अगस्त के पहले सप्ताह के आंकड़ों से हुआ खुलासा: 22 नए मेडिकल कॉलेज खोले, सब उधार की फैकल्टी के भरोसे - Udaipur News
प्रदेश में धड़ाधड़ 22 नए सरकारी मेडिकल कॉलेज तो खोल दिए गए, लेकिन कई जगह विद्यार्थियों के अनुपात में पर्याप्त फैकल्टी ही नहीं है। इसका खुलासा इन कॉलेजों की बायोमेट्रिक उपस्थिति के अगस्त के पहले सप्ताह के आंकड़ों से हुआ है। बाड़मेर मेडिकल कॉलेज में कुल
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- एनएमसी के निरीक्षण में पुराने या बड़े कॉलेजों से डॉक्टरों को प्रतिनियुक्ति पर लाकर ठीक दिखाते हैं स्थिति
राजस्थान मेडिकल एजुकेशन सोसायटी (राजमेस) के अधीन संचालित इन कॉलेजों में शिक्षकों और रेजिडेंट डॉक्टरों की भारी कमी है। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) के निरीक्षण के समय पुराने और बड़े मेडिकल कॉलेजों से डॉक्टरों को अस्थायी तौर पर प्रतिनियुक्ति पर लाकर स्थिति ठीक दिखाई जाती है। निरीक्षण खत्म होते ही ये डॉक्टर मूल कॉलेजों में लौट जाते हैं। इस मामले में स्वास्थ्य सचिव गायत्री राठौड़ को कई फोन किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।
- हालात: बांसवाड़ा, डूंगरपुर, सिरोही और चित्तौड़गढ़ जैसे नए मेडिकल कॉलेजों में उद्घाटन और एनएमसी निरीक्षण के दौरान उदयपुर के रवींद्रनाथ टैगोर (आरएनटी) मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरों और शिक्षकों को प्रतिनियुक्ति पर लगाए जाने की बात सामने आई है।
- नियम: एनएमसी के नियमों के अनुसार मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों और रेजीडेंट डॉक्टरों की कम से कम 75% उपस्थिति अनिवार्य है। इसके लिए आधार आधारित बायोमेट्रिक और फेस आधारित उपस्थिति प्रणाली लागू है। 75% से कम उपस्थिति रहने पर मान्यता निरस्त करने का प्रावधान है।
- चुनौती: इधर, डॉक्टरों का कहना है कि पर्याप्त सुविधाओं और संसाधनों के अभाव में दूरदराज के नए कॉलेजों में लंबे समय के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों को रोकना चुनौती है। ऐसे में स्थायी भर्ती और विषयवार फैकल्टी उपलब्ध कराना जरूरी है, जिससे विद्यार्थियों की पढ़ाई पर असर न हो।

भास्कर सवाल
शिक्षक नहीं होंगे तो देश को कुशल डॉक्टर कैसे मिलेंगे?
1. जब पर्याप्त संकाय (फैकल्टी) भर्ती नहीं किए जा सकते थे, तो एनएमसी के निरीक्षण के भरोसे मेडिकल कॉलेज क्यों खोले गए?
2. अगर एनएमसी एक साथ प्रदेश के सभी कॉलेजों की जांच करे और मानकों पर कमी मिले तो मान्यता पर कार्रवाई का खामियाजा कौन भुगतेगा?
3. नीट के जरिए दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों को अगर पर्याप्त शिक्षक नहीं मिलेंगे और उन्हें खुद ही पढ़ाई करनी पड़ेगी, तो फिर सरकारी मेडिकल कॉलेज खोलने का औचित्य क्या रह जाएगा?