एक बेड पर 3-4 बच्चे... बालाघाट में बिगड़े हालात, 27 मासूमों की मौत का दावा; आखिर किस बीमारी ने बरपाया कहर?

Balaghat News: मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के आदिवासी इलाकों में बच्चों के बीमार होने और मौतों का मामला गंभीर होता जा रहा है. बिरसा विकासखंड के कई गांवों में बच्चे उल्टी-दस्त, बुखार, मलेरिया, डायरिया, खसरा, सर्दी-खांसी और दूसरी मौसमी बीमारियों की चपेट में हैं. अस्पताल में भर्ती होने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है. चिंता की बात यह भी है कि इलाज के बाद स्वस्थ होकर घर लौटने वाले कुछ बच्चे दोबारा बीमार होकर अस्पताल पहुंच रहे हैं.

जिला अस्पताल में फिलहाल 56 बच्चे भर्ती हैं. अस्पताल के 50 बेड वाले बच्चा वार्ड में मरीजों की संख्या बढ़ने से एक बेड पर 3 से 4 बच्चों का इलाज करना पड़ रहा है. स्थिति को देखते हुए अस्पताल में अतिरिक्त बेड लगाए जा रहे हैं. कोविड-19 के दौरान तैयार किए गए आईसीयू वार्ड में भी बीमार बच्चों को भर्ती किया गया है.

कई गांवों में बीमारी का प्रकोप

बिरसा विकासखंड के कुंडेकसा, अडोरी, कोरका, बोंदारी समेत कई गांवों में बड़ी संख्या में बच्चे बीमार बताए जा रहे हैं. बच्चों में बुखार, उल्टी-दस्त, मलेरिया, डायरिया, खसरा और सर्दी-खांसी जैसे लक्षण सामने आ रहे हैं. स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, प्रभावित क्षेत्रों में मौसमी बीमारी के साथ मलेरिया के मरीज भी मिल रहे हैं.

इसके अलावा चर्मरोग, मीजल्स, स्कैबीज और टायफाइड जैसी बीमारियों की भी जानकारी सामने आई है. बीमारियों को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग की टीमें गांवों में पहुंचकर स्वास्थ्य शिविर लगा रही हैं. बच्चों की जांच और इलाज किया जा रहा है. मच्छरों से होने वाली बीमारियों को रोकने के लिए दवा का छिड़काव और फॉगिंग भी कराई जा रही है.

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27 बच्चों की मौत का दावा

इलाके में बच्चों की मौत को लेकर कांग्रेस और आदिवासी समाज की ओर से अलग-अलग आंकड़े सामने रखे गए हैं. इनके मुताबिक, जून से अब तक कई गांवों में कुल 27 बच्चों की मौत हुई है. बताया गया कि पहली मौत 26 जून को 14 साल के एक बच्चे की हुई थी. इसके बाद 31 जून को बोंदारी गांव के साहिल की मौत हुई. 21 जुलाई को तीन साल की सुंदरी और 23 जुलाई को कुंडेकसा की तीन साल की प्रीति की मौत हुई.

31 जुलाई को चैन सिंह के छह साल के बेटे की मौत हुई, जबकि बोंदारी के चार साल के अरविंद्र ने भी दम तोड़ दिया. इसके बाद 11 अगस्त को 11 साल की दो बच्चियों मंगली और प्रियंका की मौत होने की जानकारी सामने आई. कांग्रेस और आदिवासी समाज का दावा है कि बोदारी में 8, कुंडेकसा में 2, मछुरदा में 7, घुमुरू में 2, मोहनपुर बैगाटोला में 2 और अन्य गांवों में भी बच्चों की मौत हुई है. इन सभी को मिलाकर मौत का आंकड़ा 27 बताया जा रहा है.

सरकारी आंकड़े अलग, उठ रहे सवाल

बच्चों की मौत को लेकर सरकारी आंकड़े और कांग्रेस-आदिवासी समाज के दावे अलग-अलग हैं. जिला प्रशासन के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बैगा और गोंड़ समाज के 10 बच्चों की मौत मीजल्स और मलेरिया जैसी बीमारियों से हुई है. वहीं, मुख्यमंत्री मोहन यादव के बालाघाट दौरे के दौरान मृत बच्चों के परिजनों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की गई.

