भारत में काम के घंटे: 24% कर्मचारी करते हैं बिना पैसे के काम, क्या मज़दूर और मनरेगा काम में भी ऐसी स्थिति है?

September 13, 2026 16 बार देखा गया

ADP की ‘People at Work 2026’ रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 24% कर्मचारी हर हफ़्ते 16 घंटे या उससे ज़्यादा बिना वेतन काम करते हैं। काम के ज्यादा घंटे और समय पर मजदूरी न मिलने की समस्या ऑफिस कर्मचारियों से लेकर मजदूरों तक फैली हुई है। 

काम करते हुए ऑफ़िस कर्मचारी और मज़दूर

काम करते हुए ऑफ़िस कर्मचारी और मज़दूर (सांकेतिक तस्वीर, डिज़ाइन क्रेडिट: रचना)       

भारत में काम के घंटे ख़त्म होने के बाद भी कई कर्मचारी काम करते हैं। यानी भारत में ऐसे कर्मचारी हैं जो हर हफ्ते अपने काम के तय घंटों से ज्यादा काम करते हैं। जिसके लिए उन्हें कोई मेहनताना या वेतन भी नहीं मिलता है। इस स्थिति में दुनियाभर में भारत पहले नंबर पर है। 

ये रिपोर्ट ADP The research institute’s ‘People at Work 2026’ (एडीपी रिसर्च इंस्टीट्यूट की ‘पीपुल एट वर्क 2026) से सामने आई है। 

इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 24 प्रतिशत कर्मचारी हर हफ़्ते 16 घंटे या उससे ज़्यादा बिना वेतन के काम करते हैं। इतना ही नहीं, 40 प्रतिशत कर्मचारी 6 से 15 घंटे तक बिना पैसे के काम करते हैं। इसका मतलब ये है कि करीब दो तिहाई भारतीय कर्मचारी हर हफ़्ते कम से कम 6 घंटे ज़्यादा काम करते हैं। ऑफ़िस में देर तक रुकना इसका एक उदाहरण है। लंच के समय में काम करना भी इसमें शामिल हैं। घर पहुंच कर काम करना भी इसी का हिस्सा है। 

दुनियाभर में भारत पहले स्थान पर 

दुनिया के बाकी देशों में ये आँकड़ा भारत से कम है। वैश्विक स्तर पर 62 प्रतिशत कर्मचारी हर हफ़्ते 5 घंटे तक बिना वेतन के काम करते हैं। 26 प्रतिशत कर्मचारी 6 से 15 घंटे तक बिना बिना वेतन काम करते हैं। 12 प्रतिशत कर्मचारी 16 घंटे या उससे ज्यादा बिना भुगतान के काम करते हैं। 

ये सर्वे साल 2025 में हुआ था। इसमें 36 देशों के 39 हजार से ज़्यादा कर्मचारियों को शामिल किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार भारत पहले स्थान पर है। तुर्की 23 फीसदी के साथ दूसरे नंबर पर है, ऑस्ट्रिया 21 फीसदी के साथ तीसरे नंबर पर है। अमेरिका में यह आंकड़ा 20 फीसदी है। 

कुछ देशों में यह आंकड़ा काफी कम है। चेक रिपब्लिक में केवल 4 प्रतिशत कर्मचारियों ने 16 घंटे या उससे ज्यादा बिना भुगतान काम करने की बात कही। चीन, ताइवान और जापान में यह आंकड़ा करीब 6 प्रतिशत है। रिपोर्ट के मुताबिक, बिना भुगतान ज्यादा काम करने की समस्या खास तौर पर रिमोट वर्क करने वालों में ज्यादा है। सीनियर मैनेजर और बड़े अधिकारी भी इससे प्रभावित हैं। 

बता दें एडीपी एक ऐसी संस्था है, जो मानव संसाधन से जुड़े समाधान पर काम करती है। उसकी ‘पीपुल एट वर्क 2026’ रिपोर्ट में काम के बढ़ते दबाव और बिना भुगतान के अतिरिक्त काम की स्थिति को दिखाया गया है।

