बिहार की 2435 झीलें गायब! 6 साल में खत्म हुए 90% जलस्रोत, आखिर वजह क्या?
Bihar lakes Disappeared: बिहार में बाढ़ आती है तो पानी का सैलाब दिखाई देता है और गर्मी आती है तो पानी के लिए हाहाकार. लेकिन अब सामने आया आंकड़ा बिहार के जल संकट की एक ऐसी तस्वीर दिखा रहा है, जो हैरान करने वाली है. राज्य की 90 फीसदी से अधिक झीलों का वजूद महज छह वर्षों में खत्म हो गया.
जल निकाय गणना में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2018-19 में बिहार के सभी 38 जिलों में कुल 2693 झीलें दर्ज की गई थीं. लेकिन वर्ष 2024-25 में हुई दूसरी जल निकाय गणना में इनमें से केवल 258 झीलें ही बची मिलीं. यानी छह साल के भीतर 2435 झीलें गायब हो गईं.
यह गणना योजना एवं विकास विभाग की ओर की गई है. इसकी अंतिम रिपोर्ट केंद्र सरकार के स्तर पर प्रकाशित की जाएगी. हालांकि गणना से सामने आए आंकड़े अभी से बिहार के जल संसाधनों और पर्यावरण को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं.
10 जिलों में एक भी झील नहीं
सबसे चौंकाने वाली स्थिति बिहार के 10 जिलों की है. यहां जल निकाय गणना में एक भी झील नहीं मिली. इन जिलों में अरवल, बेगूसराय, जहानाबाद, कटिहार, खगड़िया, लखीसराय, मधुबनी, जमुई, सारण और शिवहर शामिल हैं. यानी जिन इलाकों में कभी प्राकृतिक जलस्रोतों का अपना नेटवर्क हुआ करता था, वहां अब झीलों का रिकॉर्ड ही खत्म होता दिखाई दे रहा है.
छह जिलों में सिर्फ एक-एक झील
छह जिले ऐसे भी हैं जहां अब महज एक-एक झील बची है. इनमें गोपालगंज, मुंगेर, पूर्णिया, सीतामढ़ी, सीवान और सुपौल शामिल हैं. पूर्णिया की स्थिति इस आंकड़े को और भी गंभीर बना देती है. लाइन बाजार इलाके में कभी दो प्राकृतिक झीलें हुआ करती थीं. आज उसी जगह बड़े-बड़े अपार्टमेंट खड़े हैं. इसी तरह झील टोला का नाम भी अपने अतीत की कहानी खुद बताता है. कभी यहां झील हुआ करती थी, इसी वजह से इलाके का नाम झील टोला पड़ा. आज वहां घनी आबादी बस चुकी है. यानी नाम में झील बची है, लेकिन जमीन पर झील का अस्तित्व खत्म हो चुका है.

