बच्चों से कहती हैं, कठिन नहीं आओ नया खेल खेलें: 330 बच्चों वाले सरकारी स्कूल की शालिनी अब राष्ट्रपति से होंगी सम्मानित - Kaushambi News

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पंकज केसरवानी | कौशांबी53 मिनट पहले

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कौशांबी सुबह स्कूल की घंटी बजने से पहले अगर कोई शिक्षिका बच्चों के बीच पहुंचकर उन्हें किताबों से अलग किसी नए खेल की चुनौती देती दिखाई दे, तो संभव है कि वह शालिनी कुशवाहा हों। उनके लिए पढ़ाई सिर्फ ब्लैकबोर्ड, किताब और सवाल-जवाब का नाम नहीं है। वह कठिन अध्याय को भी खेल में बदल देती हैं और बच्चों से कभी नहीं कहतीं कि यह विषय मुश्किल है। उनका एक ही अंदाज है—आओ, आज नया खेल खेलते हैं।

कौशांबी के कम्पोजिट विद्यालय रसूलाबाद कोइलहा में 18 अप्रैल 2018 से तैनात शालिनी कुशवाहा का यही प्रयोग अब उन्हें देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षक सम्मानों में से एक तक ले गया है। राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए चयनित शालिनी शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति से सम्मानित होंगी।

दैनिक भास्कर से बातचीत में शालिनी ने अपनी उस यात्रा के बारे में खुलकर बताया, जिसमें पिछड़े तबके के बच्चों की चुनौतियां, अभिभावकों की भागीदारी, नई तकनीक, खेल-खेल में पढ़ाई और खुद को लगातार बदलते रहने की जिद शामिल है। उनके मुताबिक, पुरस्कार तक पहुंचने का रास्ता किसी एक दिन या एक प्रयोग से नहीं बना। यह बच्चों के साथ रोज किए गए छोटे-छोटे प्रयासों का कारवां है।

शालिनी कुशवाहा पिछले आठ साल से कम्पोजिट विद्यालय रसूलाबाद कोइलहा से जुड़ी हैं। इस समय वह अकादमिक रिसोर्स पर्सन यानी ARP के रूप में काम कर रही हैं, इसलिए नियमित कक्षाएं लेने का मौका पहले की तुलना में कम मिलता है। उनका मूल विषय अंग्रेजी है और उन्होंने इसी विषय से एमए किया है। हालांकि विद्यालयी स्तर पर उनका फोकस भाषा, गणित और FLN यानी बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान पर रहा है।

स्कूल में इस समय करीब 330 से 335 बच्चे पढ़ रहे हैं। शालिनी बताती हैं कि यहां आने वाले बड़ी संख्या में बच्चे ऐसे परिवारों से हैं, जहां संसाधन और सुविधाएं सीमित हैं। कई बच्चों को वे अवसर नहीं मिलते, जो बेहतर संसाधनों वाले स्कूलों के बच्चों को आसानी से मिल जाते हैं। यहीं से उनकी शिक्षण पद्धति की असली शुरुआत हुई।

वह कहती हैं कि बच्चों की कमियां या समस्याएं उनके लिए रुकावट नहीं बनीं, बल्कि वही उनकी प्रेरणा बन गईं। सवाल यह था कि सीमित संसाधनों के बीच बच्चों को ऐसा माहौल कैसे दिया जाए, जिससे वे पढ़ाई में पीछे न रहें और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सकें।

शालिनी कहती हैं, “बच्चों की जो समस्याएं थीं, उन्होंने ही मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। बस यही कोशिश रही कि जो सुविधाएं बच्चों के पास हैं, उन्हीं के बीच उन्हें बेहतर अवसर मिलें और मैं उनके लिए जो अच्छा कर सकती हूं, करती रहूं। इसी तरह कारवां बनता गया।”

उनके शिक्षण के पीछे एक और बड़ी प्रेरणा उनकी मां हैं, जो खुद शिक्षिका थीं। शालिनी कहती हैं कि मां ने उन्हें समझाया था कि शिक्षा समाज को बदलने की सबसे बड़ी ताकत है। घर में मां के रूप में अपने बच्चों को शिक्षित करने के साथ वह स्कूल में शिक्षक बनकर समाज के दूसरे बच्चों के जीवन में बदलाव लाने की कोशिश कर रही हैं।

कठिन चैप्टर नहीं, ‘नया खेल’ शुरू होता है: घर पर 2 घंटे करती हैं तैयारी

शालिनी की कक्षा में पढ़ाई को लेकर एक अलग नियम है। वह बच्चों को पहले ही यह नहीं बतातीं कि गणित का यह सवाल कठिन है या अंग्रेजी का यह पाठ मुश्किल है। उनका मानना है कि शिक्षक जब किसी विषय को कठिन घोषित कर देता है तो बच्चे के मन में डर पहले ही बैठ जाता है। इसलिए वह पढ़ाई की शुरुआत एक अलग तरीके से करती हैं।

वह बच्चों से कहती हैं—“आओ, आज एक नया खेल खेलते हैं।”