इसके बाद 24 मृत बच्चों के परिजनों के खातों में सहायता राशि पहुंचाए जाने की जानकारी दी गई है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर बच्चों की मौत का वास्तविक आंकड़ा कितना है. कांग्रेस और आदिवासी समाज जहां मृत बच्चों की संख्या 27 से अधिक बता रहे हैं, वहीं सरकारी आंकड़े इससे अलग हैं.

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50 बेड के वार्ड में 56 बच्चे भर्ती

जिला अस्पताल में बच्चों की बढ़ती संख्या ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी दबाव बढ़ा दिया है. बच्चा वार्ड में कुल 50 बेड हैं, लेकिन मरीजों की संख्या अधिक होने के कारण एक बेड पर कई बच्चों का इलाज किया जा रहा है. स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, पिछले एक महीने में 379 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया. इनमें से 323 बच्चे इलाज के बाद स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं. फिलहाल 56 बच्चे अस्पताल में भर्ती हैं.

हालांकि अस्पताल में बच्चों की संख्या लगातार घटती-बढ़ती रहती है. इलाज के बाद डिस्चार्ज होकर गांव लौटे कुछ बच्चे दोबारा बीमार पड़ने के बाद अस्पताल पहुंच रहे हैं. इससे बच्चों के पूरी तरह स्वस्थ होने और उनके घर लौटने के बाद स्वास्थ्य स्थिति को लेकर भी चिंता बढ़ी है.

कोविड आईसीयू में भी बच्चों का इलाज

बच्चों की बढ़ती संख्या को देखते हुए जिला अस्पताल में अतिरिक्त व्यवस्था की जा रही है. बच्चा वार्ड में बेड की कमी होने के कारण कोविड-19 काल में तैयार किए गए आईसीयू वार्ड में भी बीमार बच्चों को भर्ती किया गया है. प्रशासन का कहना है कि अस्पताल में इलाज की व्यवस्था को बढ़ाया जा रहा है, ताकि किसी भी बच्चे को उपचार से वंचित न रहना पड़े.

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गांवों में पानी की समस्या भी बड़ी वजह

इन आदिवासी गांवों में बीमारी के बीच सबसे बड़ी समस्याओं में साफ पानी की कमी भी शामिल है. कोहनीमोड़ और बोंदारी जैसे गांवों में कुछ परिवार आज भी झिरिया यानी जमीन में खोदकर बनाए गए छोटे जलस्रोत से पानी पीने को मजबूर हैं. बोंदारी गांव में ऐसी तस्वीर सामने आई, जहां एक महिला नाले के पास कपड़े धो रही थी और बच्ची को नहला रही थी. इसी जगह के पास बने झिरिया से महिला पानी निकालकर पी रही थी.

ग्रामीणों का कहना है कि उनके गांव में पर्याप्त हैंडपंप या साफ पानी की व्यवस्था नहीं है. इसलिए गर्मी, बारिश और ठंड—हर मौसम में उन्हें इसी तरह पानी का इंतजाम करना पड़ता है. बारिश के दौरान नदी-नालों में पानी बढ़ने पर स्थिति और खराब हो जाती है. ग्रामीणों के मुताबिक, बाढ़ के दौरान पानी मटमैला हो जाता है और कई बार उन्हें पीने के पानी के लिए भी परेशान होना पड़ता है.

नल-जल योजना पर भी सवाल

ग्रामीण इलाकों में साफ पानी पहुंचाने के लिए नल-जल योजना के तहत टंकी का स्टैंड तो बनाया गया है, लेकिन कई जगह टंकी अब तक नहीं लगाई गई है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब लोगों को साफ पानी ही उपलब्ध नहीं होगा तो बच्चों को संक्रमण और जलजनित बीमारियों से कैसे बचाया जाएगा. स्वच्छ पानी की कमी, मच्छरों का प्रकोप और स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच इन इलाकों में बच्चों की मुश्किलें बढ़ा सकती है.

