सूअर की किडनी के सहारे 271 दिन तक जिंदा रहा बंदा, 9 महीने बाद हुआ ट्रांसप्लांट

सूअर की किडनी के सहारे 271 दिन तक जिंदा रहा बंदा, 9 महीने बाद हुआ ट्रांसप्लांट

सूअर की किडनी से नौ महीने जिंदा रहा ये शख्स Image Credit source: Getty Images

कल्पना कीजिए, किसी मरीज की दोनों किडनियां ठीक से काम नहीं कर रही हैं और उसकी जिंदगी डायलिसिस मशीन के भरोसे चल रही है. ऐसे में अगर डॉक्टर उसे इंसानी किडनी की जगह सूअर की किडनी लगा दें और वह किडनी करीब नौ महीने तक काम करती रहे, तो यह किसी मेडिकल चमत्कार से कम नहीं लगेगा. अमेरिका में डॉक्टरों ने ऐसा ही एक प्रयोग किया है, जिसने ट्रांसप्लांट की दुनिया में नई उम्मीद पैदा की है.

अमेरिका में हार्वर्ड मेडिकल स्कूल और मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल से जुड़े डॉक्टरों ने एक ऐसे मरीज का मामला सामने रखा है, जिसने जेनेटिकली मॉडिफाइड सूअर की किडनी के सहारे 271 दिन तक बिना डायलिसिस के जिंदगी बिताई. खास बात यह है कि बाद में इस मरीज को इंसानी डोनर की किडनी भी मिल गई और उसका सफल ट्रांसप्लांट किया गया. The Lancet में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, मरीज का नाम टिम एंड्रयूज़ है. वह एंड-स्टेज किडनी फेल्योर से जूझ रहे थे और उन्हें लंबे समय से डायलिसिस की जरूरत थी. जनवरी 2025 में डॉक्टरों ने उन्हें जेनेटिकली एडिट की गई सूअर की किडनी ट्रांसप्लांट की. ट्रांसप्लांट के बाद किडनी ने काम करना शुरू कर दिया और टिम को डायलिसिस से राहत मिल गई.

सूअर की किडनी ने दिया 9 महीने का जीवनदान

सबसे बड़ी बात यह रही कि यह किडनी करीब 271 दिनों तक उनके शरीर में काम करती रही यानी लगभग नौ महीने तक उन्हें डायलिसिस मशीन पर निर्भर नहीं रहना पड़ा. हालांकि बाद में सूअर की किडनी ने काम करना बंद कर दिया, लेकिन तब तक डॉक्टरों को इंसानी डोनर की किडनी मिल चुकी थी. इसके बाद टिम का मानव किडनी ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किया गया. डॉक्टरों के मुताबिक, यह दुनिया का पहला ऐसा मामला है जिसमें किसी मरीज ने जेनेटिकली मॉडिफाइड सूअर की किडनी के सहारे इतने लंबे समय तक रहने के बाद सफलतापूर्वक इंसानी किडनी ट्रांसप्लांट कराया. इस पूरे प्रयोग की सबसे अहम उपलब्धि यही मानी जा रही है कि मरीज कई महीनों तक डायलिसिस से दूर रह सका.

हालांकि सूअर की किडनी हमेशा के लिए काम नहीं कर पाई. ट्रांसप्लांट के करीब छह महीने बाद डॉक्टरों ने उसकी रक्त वाहिकाओं में नुकसान के संकेत देखे. धीरे-धीरे यह समस्या बढ़ती गई और किडनी की Efficiency प्रभावित होने लगी. आखिरकार डॉक्टरों को उसे निकालना पड़ा. स्टडी में शामिल डॉक्टर लियोनार्डो रिएला के मुताबिक, दुनियाभर में जरूरतमंद मरीजों की तुलना में डोनर किडनी की संख्या काफी कम है. यही वजह है कि वैज्ञानिक लंबे समय से जानवरों के अंगों को इंसानों में इस्तेमाल करने की संभावनाओं पर काम कर रहे हैं. इसे मेडिकल भाषा में जेनोट्रांसप्लांटेशन कहा जाता है.

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फिलहाल सूअर की किडनी इंसानी किडनी का स्थायी विकल्प नहीं बनी है. लेकिन इस मामले ने यह जरूर दिखाया है कि जेनेटिकली एडिट किए गए जानवरों के अंग भविष्य में उन मरीजों के लिए एक तरह का ‘ब्रिज’ बन सकते हैं, जिन्हें इंसानी डोनर का इंतजार करना पड़ रहा है. अगर इस तकनीक को और सुरक्षित और प्रभावी बनाया जा सका, तो आने वाले समय में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए इंतजार कर रहे लाखों मरीजों के लिए यह बड़ी राहत साबित हो सकती है.

आयुष कुमार

आयुष कुमार

आयुष कुमार, टीवी9 डिजिटल में सीनियर सब एडिटर हैं. अशोक और चाणक्य की धरती बिहार से हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की तालीम हासिल की है. पत्रकारिता में तीन साल से तिल को बिना ताड़ बनाए किसी भी सोशल मुद्दे को 360 डिग्री समझाने की कोशिश करते हैं.<p></p> अमर उजाला, फिरकी डॉट इन से अपने पत्रकारीय सफर की शुरुआत की है. पाठकों तक सरल शब्दों में खबरें पहुंचाना उद्देश्य रहा है. लेखन की इस दुनिया में दिलचस्पी इसलिए बढ़ गई, क्योंकि बचपन से ही काफी ज्यादा बातूनी रहे हैं. <p></p>फिलहाल, टीवी9 में फीचर राइटिंग करते हुए सोशल मीडिया की नब्ज पकड़ने में माहिर हो गए है. अजीबोगरीब खबरों को गजब तरीके से लिखकर आप सबके सामने पेश करते हैं.

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