इसके बाद उसी खेल के जरिए गणित का कोई कॉन्सेप्ट, भाषा का कोई पाठ या बुनियादी साक्षरता से जुड़ी गतिविधि शुरू हो जाती है। बच्चों की रुचि बनी रहे, इसके लिए वह रोज नए तरीके और ट्रिक्स तैयार करती हैं।शालिनी बताती हैं कि स्कूल के छह घंटे बच्चों के साथ पढ़ाने और गतिविधियां कराने के बाद वह घर पर भी करीब दो घंटे नई शिक्षण विधियों और ट्रिक्स की तैयारी में लगाती हैं। अगले दिन बच्चों के सामने कुछ नया हो, यह उनकी कोशिश रहती है।

उनके मुताबिक, बच्चे अगर रोज यह सोचकर घर जाएं कि कल स्कूल में कुछ नया मिलने वाला है, तो स्कूल आने की उनकी इच्छा अपने आप बढ़ती है। यही तरीका नामांकन के साथ-साथ बच्चों के कक्षा में ठहराव की चुनौती से निपटने में भी मददगार बना।

शालिनी के अनुसार, बच्चों को मोबाइल की दुनिया से सिर्फ दूर करना समाधान नहीं है। जरूरी यह है कि उनके सामने पढ़ाई को भी उतना ही रोचक बनाया जाए। इसलिए उन्होंने नई तकनीक और बुनियादी शिक्षा, दोनों को अपनी शिक्षण पद्धति का आधार बनाया।

वह बच्चों की रुचि के अनुसार पढ़ाई कराती हैं, तकनीक का इस्तेमाल करती हैं और अभिभावकों को भी नई शिक्षण प्रणाली से जोड़ने की कोशिश करती हैं। उनका मानना है कि बच्चे की शिक्षा सिर्फ स्कूल की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। जब शिक्षक और अभिभावक एक साथ जुड़ते हैं, तब बदलाव तेजी से दिखाई देता है।

दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने कहा- कमजोर बच्चे प्यार से ही आगे बढ़ेंगे।

दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने कहा- कमजोर बच्चे प्यार से ही आगे बढ़ेंगे।

अभिभावकों से संवाद; बोलीं- प्यार से ही कमजोर बच्चा आगे बढ़ेगा

शालिनी के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में बच्चों का स्कूल में नामांकन और फिर उनका लगातार कक्षाओं में बने रहना रहा। इसके लिए स्कूल स्तर पर सिर्फ इंतजार नहीं किया गया कि अभिभावक खुद बच्चों को लेकर आएंगे।नामांकन बढ़ाने के लिए जागरूकता रैलियां निकाली गईं। अभिभावकों से बातचीत की गई और उन्हें समझाया गया कि शिक्षा केवल डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह बच्चे और समाज दोनों के भविष्य को बदल सकती है।

वह मानती हैं कि पिछड़े या कमजोर छात्र को आगे बढ़ाने के लिए सबसे पहले उसके साथ अपनापन जरूरी है। शिक्षक को बच्चे को समझना होगा और उसके अभिभावकों से लगातार संवाद करना होगा। उनका कहना है कि कई बार बच्चा पढ़ाई में इसलिए पीछे रह जाता है क्योंकि उसकी समस्याओं को केवल अंक या प्रदर्शन के आधार पर देखा जाता है। जबकि जरूरत यह जानने की होती है कि वह बच्चा किन परिस्थितियों से आ रहा है और उसे आगे बढ़ने के लिए किस तरह के सहयोग की जरूरत है।

शालिनी बच्चों में अनुशासन पैदा करने के लिए भी किसी सख्त नियम से ज्यादा शिक्षक के व्यवहार को महत्वपूर्ण मानती हैं। उनके मुताबिक, शिक्षक खुद समय का पालन करेगा, बच्चों से पहले स्कूल पहुंचेगा और अपने काम के प्रति गंभीर रहेगा तो बच्चे उसे देखकर सीखेंगे। वह कहती हैं कि बच्चे उपदेश से कम और उदाहरण से ज्यादा सीखते हैं।

इसका असर उन्हें अपने छात्रों में सबसे ज्यादा उनके आत्मविश्वास के रूप में दिखाई देता है। शालिनी के अनुसार, सरकारी प्राथमिक स्कूलों के कई बच्चे सीमित संसाधनों और सामाजिक परिस्थितियों के कारण खुद को दूसरे स्कूलों के बच्चों से कमतर मानने लगते हैं। उनकी कोशिश रही कि यह डर बच्चों के भीतर टिकने न पाए।

आज जब उनके स्कूल के बच्चे दूसरे अंग्रेजी माध्यम या संसाधन संपन्न स्कूलों के बच्चों के सामने आत्मविश्वास से खड़े होते हैं और अपनी बात रखते हैं, तो वह इसे अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक मानती हैं। उनके शब्दों में, “जब हमारे बच्चे बिना किसी डर के दूसरे बच्चों के सामने खड़े होते हैं, तब लगता है कि वास्तव में हमारी मेहनत सफल हुई है।”

