35 साल पुराने फ्लैट फर्जीवाड़े में बुजुर्ग को सजा: चंडीगढ़ अदालत का फैसला, झूठा हलफनामा देकर लिया फ्लैट; उम्र देखते हुए सजा में नरमी - Chandigarh News

चंडीगढ़ अदालत ने हाउसिंग सोसाइटी में अवैध रूप से फ्लैट हासिल करने के लिए झूठा हलफनामा जमा करने के 35 साल पुराने मामले में 73 वर्षीय अमृत पाल कौर को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी) के तहत दोषी ठहराते हुए 6 महीने की साधारण कैद और 5,000 र

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मामले के सह-आरोपी आज्ञा राम की 11 अप्रैल 2026 को मौत हो गई थी, जिसके चलते उनके खिलाफ केस समाप्त कर दिया गया। एक अन्य आरोपी शकुंतला की भी मौत हो चुकी है, जबकि आरोपी राजेंद्र सिंह को भगोड़ा घोषित किया जा चुका है।

अब 5 प्वाइंट में जानिए सारा क्या मामला है

1991 में झूठा हलफनामा देकर लिया फ्लैट

जुलाई 2014 में डिप्टी कमिश्नर-कम-रजिस्ट्रार, कोऑपरेटिव सोसाइटी, चंडीगढ़ ने पुलिस को शिकायत दी थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि चंडीगढ़ यंग ड्वेलर्स कोऑपरेटिव हाउस बिल्डिंग फर्स्ट सोसाइटी लिमिटेड के कुछ सदस्यों ने फर्जी हलफनामे जमा कराकर फ्लैट हासिल किए हैं। इसके बाद अक्टूबर 2014 में थाना सेक्टर-17 में एफआईआर दर्ज की गई।

2. स्कीम में थी एक शर्त, जो बनी मुसीबत

चंडीगढ़ कोऑपरेटिव हाउसिंग स्कीम-1991 के तहत यदि किसी व्यक्ति, उसके पति या पत्नी अथवा आश्रित बच्चों के नाम चंडीगढ़, पंचकूला या मोहाली में पहले से कोई मकान, प्लॉट या फ्लैट है, तो वह सोसाइटी के फ्लैट के लिए पात्र नहीं हो सकता।आरोप के मुताबिक, अमृत पाल कौर ने मार्च 1991 में हलफनामा देकर कहा था कि उनके या उनके परिवार के नाम चंडीगढ़, पंचकूला या मोहाली में कोई संपत्ति नहीं है। इसी आधार पर उन्हें सोसाइटी में फ्लैट आवंटित किया गया।हालांकि, जांच में सामने आया कि अमृत पाल कौर के पति के नाम वर्ष 1986 से ही सेक्टर-44 बी, चंडीगढ़ में एक मकान आवंटित था। 3. साल 2015 में अरेस्ट भी हुई थी

अमृत पाल कौर को 5 जनवरी 2015 को गिरफ्तार किया गया था। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने अदालत में चालान पेश किया। इसके बाद अदालत ने अमृत पाल कौर के खिलाफ धारा 420 IPC के तहत आरोप तय किए।

4. फर्जी हलफनामा न दिया होता तो यह स्थिति न होती

अदालत ने पाया कि यदि अमृत पाल कौर ने फर्जी हलफनामा प्रस्तुत नहीं किया होता, तो उन्हें सोसाइटी का फ्लैट आवंटित नहीं किया जाता। कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने संबंधित प्राधिकरण को गुमराह कर अनुचित लाभ हासिल किया। इस आधार पर अदालत ने IPC की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी का अपराध साबित माना।

5. उम्र ज्यादा होने सजा में नरमी बरती

अदालत ने आरोपी की 73 वर्ष की उम्र और वर्ष 2018 से मुकदमे की सुनवाई का सामना करने को देखते हुए सजा में नरमी बरती। उन्हें 6 महीने की साधारण कैद और 5,000 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई गई। जुर्माना नहीं भरने पर एक महीने की अतिरिक्त कैद भुगतनी होगी।

बचाव पक्ष की दो दलीलें नहीं आईं काम

1. हस्ताक्षर में बदलाव को माना स्वाभाविक बचाव पक्ष ने हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि 1991 के हलफनामे पर किए गए हस्ताक्षर और बाद में लिए गए नमूना हस्ताक्षरों का निश्चित रूप से मिलान नहीं हो पाया। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि हलफनामे और नमूना हस्ताक्षर के बीच करीब 24 साल का अंतर है। इतने लंबे समय में हस्ताक्षर के तरीके में सामान्य बदलाव आना स्वाभाविक है।

2. FIR में देरी की दलील भी खारिज

बचाव पक्ष ने एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी को भी आधार बनाया। कोर्ट ने कहा कि मामले की जांच और जरूरी अनुमति लेने के बाद वर्ष 2014 में एफआईआर दर्ज की गई थी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 420 IPC के तहत अपराध पर धारा 468 Cr.P.C. में दी गई समय-सीमा की रोक लागू नहीं होती। इसलिए एफआईआर में देरी को आधार बनाकर मामले को खारिज नहीं किया जा सकता।जा