बरी होने के 4 घंटे बाद ही खेल! CBI की जल्दबाजी पर केजरीवाल पहुंचे हाई कोर्ट, जानिए क्या-क्या खुलासे हुए?

Time Published: Thursday, August 13, 2026, 19:36 [IST]

दिल्ली के कथित आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल को निचली अदालत से राहत मिलने के कुछ ही घंटे बाद सीबीआई (CBI) ने हाई कोर्ट का रुख कर लिया था। अब इसी जल्दबाजी को लेकर केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट में सवाल उठाए हैं। उन्होंने सीबीआई की पुनरीक्षण याचिका को चुनौती देते हुए कहा कि जिस फैसले को पढ़ने और समझने में निचली अदालत को लंबी सुनवाई करनी पड़ी, उसे एजेंसी ने कुछ घंटों में ही चुनौती दे दी। आखिर इतनी जल्दी 500 पन्नों का फैसला कैसे पढ़ा गया।

यह मामला 27 फरवरी 2026 के राउज एवेन्यू कोर्ट के फैसले से जुड़ा है। अदालत ने केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और 21 अन्य आरोपियों को मामले में आरोपमुक्त कर दिया था। अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष के पास आरोप आगे बढ़ाने के लिए जरूरी ठोस सामग्री नहीं थी।

Arvind Kejriwal CBI Case

चार घंटे में CBI ने क्या कर दिया?

केजरीवाल ने हाई कोर्ट में दलील दी कि निचली अदालत का फैसला 27 फरवरी को आया और करीब चार घंटे के भीतर ही सीबीआई ने उसे चुनौती देने वाली पुनरीक्षण याचिका दाखिल कर दी। उनका कहना है कि फैसला 500 से ज्यादा पन्नों का था और निचली अदालत ने मामले के आरोपों पर विस्तार से विचार किया था। ऐसे में इतनी कम अवधि में पूरे फैसले को पढ़कर उसके हर निष्कर्ष को चुनौती देना संभव नहीं लगता।

केजरीवाल ने इसे सीबीआई की 'बेहद जल्दबाजी में की गई कार्रवाई' बताया। उनका तर्क है कि एजेंसी ने निचली अदालत के हर निष्कर्ष को अलग-अलग चुनौती देने के बजाय एक सामान्य याचिका दाखिल की।

उनके मुताबिक,

"निचली अदालत ने हर आरोप पर विस्तार से विचार किया था। फैसला सैकड़ों पन्नों का था। इसके बावजूद सीबीआई ने कुछ ही घंटे में हाई कोर्ट में याचिका डाल दी। इतनी जल्दी फैसले को पढ़ना और उसकी हर बात को समझना संभव नहीं है।"

निचली अदालत ने 23 आरोपियों को क्यों किया था बरी?

राउज एवेन्यू कोर्ट ने 27 फरवरी को केजरीवाल और सिसोदिया समेत कुल 23 आरोपियों को आरोपों से बरी किया था। अदालत ने सीबीआई की जांच और उसके आधार पर लगाए गए आरोपों पर भी कड़ी टिप्पणियां की थीं। अदालत के मुताबिक, अभियोजन पक्ष ऐसा ठोस आधार पेश नहीं कर सका जिससे कथित साजिश या आपराधिक मंशा का प्रथमदृष्टया मामला बनता हो।

अदालत ने यह भी कहा था कि आबकारी नीति तैयार करने की प्रक्रिया में किसी तरह की हेरफेर या किसी एक व्यक्ति के मनमाने फैसले का सबूत नहीं मिला। नीति पर अलग-अलग स्तरों पर चर्चा और आधिकारिक प्रक्रिया के जरिए फैसले लिए गए थे।

यही वजह है कि केजरीवाल अब हाई कोर्ट में सीबीआई की याचिका की वैधता पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि जब निचली अदालत ने ही आरोप तय करने लायक प्रथमदृष्टया सामग्री नहीं पाई, तो सीबीआई की याचिका को आगे बढ़ाने का कोई आधार नहीं है।

केजरीवाल ने हाई कोर्ट से क्या मांग की?

केजरीवाल का कहना है कि सीबीआई की याचिका को शुरुआती स्तर पर ही खारिज किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, एजेंसी ने निचली अदालत के फैसले में दर्ज खास निष्कर्षों को प्रभावी तरीके से चुनौती नहीं दी है। इस मामले में हाई कोर्ट पहले ही सीबीआई की चुनौती पर सुनवाई शुरू कर चुका है। 9 मार्च को हाई कोर्ट ने निचली अदालत के उस हिस्से पर रोक लगाई थी जिसमें सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की बात कही गई थी।

अब विवाद सिर्फ आबकारी नीति मामले तक सीमित नहीं है। केजरीवाल ने हाई कोर्ट की सुनवाई की निष्पक्षता को लेकर भी आपत्ति जताई है और संबंधित न्यायाधीश के मामले से अलग होने की मांग की थी। अप्रैल में उन्होंने इस मांग के समर्थन में अतिरिक्त आधार भी रखे थे।

आबकारी नीति मामला क्या है?

दिल्ली सरकार ने 2021-22 के लिए नई आबकारी नीति लागू की थी। बाद में इसमें कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोप लगे। इसके बाद सीबीआई ने जांच शुरू की। यह मामला आगे चलकर दिल्ली की राजनीति का बड़ा कानूनी और राजनीतिक विवाद बन गया।

अब निचली अदालत से मिली राहत के बाद लड़ाई हाई कोर्ट में पहुंच चुकी है। सीबीआई अपने आरोपों को कायम रखने की कोशिश कर रही है, जबकि केजरीवाल और दूसरे आरोपी निचली अदालत के फैसले को आधार बनाकर सीबीआई की चुनौती खारिज करने की मांग कर रहे हैं।