सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सेशंस कोर्ट नहीं दे सकता बिना माफी वाली उम्रकैद, वीडियो में जाने 25 साल की सजा में बदली

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सेशंस कोर्ट नहीं दे सकता बिना माफी वाली उम्रकैद, वीडियो में जाने 25 साल की सजा में बदली

सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद की सजा को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हत्या जैसे गंभीर अपराध में किसी आरोपी को दोषी ठहराते समय सेशंस कोर्ट यह निर्देश नहीं दे सकता कि दोषी अपनी पूरी बची हुई जिंदगी जेल में ही बिताएगा और उसे किसी तरह की माफी या रिहाई का लाभ नहीं मिलेगा। ऐसी विशेष श्रेणी की उम्रकैद की सजा देने का अधिकार केवल संवैधानिक अदालतों यानी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के पास है। यह फैसला पंजाब के लुधियाना में दिसंबर 2009 में एक महिला और उसकी दो नाबालिग बेटियों की हत्या के मामले में आया। मामले की सुनवाई जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने की।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दोनों आरोपियों की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन उनकी सजा में बदलाव किया। कोर्ट ने दोनों दोषियों को 25 साल की कैद की सजा सुनाई।अदालत ने इस दौरान यह स्पष्ट किया कि निचली अदालत उम्रकैद की सजा को इस तरह नहीं बदल सकती कि दोषी के लिए जेल से बाहर आने की कोई संभावना ही खत्म हो जाए। कानून के तहत उम्रकैद का सामान्य अर्थ दोषी के जीवन के अंत तक कारावास हो सकता है, लेकिन सजा सुनाने वाली अदालत को अपनी ओर से ऐसी विशेष शर्त लगाने का अधिकार नहीं है, जो संवैधानिक अदालतों के अधिकार क्षेत्र में आती हो।

क्या है बिना माफी वाली उम्रकैद?

सुप्रीम कोर्ट ने जिस विशेष श्रेणी की सजा का उल्लेख किया, उसे आम तौर पर ऐसी उम्रकैद के तौर पर समझा जाता है जिसमें दोषी को एक निश्चित लंबी अवधि तक या जीवन के शेष हिस्से तक जेल में रहना होता है और सामान्य माफी या सजा में कमी का लाभ सीमित या समाप्त किया जा सकता है।अदालत ने कहा कि इस तरह की विशेष सजा देने का अधिकार संवैधानिक अदालतों को प्राप्त है। सेशंस र्ट इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकता।

हत्या के मामले से जुड़ा है फैसला

यह मामला लुधियाना में दिसंबर 2009 में हुई एक महिला और उसकी दो नाबालिग बेटियों की हत्या से जुड़ा था। मामले में निचली अदालत ने आरोपियों को दोषी ठहराते हुए ऐसी सजा का आदेश दिया था, जिसके तहत उन्हें पूरी जिंदगी जेल में रखने का निर्देश था।मामला आगे अदालतों में पहुंचा और अंत में सुप्रीम कोर्ट के सामने इसकी सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने अपराध में दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा के उस हिस्से में हस्तक्षेप किया जिसमें दोषियों को शेष जीवन जेल में बिताने का निर्देश दिया गया था।

संवैधानिक अदालतों की शक्ति पर जोर

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में निचली अदालत और संवैधानिक अदालत के बीच सजा देने के अधिकार के अंतर को स्पष्ट किया गया है। अदालत ने कहा कि सेशंस कोर्ट कानून के तहत उपलब्ध सजा सुना सकता है, लेकिन वह अपने आदेश से उम्रकैद को ऐसी विशेष श्रेणी में नहीं बदल सकता जिसमें माफी या सजा में कमी की संभावना पूरी तरह खत्म हो जाए।फैसले के बाद दोनों दोषियों की सजा 25 वर्ष के कारावास में बदल दी गई है। यह निर्णय निचली अदालतों द्वारा उम्रकैद की सजा तय करने की सीमा को लेकर महत्वपूर्ण माना जारहा है।

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