'एक पर हमला, सब पर हमला…', क्या है मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट? 3 देशों ने किए साइन

What is Mecca joint defense agreement : वेस्ट एशिया में लगातार बढ़ते तनाव के बीच एक बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय खबर सामने आई है. सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का स्थित अल-सफा पैलेस में आयोजित ‘मक्का अल-मुकर्रमा शिखर सम्मेलन’ के दौरान पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच आज एक अहम डील साइन हुई है. इस डील को ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ नाम दिया गया है. यह समझौता बढ़ती सुरक्षा चिंताओं के समय तीनों देशों के बीच सहयोग को और मजबूत करेगा. समझौते के अनुसार, तीनों देशों में से किसी एक पर हमला होने पर उसे सभी देशों पर हमला माना जाएगा.

बैठक में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रसीप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ शामिल हुए. शहबाज शरीफ अपने उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ तीन दिवसीय दौरे पर सऊदी अरब पहुंचे थे.

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क्या है मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट की मुख्य शर्तें?

यह समझौता तीनों देशों के बीच ऐतिहासिक संबंधों, रणनीतिक हितों और रक्षा सहयोग को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया है. समझौते के तहत यह तय किया गया है कि तीनों में से किसी भी एक देश के खिलाफ किया गया कोई भी सशस्त्र हमला, तीनों देशों पर हमला माना जाएगा. डील का मुख्य उद्देश्य किसी भी बाहरी हमले या आक्रामकता के खिलाफ मिलकर मुकाबला करना और सामूहिक प्रतिरोध को मजबूत करना है. यह समझौता तीनों देशों के बीच सैन्य और सुरक्षा सहयोग के सभी पहलुओं को बढ़ावा देने का प्रावधान करता है. तीनों देशों ने इस समझौते के जरिए क्षेत्र और उसके बाहर शांति, सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने की अपनी प्रतिबद्धता जताई है. यह समझौता तीनों देशों के बीच सामूहिक सुरक्षा को नया आयाम देने के साथ-साथ उनके भविष्य के रक्षा संबंधों को और गहरा करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है.

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रक्षा समझौते से तीनों देशों को फायदा

तुर्की के हबर्तुर्क टेलीविजन के अनुसार, इस रक्षा समझौते से तीनों देशों के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण, खुफिया जानकारी साझा करने और उन्नत सैन्य प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण का रास्ता साफ होगा. यह ऐतिहासिक समझौता ऐसे समय में सामने आया है जब गाजा, ईरान और लेबनान के संघर्षों के कारण तुर्की और इजराइल के बीच तनाव काफी बढ़ चुका है. अंकारा स्थित थिंक टैंक के रणनीतिकार निहात अली ओज़कान का कहना है कि अमेरिका द्वारा क्षेत्र में केवल अपने और इजराइल के हितों को प्राथमिकता देने की वजह से, बदलती परिस्थितियां देशों को अपनी सुरक्षा के लिए नए मित्र और तंत्र तलाशने के लिए प्रेरित कर रही हैं.

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इससे पहले सितंबर में भी पाकिस्तान और सऊदी अरब ने एक द्विपक्षीय रक्षा समझौता किया था. पाकिस्तान के 25 लाख से अधिक नागरिक सऊदी अरब में काम करते हैं और सऊदी अरब लंबे समय से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को संभालने में मदद करता रहा है. अब तुर्की के जुड़ने से यह गठबंधन और मजबूत हो गया है.

क्यों लिया गया यह बड़ा फैसला?

मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और अस्थिरता को देखते हुए तीनों मुस्लिम बहुल देशों ने अपनी सुरक्षा और सैन्य सहयोग मजबूत करने का फैसला लिया है. इस डील के जरिए तीनों देश इंटेलिजेंस शेयरिंग, संयुक्त सैन्य अभ्यास और आधुनिक रक्षा तकनीकों के हस्तांतरण पर मिलकर काम करेंगे.

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ईरान और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों जैसे हौथी और इराकी मिलिशिया द्वारा अपनी तेल सुविधाओं और बुनियादी ढांचे पर हुए मिसाइल व ड्रोन हमलों के बाद से सऊदी अरब अपनी सुरक्षा साझेदारियों में विविधता लाना चाहता था.

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