कमर्शियल प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई 3 हफ्ते और टली: निगम ने कहा- 1 हजार प्रॉपर्टी का सर्वे सुप्रीम कोर्ट ने पर्याप्त नहीं माना - Bhopal News
भोपाल के रहवासी इलाकों में गैर-कानूनी तरीके से चल रहे कमर्शियल प्रतिष्ठानों के खिलाफ नगर निगम ने कार्रवाई टाल दी है। अरेरा कॉलोनी और बावड़िया कला में जिन 101 शोरूम-दुकानों के ताले बाद में खुल गए थे, उन्हें अभी दोबारा बंद नहीं कराया जाएगा। इसके बजाय न
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- सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल के रहवासी इलाकों में कार्रवाई की छूट दी, निगम ने फिर भी टाली
- सवाल- नोटिस दे चुके, कई दुकानों पर ताले लग चुके, दोबारा सर्वे क्यों?
नगर निगम का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में पेश किए गए करीब 1000 प्रॉपर्टी के सर्वे का दायरा पर्याप्त नहीं माना गया। इसी वजह से अब पूरे शहर का सर्वे कर वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट तैयार की जाएगी। सर्वे में जहां भी अवैध निर्माण या रहवासी क्षेत्र में गैर-कानूनी व्यावसायिक गतिविधियां मिलेंगी, वहां आगे कार्रवाई की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद पहले चरण में निगम ने अरेरा कॉलोनी, रोहित नगर और बावड़िया कला की 429 कमर्शियल प्रॉपर्टी को नोटिस जारी किए थे।
दूसरे चरण में बैरागढ़, कोलार, चुनाभट्टी, इंद्रपुरी, अशोका गार्डन और कोहेफिजा समेत अन्य क्षेत्रों में 1250 से अधिक नोटिस जारी किए गए थे। नगर निगम के डिप्टी कमिश्नर एवं कॉलोनी सेल प्रभारी भुवन गुप्ता के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने पहले प्रस्तुत सर्वे का सैंपल साइज छोटा माना है और तीन सप्ताह में नई रिपोर्ट मांगी है। हर विधानसभा क्षेत्र में नोडल अधिकारी नियुक्त किए जाएंगे। ये बिल्डिंग परमिशन के उल्लंघन व व्यावसायिक गतिविधियों का संयुक्त सर्वे कराएंगे।
मास्टर प्लान जल्द आए, जहां सड़कें चौड़ी- कमर्शियल गतिविधि वहीं हो
भास्कर एक्सपर्ट
वी.पी. कुलश्रेष्ठ, पूर्व सेक्रेटरी जनरल, इंस्टीट्यूट ऑफ टाउन प्लानर्स इंडिया
रहवासी इलाकों में अस्पतालों, शोरूम और दूसरे कारोबार को लेकर उठा विवाद कुछ प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं है। इसने भोपाल की 20 साल पुरानी शहर बसाने की योजना पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर को 2005 के बाद नया मास्टर प्लान नहीं मिला। दो बार ड्राफ्ट बने, आपत्तियां भी आईं, पर दोनों लागू नहीं हो सके। मास्टर प्लान-2047 भी एक साल से मंजूरी का इंतजार कर रहा है।
- यह स्थिति बनी कैसे? : पिछले 20 वर्षों में रहवासी इलाकों में धीरे-धीरे बड़े अस्पताल, शोरूम और दूसरे संस्थान खुलते गए। लेकिन शहर की सड़कें, पार्किंग, पानी और सीवेज जैसी सुविधाएं उसी हिसाब से नहीं बढ़ीं। नियम भी समय के साथ सख्ती से लागू नहीं हुए।
- पुरानी कॉलोनियों की अपनी सीमा : अरेरा कॉलोनी के ई-1 से ई-5 जैसे इलाके कम आबादी के हिसाब से बसाए गए थे। यहां बड़े संस्थान खुलने से ट्रैफिक बढ़ा, पार्किंग की समस्या बढ़ी और पानी-सीवेज जैसी सुविधाओं पर जरूरत से ज्यादा दबाव पड़ा। इसलिए ऐसी कॉलोनियों का मूल स्वरूप बचाना जरूरी है। अरेरा कॉलोनी, चार इमली जैसे पुराने रहवासी इलाकों में बड़े कमर्शियल संस्थानों को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए। शहर के नए इलाकों में, जहां चौड़ी सड़कें और जरूरी सुविधाएं मौजूद हैं, वहां योजना बनाकर मिश्रित उपयोग की अनुमति दी जा सकती है। बड़े अस्पताल, विश्वविद्यालय, कोचिंग और शोरूम ऐसे ही इलाकों में हों।
- अब सिर्फ जमीन का उपयोग तय करना काफी नहीं : नई योजना में केवल यह लिख देना काफी नहीं होगा कि जमीन आवासीय है या व्यावसायिक। यह भी साफ होना चाहिए कि किस इलाके में कितने बड़े संस्थान चल सकेंगे। कॉलोनी की जरूरत और पूरे शहर की जरूरत वाले संस्थानों के लिए अलग नियम होने चाहिए। नई व्यवस्था केवल भविष्य के लिए नहीं होनी चाहिए। जो संस्थान पहले से चल रहे हैं, उनके लिए भी सरकार को साफ नीति बनानी होगी।
- अब फैसला टालने की गुंजाइश नहीं : भोपाल के सामने चुनौती सिर्फ अवैध निर्माण हटाने की नहीं, बल्कि अगले 20-25 साल का शहर कैसा होगा, यह तय करने की है। मास्टर प्लान-2047 जल्द लागू नहीं हुआ, तो आज जो विवाद अरेरा कॉलोनी में है, वही कल दूसरे इलाकों में भी आएगा।