दरभंगा में 567 से सिर्फ 2 झील
झीलों के खत्म होने की भयावह तस्वीर दरभंगा में भी दिखाई देती है. वर्ष 2018-19 में दरभंगा में 567 झीलें दर्ज की गई थीं. छह साल बाद हुई गणना में यहां सिर्फ दो झीलें बची मिलीं. पहली जल निकाय गणना में बिहार के आठ जिले ऐसे थे जहां 139 से 567 तक झीलें थीं. लेकिन अब स्थिति ऐसी है कि किसी भी जिले में अधिकतम 50 झीलें भी नहीं बची हैं. वर्तमान गणना में बक्सर में सर्वाधिक 48 झीलें शेष मिली हैं.
कावर झील का क्षेत्रफल भी घटता गया
बिहार की सबसे बड़ी झील कावर झील का उदाहरण भी चिंता बढ़ाने वाला है. वर्ष 1984 में इसका क्षेत्रफल 6786 हेक्टेयर बताया गया था. समय के साथ इसका जलक्षेत्र लगातार प्रभावित हुआ है.
कटिहार की गोगाबील झील भी तेजी से खत्म होने के संकट से जूझ रही है. सहरसा की मत्स्यगंधा झील पूरी तरह सूख चुकी है और फिलहाल इसके जीर्णोद्धार का काम चल रहा है. इसके अलावा मुंगेर की खड़गपुर झील, दरभंगा की कुशेश्वरस्थान झील, बोधगया की मच्छलिंद झील, पश्चिम चंपारण की उदयपुर झील और बक्सर की गोकुल झील भी संकट में बताई जा रही हैं.
500 से ज्यादा झीलों से होती थी खेती
गायब हुई झीलों का असर सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है. जानकारी के मुताबिक लुप्त होने वाली 500 से अधिक झीलों से खेती जुड़ी हुई थी. वहीं 100 से अधिक झीलों का पर्यटकीय महत्व भी था. झीलें खत्म होने का मतलब सिर्फ पानी का खत्म होना नहीं है. इनके साथ स्थानीय खेती, मछली पालन, रोजगार, पर्यटन और आसपास का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है.
झीलों के खत्म होने के पीछे कई वजहें सामने आ रही हैं. इनमें सबसे बड़ा खतरा अतिक्रमण का है. कई जगह जलक्षेत्र की जमीन को भरकर आवासीय उपयोग में लाने के आरोप और मामले सामने आते रहे हैं. जहां कभी पानी हुआ करता था, वहां धीरे-धीरे मिट्टी डाली गई, जमीन का स्वरूप बदला और फिर निर्माण शुरू हो गया. इसके साथ ही अनियोजित शहरीकरण और रियल एस्टेट का दबाव भी प्राकृतिक जलस्रोतों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. शहरों का विस्तार हुआ, लेकिन जल निकायों को बचाने की योजना उसी अनुपात में मजबूत नहीं हो सकी.
झीलों के तल में लगातार गाद जमा होने से उनकी जलधारण क्षमता कम होती गई. जिन जलस्रोतों में कभी बारिश का पानी महीनों तक जमा रहता था, उनमें अब पानी टिकने की क्षमता घटती जा रही है. दूसरी ओर जलस्रोतों की नियमित सफाई, संरक्षण और जीर्णोद्धार में लापरवाही भी उनकी स्थिति को खराब करती रही.
कम और अनियमित बारिश भी बनी चुनौती
जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का पैटर्न भी बदल रहा है. कहीं कम बारिश हो रही है तो कहीं कम समय में बहुत ज्यादा बारिश हो जाती है. इससे पानी जमीन में धीरे-धीरे जाने के बजाय तेज बहाव के साथ निकल जाता है. जब प्राकृतिक जलाशय ही नहीं बचेंगे तो बारिश के पानी को रोकने की क्षमता भी घटती जाएगी.
भूजल नीचे गया तो बढ़ेगा संकट
झीलें और तालाब सिर्फ सतही पानी के स्रोत नहीं होते. ये भूजल रिचार्ज में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. जब जल निकाय खत्म होते हैं और दूसरी ओर भूजल का लगातार दोहन होता है, तो जलस्तर पर दबाव बढ़ता है. यही वजह है कि झीलों के खत्म होने का असर आने वाले वर्षों में पीने के पानी और खेती दोनों पर दिखाई दे सकता है.
एक तरफ बाढ़, दूसरी तरफ सूखी झीलें
बिहार की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस राज्य में हर साल बाढ़ से लाखों लोग प्रभावित होते हैं, उसी राज्य में प्राकृतिक जल भंडारण की क्षमता लगातार कम होती जा रही है. बारिश का पानी रोकने वाले तालाब, झील और दूसरे प्राकृतिक जलस्रोत खत्म होते जाएंगे तो बारिश के दौरान पानी को रोकने की जगह कम होती जाएगी. परिणामस्वरूप एक तरफ बाढ़ का खतरा, तो दूसरी तरफ बारिश खत्म होने के बाद जल संकट और सूखे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है.
31 जुलाई 2026 के बिहार सरकार के आंकड़ों में भी कुछ जलाशयों में बेहद कम जल भंडारण दर्ज किया गया था. चंदन जलाशय योजना में महज 0.13 फीसदी और वदुआ में 29.15 फीसदी क्षमता में पानी दर्ज था.
मछलियां और जलीय जीव भी संकट में
झीलों के खत्म होने का सबसे सीधा असर जैव विविधता पर पड़ रहा है. प्राकृतिक जलाशय जलीय जीवों, मछलियों और पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आवास होते हैं. जलस्रोत खत्म होने के साथ कई जलीय जीवों का अस्तित्व संकट में आया है. मछलियों की कई प्रजातियों के खत्म होने की स्थिति भी चिंता का विषय है.

अब सरकार ढूंढ रही है गायब हुई 2435 झीलें
छह वर्षों में 2693 से घटकर 258 झीलें रह जाना अपने आप में बड़ा सवाल है. आखिर बाकी 2435 झीलें गई कहां?
- क्या वे सूख गईं?
- क्या उनका जलक्षेत्र सिकुड़ गया?
- क्या उन पर अतिक्रमण हो गया?
- क्या उन्हें भरकर निर्माण कर दिया गया?
या सरकारी रिकॉर्ड और जमीन की वास्तविक स्थिति के बीच बड़ा अंतर पैदा हो गया?
इन सवालों का जवाब अब विस्तृत जांच और भौतिक सत्यापन से ही मिलेगा. बिहार की कहानी सिर्फ 2435 झीलों के गायब होने की कहानी नहीं है. यह उस प्राकृतिक व्यवस्था के खत्म होने की कहानी है, जो कभी बाढ़ के पानी को रोकती थी, भूजल को रिचार्ज करती थी, किसानों को पानी देती थी और हजारों जलीय जीवों का घर हुआ करती थी. सबसे बड़ा सवाल यही है. अगर झीलें गायब होती रहीं तो अगली पीढ़ी बिहार में झीलों को सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड और पुराने नक्शों में ही देखेगी?

मोहित पंडित
मोहित पंडित ने साल 2004 से अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की. नई बात, सन्मार्ग, सोनभद्र जैसे अखबारों में वे अपनी सेवा दे चुके हैं. वे सीमांचल के समाचारों को सकारात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं और स्थानीय घटनाओं को उच्च स्तर पर रिपोर्ट करने में निपुण हैं. उनकी लेखनी में संवेदनशीलता और नैतिकता झलकती है.
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