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कुपोषण की समस्या भी चिंता का विषय

इलाके में बच्चों की बीमारी के बीच कुपोषण का मुद्दा भी सामने आया है. स्थानीय स्तर पर बच्चों की स्थिति देखने पर कई बच्चों का वजन और कद उनकी उम्र के मुकाबले कम नजर आने की बात कही जा रही है. हालांकि महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से कुपोषण से जुड़े आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए गए हैं. ऐसे में प्रभावित गांवों में कुपोषण की वास्तविक स्थिति कितनी गंभीर है, इसे लेकर स्पष्ट सरकारी आंकड़े सामने नहीं आए हैं.

विशेषज्ञों के अनुसार, कुपोषण से बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है. ऐसे में साफ पानी और पर्याप्त पोषण की कमी के बीच बच्चे संक्रमण और मौसमी बीमारियों की चपेट में जल्दी आ सकते हैं.

हजारों घरों में फॉगिंग और दवा का छिड़काव

बीमारियों की रोकथाम के लिए स्वास्थ्य विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में अभियान तेज किया है. विभाग के मुताबिक, 67 गांवों के 4,338 मकानों में कीटनाशक का छिड़काव किया गया है. इसके अलावा 105 गांवों के 7,529 घरों में इनडोर और आउटडोर फॉगिंग की गई. स्वास्थ्य विभाग की टीमें गांवों में जाकर बच्चों की जांच कर रही हैं और जरूरत के अनुसार उन्हें अस्पताल भेजा जा रहा है. मलेरिया से बचाव के लिए मच्छरों के लार्वा और उनके प्रजनन वाले स्थानों पर भी रोकथाम के उपाय किए जा रहे हैं.

प्रशासन ने बढ़ाए 39 बेड

बालाघाट कलेक्टर कुमार सत्यम ने बताया कि जिला अस्पताल के 50 बेड वाले चाइल्ड वार्ड में 39 अतिरिक्त बेड बढ़ाए गए हैं. जल्द ही 20 और बेड उपलब्ध कराने की बात कही गई है. कलेक्टर के मुताबिक, बच्चों के इलाज में किसी तरह की कमी नहीं आने दी जाएगी. स्वास्थ्य विभाग की टीमें लगातार प्रभावित क्षेत्रों की निगरानी कर रही हैं.

इलाज के बाद दोबारा बीमार होकर अस्पताल पहुंच रहे बच्चों को लेकर भी स्वास्थ्य विभाग नजर रख रहा है. प्रशासन का कहना है कि प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं को लगातार मजबूत किया जा रहा है. फिलहाल बालाघाट के आदिवासी इलाकों में बच्चों की बीमारी, मौतों के अलग-अलग आंकड़ों, साफ पानी की कमी और कुपोषण जैसे मुद्दों ने चिंता बढ़ा दी है. प्रशासन की ओर से स्वास्थ्य शिविर, दवा का छिड़काव और अस्पताल में अतिरिक्त बेड की व्यवस्था की जा रही है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में बीमारी की मूल वजहों- स्वच्छ पानी, पोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी प्रभावी तरीके से काम करना जरूरी है.

पंकज डहरवाल

पंकज डहरवाल

पंकज डहरवाल मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के गांव चिखला बांध के रहने वाले हैं. उनकी प्रारंभिक शिक्षा चिखला बांध में ही संपन्न हुई. वर्ष 2013 में न्यूज़ पेपर नवभारत में रिपोर्टर के तौर पर पत्रकारिता में क्षेत्र में प्रवेश किए. नवभारत न्यूज़ पेपर में उन्होंने 10 वर्ष तक सेवा दी. इसके बाद वो TV9 भारतवर्ष से जुड़ गए. जिले की हर खबर एक नए अंदाज और नए कलेवर में पहुंचाने की कोशिश करते हैं.

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