मध्य प्रदेश: स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 4 को चुनौती, हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को क्यों जारी किया नोटिस?

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 की धारा 4 में मौजूद नॉन-ऑब्स्टेन्ट क्लॉज (Non-Obstante Clause)को चुनौती देने वाली याचिका पर मंगलवार (22 सितंबर) को सुनवाई हुई. याचिकाकर्ता की ओर से वकील अशोक लालवानी ने दलील दी कि धारा 4 की शुरुआत में इस्तेमाल की गई भाषा अन्य व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद प्रावधानों के प्रभाव को दरकिनार करते हुए स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत विवाह की अनुमति देती है. याचिकाकर्ता पक्ष का दावा है कि इस प्रावधान से अलग-अलग पर्सनल लॉ के बीच कानूनी विसंगतियां पैदा होती हैं और यह संविधान के विभिन्न प्रावधानों के विपरीत है.

यह जनहित याचिका अंकिता राठौर के पिता हीरालाल राठौर और दूसरे याचिकाकर्ता दिग्विजय सिंह विश्व हिंदू परिषद से जुड़ी हैं जिनके द्वारा यह याचिका दायर की है.उन्होंने हिंदू महिला और मुस्लिम पुरुष की शादी पर कानूनी सवाल उठाया है. अंकिता राठौर के मामले में उनके पिता हीरालाल राठौर ने पूर्व में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उस मामले में कोर्ट के समक्ष यह सवाल उठा था कि क्या हिंदू लड़की और मुस्लिम युवक स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत विवाह कर सकते हैं. याचिकाकर्ता पक्ष के मुताबिक, उस मामले में डिविजन बेंच ने धारा 4 के प्रावधानों के आधार पर ऐसे विवाह की अनुमति होने की बात कही थी. इसी निर्णय के आधार पर वर्तमान याचिका में धारा 4 के संबंधित प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है.

‘शर्तों को पूरा करने पर शादी की जा सकती है’

वकील अशोक लालवानी के मुताबिक, स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 4 में शुरुआत में Notwithstanding anything contained in any other law शब्दों का इस्तेमाल किया गया है. सामान्य भाषा में इसका अर्थ है कि यदि किसी दूसरे कानून में कोई अलग प्रावधान मौजूद है तब भी स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत निर्धारित शर्तों को पूरा करने पर विवाह किया जा सकता है.

याचिकाकर्ता पक्ष का तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 13 में लॉ की व्यापक अवधारणा के तहत कानून के साथ-साथ कुछ परिस्थितियों में प्रचलित कस्टम या प्रथा को भी कानून के दायरे में माना गया है. ऐसे में उनका कहना है कि किसी अन्य व्यक्तिगत कानून में विवाह को लेकर जो प्रावधान लागू होते हैं, उन्हें केवल नॉन-ऑब्स्टेन्ट क्लॉज के जरिए दरकिनार करना संवैधानिक कसौटी पर परखा जाना चाहिए.

हिंदू शादी से जुड़े कानूनों में समय के साथ हुए कई बदलाव

अशोक लालवानी ने कहा कि हिंदू व्यक्तिगत कानूनों को संसद ने अलग-अलग कानूनों के माध्यम से कोडिफाई किया है. उनके मुताबिक, हिंदू विवाह से जुड़े कानूनों में समय के साथ कई बदलाव हुए और विवाह, उत्तराधिकार तथा महिलाओं के अधिकारों से जुड़े प्रावधानों को कानून के जरिए निर्धारित किया गया. वहीं याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ पूरी तरह उसी तरह कोडिफाई नहीं हुआ है और कई विषयों में व्यक्तिगत कानून तथा प्रचलित नियमों की भूमिका बनी हुई है.

याचिकाकर्ता पक्ष ने इसी आधार पर हाईकोर्ट के सामने सवाल उठाया है कि जब अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों में विवाह को लेकर अलग-अलग कानूनी परिणाम हो सकते हैं, तो स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 4 का नॉन-ऑब्स्टेन्ट क्लॉज उन प्रावधानों को किस सीमा तक प्रभावित कर सकता है.

मुस्लिम पर्सनल लॉ में फासिद शब्द के इस्तेमाल का जिक्र

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट के सामने मुस्लिम पर्सनल लॉ में फासिद शब्द के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया. उनके मुताबिक, मुस्लिम कानून की कुछ व्याख्याओं में फासिद का अर्थ अनियमित या irregular विवाह से जुड़ा है. वकील ने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए दावा किया कि हिंदू लड़की और मुस्लिम पुरुष के विवाह की स्थिति को लेकर न्यायिक फैसलों में अलग-अलग पहलुओं पर विचार किया गया है.

याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि यदि किसी विवाह की कानूनी स्थिति अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के तहत अलग परिणाम पैदा करती है तो विवाह करने वाले लोगों के अधिकारों, विशेषकर उत्तराधिकार और संपत्ति संबंधी अधिकारों को लेकर भी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं. वकील ने दलील दी कि विवाह करने वाला कोई भी जोड़ा सामान्य तौर पर यह अपेक्षा करता है कि उसका विवाह कानूनी रूप से वैध होगा और उससे जुड़े सभी अधिकार स्पष्ट होंगे. ऐसे में यदि विवाह की कानूनी स्थिति को लेकर अलग-अलग कानूनों में अलग परिणाम निकलते हैं तो इससे भविष्य में विवाद की स्थिति पैदा हो सकती है.

संतान की स्थिति को लेकर भी दलील दी गई

याचिकाकर्ता की ओर से विवाह से पैदा होने वाली संतान की स्थिति को लेकर भी दलील दी गई. वकील ने कहा कि भारत में परिवार और सामाजिक पहचान में पिता की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है. उन्होंने यह तर्क रखा कि ऐसी स्थिति में विवाह से पैदा होने वाले बच्चे के धर्म और व्यक्तिगत कानून से जुड़े अधिकारों को लेकर भी सवाल खड़े हो सकते हैं.

अंकिता राठौर के पिता ने दाखिल की थी याचिका

हालांकि, ये सभी बातें याचिकाकर्ता पक्ष की दलीलें हैं, जिन पर हाईकोर्ट ने अभी अंतिम फैसला नहीं दिया है. वकील अशोक लालवानी के अनुसार, अंकिता राठौर के मामले में उनके पिता हीरालाल राठौर ने पूर्व में याचिका दाखिल की थी. दूसरी ओर अंकिता राठौर और उनके साथ मौजूद मुस्लिम युवक मुख्य रूप से सुरक्षा यानी प्रोटेक्शन की मांग को लेकर कोर्ट पहुंचे थे. वकील के मुताबिक उन्होंने कोर्ट से विवाह की अनुमति नहीं मांगी थी.

इस मामले में सुनवाई डिविजन बेंच के सामने हुई थी. याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि डिविजन बेंच ने स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 4 के आधार पर हिंदू लड़की और मुस्लिम युवक के विवाह की संभावना को स्वीकार किया था. वहीं वकील ने बताया कि इससे पहले ग्वालियर में सिंगल बेंच के जस्टिस आहलूवालिया ने ऐसी शादी को फासिद यानी अनियमित बताए जाने का उल्लेख किया था. वर्तमान याचिका इसी कानूनी स्थिति को चुनौती देने के उद्देश्य से दाखिल की गई है.

केंद्र सरकार को कोर्ट ने जारी किया नोटिस

अशोक लालवानी के मुताबिक, सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर विचार करते हुए केंद्र सरकार यानी यूनियन ऑफ इंडिया को नोटिस जारी किया है. अब केंद्र सरकार की ओर से इस याचिका पर जवाब दाखिल किया जाएगा. इसके बाद कोर्ट मामले में आगे सुनवाई करेगा और यह तय होगा कि धारा 4 के संबंधित प्रावधान की संवैधानिक वैधता को लेकर उठाए गए सवालों पर आगे क्या कार्रवाई की जाती है.

वकील ने स्पष्ट किया कि अभी हाईकोर्ट ने इस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है और न ही याचिका पर अंतिम फैसला हुआ है. फिलहाल कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है. अधिवक्ता अशोक लालवानी ने बताया कि अगली सुनवाई की तारीख न्यायालय की प्रक्रिया के तहत निर्धारित होगी और तारीख हाईकोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध होगी.

शिव चौबे

शिव चौबे

शिव चौबे को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एक दशक का अनुभव है. शिव ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से संस्कृत विषय में शिक्षा प्राप्त की, जिसके बाद उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की. उन्होंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत दैनिक अखबार से की. इसके बाद वर्ष 2019 में वे ETV भारत से बतौर संवाददाता जुड़े, जहां ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट और शिक्षा से जुड़ी उनकी कई महत्वपूर्ण रिपोर्टों ने राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा बटोरी. वर्ष 2020 में कोरोना महामारी के दौरान उन्होंने जान जोखिम में डालकर जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग की और व्यवस्थाओं की कमियों को उजागर किया. उनकी रिपोर्ट्स के बाद जिला प्रशासन और प्रदेश सरकार को कई महत्वपूर्ण निर्णय लेने पड़े. वर्ष 2021 में शिव चौबे ने TV9 भारतवर्ष में जिला रिपोर्टर के रूप में नई भूमिका की शुरुआत की. इसके बाद वर्ष 2023 में वे PTI (Press Trust of India) से जुड़े. यहां उन्होंने कई महत्वपूर्ण खोजी रिपोर्टें कीं, जिनमें सिवनी जिले का चर्चित सर्पदंश घोटाला, नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय से जुड़ा गोबर घोटाला तथा स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कई घोटाले शामिल है. इसके अलावा उन्होंने CAA के दौरान लगे कर्फ्यू, बरगी क्रूज हादसे और अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं की जमीनी रिपोर्टिंग कर अपनी अलग पहचान बनाई. निष्पक्ष, जनसरोकारों से जुड़ी और खोजी पत्रकारिता के लिए शिव चौबे को विशेष रूप से जाना जाता है.

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