ऑफ़िस का काम और घर का काम 

इसमें काम की जगह का भी असर देखने को मिला है। रिमोट वर्क करने वाले 13 फीसदी लोगों ने बताया कि वे हर हफ्ते 16 घंटे या उससे ज्यादा बिना पैसे के काम करते हैं। हाइब्रिड और ऑफिस से काम करने वालों में यह आंकड़ा 12 फीसदी रहा। यानी घर से काम करने का मतलब यह नहीं है कि लोग कम काम करते हैं। कई बार ऑफिस का समय खत्म होने के बाद भी काम करना पड़ता है।

ज्यादा काम, ज्यादा तनाव

ADP की रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादा घंटे बिना पैसे के काम करने से काम की गुणवत्ता जरूरी नहीं कि बढ़ेगी। रिपोर्ट में बताया गया कि जो लोग बिना पैसे के ज्यादा घंटे काम कर रहे थे, उनमें कई लोगों ने माना कि वे उतना अच्छा काम नहीं कर पा रहे हैं जितना कर सकते हैं। 

कर्मचारी और मज़दूर, उनके काम के घंटे 

इस रिपोर्ट में ज़्यादातर उन कर्मचारियों की बात समझ आती है जो किसी तरह के ऑफ़िस में काम करते हैं। ऑफ़िस में काम के घंटे को लेकर। पर वही काम के घंटों और मज़दूरी की समस्या इससे बड़ी हैं। अब थोड़ा कर्मचारी को मज़दूर के नजर से देखें तो इसके दायरे में मज़दूर भी शामिल हैं। जो तय काम के घंटे के बजाय ज़्यादा घंटे काम करते हैं। 

इसमें वे मज़दूर भी आते हैं जिन्हें काम देने का झूठा वादा कर के दूसरे शहरों या जगहों पर ले जाया जाता है। उनसे काम करवाने के बाद पैसे नहीं दिए जाते। ऐसी स्थिति में मज़दूर कई बार बंधुआ मज़दूरी जैसी स्थिति में फंसे होते हैं। 

इसके अलावा डॉक्टर, शिक्षक, कारख़ानों और कंपनियों के मज़दूर भी इस समस्या से दूर नहीं हैं। कई लोगों को वेतन मिलता है, तो कुछ को कई महीनों तक काम करने के बाद उनकी पूरी मज़दूरी नहीं मिलती। कहीं छह महीने तो कहीं आठ महीने वेतन रिकने की शिकायतें उनके सड़क में प्रदर्शन और आंदोलन के माध्यम से पता चलता है। कई जगह कर्मचारियों से तय समय से ज़्यादा काम कराया जाता है पर पैसे ज़्यादा नहीं मिलते हैं। 

ऐसे कामगारों की संख्या और उनके काम के घंटो का पूरा आँकड़ा सामने आना भी आसान नहीं है। बहुत से लोग अपनी नौकरी जाने के डर से ज़्यादा काम करने के बाद भी शिकायत नहीं कर पाते। उसी तरह कुछ मज़दूर आर्थिक मजबूरी के चलते तय समय से ज़्यादा काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं। 

काम के घंटे बढ़ने की चर्चा श्रम क़ानूनों में हुए बदलाव को लेकर भी होती रही है। 8 घंटे की काम की जगह 12 घंटे तक काम की व्यवस्था को लेकर सवाल उठे हैं। एक और बात जो है नाइट शिफ्ट, जो शायद किसी भी मज़दूर या कर्मचारी के लिए स्वस्थ्य साबित नहीं होता पर करना पड़ता है। ग्रामीण इलाकों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले लोगों पर दोगुना पहाड़ टूट पड़ता है। 

ये तो हो गई शहरी बात अब एक नजर गांव की ओर दौड़ाते हैं। मनरेगा में काम करने वाले ग्रामीण मज़दूरों का उदाहरण भी इससे जुड़ा दिखता है। वहां कई मज़दूरों को काम करने के बाद भी अपनी ही मज़दूरी के लिए लंबे समय तक राह देखना पड़ता है। खबर लहरिया की रिपोर्टिंग में भी ऐसे मामले सामने आए हैं। जहां लोगों ने काम तो किया पर उन्हें समय पर उनका पैसा नहीं मिला। 

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इस तरह काम के घंटे या ज़्यादा काम करना अलग-अलग तरह के कामगारों की समस्या है। ऑफ़िस में काम करने वाले कर्मचारीयों से लेकर खेतों और मनरेगा में काम करने वाले मज़दूरों तक कई लोग ऐसे हैं जो तय समय से ज़्यादा घंटे तक काम कर रहे हैं। 

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