'जज के साथ अन्याय हो तो वह कहां जाए': यूपी में फांसी की 23 सजा सुनाने वाले जज का दर्द, पहले कहा था- मरना पसंद, डरना नहीं - Muzaffarnagar News

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वरुण कुमार शर्मा | मुजफ्फरनगर18 घंटे पहले

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एक जज का काम न्याय करना होता है, लेकिन अगर उसके साथ ही अन्याय हो तो वह कहां जाए? क्या जिला जज के प्रशासनिक नियंत्रण में काम कर रहा जज उनके ऐसे आदेशों को मानने के लिए बाध्य है, जो कानून के खिलाफ हों?

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यह टिप्पणी मुजफ्फरनगर के जज रवि कुमार दिवाकर ने गुरुवार (17 सितंबर) को 10 साल पुराने एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के एक मामले में फैसला सुनाते हुए की। मामले में लंबे समय से कोर्ट के चक्कर काट रहे आरोपी को उन्होंने बरी कर दिया।

10 दिन पहले जज रवि कुमार दिवाकर ने शाहपुर शहजादी हत्याकांड में आरोपी को फांसी की सजा सुनाते हुए फैसले में लिखा था- मैं मरना पसंद करूंगा, डरपोक जज कहलवाना नहीं। जब तक मैं अपने सिद्धांतों पर चल सकता हूं। तब तक सर्विस करूंगा, वरना इस्तीफा दे दूंगा।

दरअसल, अपनी 17 साल की न्यायिक सेवा में जज रवि कुमार दिवाकर 36 दोषियों को फांसी की सजा सुना चुके हैं। मुजफ्फरनगर में अपने 5 महीने के कार्यकाल के दौरान ही उन्होंने 23 दोषियों को मृत्युदंड दिया है।

‘कोई भी लोक सेवक राजाओं की तरह व्यवहार नहीं कर सकता’

फैसले के दौरान जज ने अपनी कोर्ट से 97 मुकदमों को वापस लेकर दूसरी अदालतों में ट्रांसफर करने के तत्कालीन जिला जज के फैसले पर नाराजगी जताई। जज रवि कुमार दिवाकर ने अपने फैसले में लिखा- भारत में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है। देश संविधान और विधि के शासन से चलेगा। किसी लोक सेवक के मनमाने व्यवहार से नहीं।

उन्होंने कहा- कोई भी लोक सेवक राजाओं की तरह आचरण नहीं कर सकता। उसे अपने हर प्रशासनिक आदेश का कानूनी कारण बताना होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 18 अगस्त को अपने रिटायरमेंट से 13 दिन पहले बिना कारण बताए मुकदमों को ट्रांसफर करने का तत्कालीन जिला जज का फैसला उचित था?

जानिए किस मामले में आया फैसला?

  • मुजफ्फरनगर के पटेल नगर इलाके के रहने वाले अशोक भारती को 21 अक्टूबर, 2015 को भरतिया कॉलोनी के पास से गिरफ्तार किया गया था। उनके पास से 150 ग्राम चरस मिली थी। पुलिस ने 2016 में चार्जशीट दायर की। सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने आरोप साबित करने के लिए सबूत पेश नहीं किए जा सके।
  • सार्वजनिक इलाके से बरामदगी के बाद भी गवाहों की कमी रही। सबूतों और गवाहों के अभाव में कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया गया। सुनवाई के दौरान जज ने फिल्म 'दामिनी' मशहूर डायलॉग 'तारीख पर तारीख' का भी जिक्र किया।
  • उन्होंने कहा- कोर्ट इंसाफ की जगह तारीख पर तारीख देती रहती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसी व्यक्ति को अपनी बेगुनाही साबित करने में 10 साल लग गए। लंबे समय तक कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटना अपने आप में एक तरह का दंड है। न्यायिक व्यवस्था की धीमी गति से निर्दोष व्यक्ति को मानसिक आघात होता है।

अब पढ़िए जज ने अपने फैसले में क्या-क्या लिखा-

  1. जज ने अपने 35 पेज के आदेश में लिखा कि जिला जज ने बिना कोई कारण बताए एक जैसे 9 आदेश पारित कर उनकी अदालत से मुकदमें वापस मंगा लिए। आदेशों में केवल 'रिकॉल' शब्द का इस्तेमाल किया गया। इसके पीछे कोई कारण नहीं बताया गया। इसलिए इसे स्पीकिंग ऑर्डर नहीं कहा जा सकता।
  2. जज ने अपने आदेश में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) 1973 की धारा 409 का हवाला दिया। उन्होंने लिखा कि यह धारा जिला जज को किसी मामले को वापस लेने की शक्ति देती है, लेकिन धारा 409(2) में इस शक्ति पर रोक का प्रावधान है। अगर किसी मामले में ट्रायल शुरू हो चुका है तो विशेष परिस्थितियों को छोड़कर सेशन जज उसे वापस नहीं ले सकते।
  3. जज ने अपने आदेश में लोक सेवकों की जिम्मेदारी पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि एक लोक सेवक में सही को सही और गलत को गलत कहने की क्षमता होनी चाहिए। वह जिस संस्था का प्रतिनिधित्व करता है, उसकी विश्वसनीयता भी उसके आचरण से जुड़ी होती है। व्यवस्था तभी लंबे समय तक चल सकती है, जब लोक सेवक सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता रखे।

29 नवंबर 2025 को संभाला था कार्यभार

जज रवि कुमार दिवाकर ने 29 नवंबर, 2025 को मुजफ्फरनगर में अपर जिला एवं सत्र न्यायालय, फास्ट ट्रैक कोर्ट-3 में कार्यभार संभाला था। 2009 में न्यायिक सेवा शुरू की थी। मुजफ्फरनगर से पहले संभल और बरेली में तैनात रहे। वे ज्ञानवापी प्रकरण में दिए गए फैसले को लेकर भी चर्चा में रहे हैं। उन्होंने पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों को पत्र भेजकर कई बार खुद को खतरा होने की बात कही थी।

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यूपी में जज ने लिखा-मरना पसंद, डरपोक कहलाना नहीं:अब तक 36 को फांसी की सजा दी; जिला जज ने उनकी कोर्ट से 100 केस हटाए थे

मैं मरना पसंद करूंगा, डरपोक जज कहलवाना नहीं। जब तक मैं अपने सिद्धांतों पर चल सकता हूं। तब तक सर्विस करूंगा, वरना इस्तीफा दे दूंगा। जब तक मैं जज की कुर्सी पर हूं, तो फैसला लेने का अधिकार भी एकमात्र मेरा ही होगा। यह टिप्पणी सोमवार को मुजफ्फरनगर में जज रवि कुमार दिवाकर ने शाहपुर शहजादी हत्याकांड में पति नदीम को फांसी की सजा सुनाते हुए अपने फैसले में लिखी। पूरी खबर पढ़ें...

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