मां से मिली शिक्षक बनने की प्रेरणा

राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए चयन की खबर शालिनी को मिली तो वह बेहद खुश हुईं। उस समय बच्चों का साथ इस खुशी को और खास बना गया। वह इस उपलब्धि का श्रेय सिर्फ खुद को नहीं देतीं। उनका कहना है कि इसमें बच्चों की मेहनत, अभिभावकों का भरोसा, शिक्षक साथियों का सहयोग और शुभचिंतकों की दुआएं शामिल हैं।

शालिनी का पारिवारिक जीवन भी शिक्षा और आगे बढ़ने की इसी सोच से जुड़ा हुआ है। उनके पति प्रेम कुमार होम मेकर हैं। उनकी बड़ी बेटी शिवानी की शादी हो चुकी है। दूसरी बेटी जाह्नवी यूपीएससी की तैयारी कर रही हैं, जबकि वैष्णवी प्रयागराज से एमए कर रही हैं। बेटा अंकुर कुमार 12वीं पास करने के बाद आगे की पढ़ाई कर रहा है। वह बैडमिंटन खिलाड़ी भी है और राष्ट्रीय चैंपियनशिप में भाग ले चुका है। शालिनी प्रयागराज के नैनी स्थित त्रिवेणी नगर की निवासी हैं।

स्कूल में भी उन्हें कई बार सम्मानित किया जा चुका है।

स्कूल में भी उन्हें कई बार सम्मानित किया जा चुका है।

शिक्षण के साथ खुद को लगातार अपडेट रखना भी उनकी कार्यशैली का अहम हिस्सा है। वह पहले सहायक अध्यापक रहीं, शिक्षक संकुल के रूप में काम किया और अब ARP की जिम्मेदारी निभा रही हैं। उन्होंने SRG के लिए भी आवेदन किया है। वह कहती हैं कि नई जिम्मेदारियां और लगातार सीखने की प्रक्रिया ही उन्हें खुद को अपडेट रखने के लिए प्रेरित करती है। हालांकि एक बात वह खास तौर पर कहती हैं—उन्होंने कभी पुरस्कार पाने के लिए काम नहीं किया। उनका फोकस हमेशा बच्चों के साथ बेहतर काम करने पर रहा।

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर उनका मानना है कि बच्चों को अपनी बात कहने का ज्यादा अवसर मिलना चाहिए। चाहे बच्चा लिखकर अपनी भावना व्यक्त करे या बोलकर, कक्षा में ऐसा माहौल होना चाहिए जहां हर बच्चा आगे आए और अपनी बात रख सके।

खेल-खेल में बच्चों को पढ़ाती हैं मैथ।

खेल-खेल में बच्चों को पढ़ाती हैं मैथ।

नई शिक्षा नीति को भी वह व्यावहारिक ज्ञान और बच्चों की पहुंच के हिसाब से महत्वपूर्ण मानती हैं। उनके अनुसार, अगर नीति की भावना के अनुरूप इसका सही तरीके से क्रियान्वयन हो, तो बच्चों को किसी भी क्षेत्र में पीछे रहने की जरूरत नहीं होगी।

नए शिक्षकों के लिए उनका संदेश भी सीधा है—बच्चों को अपना हर सेकेंड दीजिए।

वह कहती हैं, “हम बच्चों में जैसा बीज बोएंगे, वैसा ही पौधा तैयार होगा। इसलिए उनमें नैतिक मूल्य और बेहतर संस्कार डालना बहुत जरूरी है, ताकि आने वाला समाज भी बेहतर बने।”

और अगर उन्हें एक दिन के लिए शिक्षा मंत्री बनने का मौका मिल जाए तो उनकी प्राथमिकता किताबों से पहले संवाद होगी। वह चाहेंगी कि अभिभावक और बच्चे स्कूल में आकर खुलकर अपनी समस्याएं और बातें रख सकें, ताकि उनकी वास्तविक जरूरतों को समझकर समाधान किया जा सके।

रसूलाबाद कोइलहा के उस स्कूल से राष्ट्रपति भवन तक पहुंचने वाली शालिनी की कहानी आखिरकार इसी एक सोच पर टिकी है—हर बच्चा सीख सकता है, जरूरत सिर्फ इतनी है कि शिक्षक उसे पढ़ाई का डर नहीं, सीखने का आनंद दे।

शालिनी कुशवाहा एक नजर में

नाम: शालिनी कुशवाहा

स्कूल: कम्पोजिट विद्यालय रसूलाबाद कोइलहा, कौशांबी

स्कूल में तैनाती: 18 अप्रैल 2018 से

वर्तमान जिम्मेदारी: अकादमिक रिसोर्स पर्सन (ARP)

शैक्षणिक विषय: अंग्रेजी से एमए

शिक्षण फोकस: भाषा, गणित और FLN

स्कूल में छात्र संख्या: करीब 330 से 335

सम्मान: राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए चयनित, शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति से होंगी सम्मानित

निवास: त्रिवेणी नगर, नैनी, प्रयागराज

पति: प्रेम कुमार, होम मेकर

बच्चे: तीन बेटियां और एक बेटा

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