड़े। वहीं सोनम वांग्याल के अनशन का यह ऐतिहासिक प्रसंग कांग्रेस के अंदर भी चर्चा में रहा। पार्टी सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक वरिष्ठ नेता से कहा कि उन्हें जंतर-मंतर जाकर सोनम वांगचुक से मुलाकात करनी चाहिए। उन्होंने 1984 की उस घटना का जिक्र करते हुए कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद लेह गई थीं और सोनम वांग्याल से सीधे संवाद किया था। उन्होंने इसे शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलनों के प्रति सरकार के रवैये का आदर्श उदाहरण बताया।

जंतक-मंतर अपने अनशन के दौरान सोनम वांगचुक
अनशन खत्म करने की अपील की
बता दें कि वांगचुक नीट एग्जाम में अनियमितताओं और इस विवाद के चलते कुछ छात्रों की मौत के विरोध में 28 जून से कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन के समर्थन में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। शुक्रवार को सोशल मीडिया पर वांग्याल के अनशन के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी मुलाकात की तस्वीरें भी व्यापक रूप से शेयर की गईं। इस दौरान कई राजनीतिक नेताओं और सोशल मीडिया यूजर्स ने वांग्याल के अनशन पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रतिक्रिया की तुलना मौजूदा सरकार के रुख से की। अब तक कांग्रेस ने इस आंदोलन से अपेक्षाकृत दूरी बनाए रखी थी, जबकि कई विपक्षी दलों के नेताओं ने खुले तौर पर इसका समर्थन किया।
हालांकि, गुरुवार को कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने वांगचुक से अनशन खत्म करने की अपील की थी। वहीं, शुक्रवार को पार्टी के मीडिया एवं प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा जंतर-मंतर पहुंचकर उनसे मिले। वांग्याल और वांगचुक के आंदोलनों के प्रति सरकारों की प्रतिक्रिया की तुलना पवन खेड़ा ने भी सार्वजनिक रूप से की। जंतर-मंतर पर वांगचुक से मुलाकात के बाद उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि, "शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन करना संविधान प्रदत्त अधिकार है और अनशन कर रहे लोगों से संवाद करना सरकार की जिम्मेदारी है। उन्होंने लिखा, "1984 में इंदिरा गांधी ने यही किया था। 2011 में डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने भी यही किया था।"
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निलेश द्विवेदीauthor
निलेश द्विवेदी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में काम कर रहे हैं। वे शहरों से जुड़ी लोकल घटनाएं, क्राइम, राजनीति, इंफ्रास्ट्रक्चर और राज्यवार अपडेट्स पर लगातार काम करते हैं। निलेश महत्वपूर्ण विवरणों को चुनने और पाठकों की रुचि के हिसाब से कंटेंट को प्रभावी तरीके से पेश करने के लिए जाने जाते हैं। डिजिटल न्यूजरूम के रफ्तार भरे माहौल में वे हर खबर को सटीक एंगल, आसान भाषा और उपयोगी जानकारी के साथ पेश करने पर फोकस करते हैं और अबतक 2,000 से अधिक खबरें लिख चुके हैं।
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