समान नागरिक संहिता विधेयक-2026: विवाह, तलाक, विरासत के नियम लिव-इन-रिलेशनशिप पर भी लागू - Jaipur News

समान नागरिक संहिता विधेयक-2026 विधानसभा में प्रस्तुत तो कर दिया गया है, लेकिन अब विधानसभा सत्र की नवंबर में होने वाली बैठक के दौरान इस पर चर्चा कराई जाएगी। राज्य सरकार ने विधेयक का उद्देश्य राज्य में सभी धर्मों और समुदायों के नागरिकों के लिए विवाह, त

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  • बेटियों को संपत्ति में बराबर अधिकार, बहु विवाह पर पूर्ण प्रतिबंध का प्रावधान

विधेयक को सदन में संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल ने पुरस्थापित किया था। कुल 309 पन्नों और 403 धाराओं वाले इस महत्वाकांक्षी विधेयक को सामाजिक समरसता, लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा देने की दिशा में एक युगांतरकारी कदम बताया गया है। जानिए विधेयक के प्रमुख प्रावधान और इसका पड़ने वाला असर।

विधेयक के प्रमुख प्रावधान

  • राज्य के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, संपत्ति, विरासत, भरण-पोषण और गोद लेने जैसे मामलों में अलग-अलग पर्सनल लॉ के स्थान पर एक समान नागरिक नियमावली लागू होगी।
  • किसी भी व्यक्ति के जीवित जीवनसाथी के रहते हुए दूसरा विवाह पूरी तरह प्रतिबंधित और अमान्य होगा। विवाह संपन्न होने के 60 दिनों के भीतर उसका पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। नियत समय में पंजीकरण न कराने पर 10000 रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है।
  • विवाह के लिए पुरुषों की न्यूनतम आयु 21 और महिला dh 18 वर्ष निर्धारित की गई है।
  • राज्य में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए अपनी साझेदारी की शुरुआत और समाप्ति की लिखित सूचना या पंजीकरण कराना अनिवार्य किया गया है।
  • कानून में नागरिकों को अपने-अपने धार्मिक अथवा मान्य प्रथागत रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह संपन्न करने की पूरी स्वतंत्रता रहेगी, उसका विधिक पंजीकरण अनिवार्य होगा।
  • राजस्थान के अनुसूचित जनजाति समुदायों को इस विधेयक के दायरे से पूरी तरह मुक्त रखा गया है। वे अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और रूढि़गत अधिकार अक्षुण्ण रख सकेंगे।

विधेयक का असर

  • कानून विवाह और तलाक के मामलों में महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देगा। बराबर के अधिकार की बात करेगा।
  • वसीयत, विरासत और पैतृक संपत्ति के मामलों में बेटियों (विवाहित और अविवाहित दोनों) तथा गर्भस्थ शिशुओं को भी बेटों के समान उत्तराधिकार प्राप्त होगा।
  • लिव-इन रिलेशनशिप और पुनर्विवाह से जन्म लेने वाले बच्चों को कानूनन वैध संतान (धर्मज) माना जाएगा, जिससे उन्हें माता-पिता की संपत्ति और भरण-पोषण का पूर्ण अधिकार मिलेगा।
  • विभिन्न धर्मों के जटिल और बिखरे हुए पर्सनल लॉ की जगह विधेयक से सरल, सुलभ और एकीकृत कानूनी व्यवस्था लागू हो सकेगी, इससे अदालती विवादों में कमी की उम्मीद की जा रही है।
  • जाति और धर्म के आधार पर नागरिक अधिकारों में भेदभाव समाप्त होने से समाजों में समरसता बढ़ेगी और देश की अखंडता मजबूत होगी।

नवंबर में होने वाले सत्र में कराएंगे पारित

कानून के लागू होने के साथ ही राजस्थान देश के उन चुनिंदा अग्रणी राज्यों में शामिल हो जाएगा जिन्होंने नागरिकों के सामाजिक अधिकारों में पूर्ण समानता सुनिश्चित की है। इसे नवंबर में होने वाली सत्र की बैठकों में चर्चा के लिए लाया जाएगा और तब ही पारित भी कराया जाएगा। - जोगाराम पटेल, संसदीय कार्य मंत्री