40 बार फेल, 12 साल के संघर्ष में मजदूरी भी की; रुला देगी MPPSC में अफसर बने मनोज पाल की कहानी
मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम के रहने वाले मनोज पाल ने 12 साल के लंबे संघर्ष, गरीबी और 40 परीक्षाओं में फेल होने के बाद MPPSC 2024 में शानदार कामयाबी हासिल की है।
manoj pal mppsc success story: अगर कोई इंसान एक या दो बार किसी परीक्षा में फेल हो जाए तो अक्सर उसका हौसला टूट जाता है। लोग अपनी किस्मत को कोसने लगते हैं और थक-हारकर अपना रास्ता ही बदल लेते हैं। लेकिन जरा उस शख्स के बारे में सोचिए, जिसने एक-दो नहीं, बल्कि पूरे 12 साल तक सिर्फ और सिर्फ नाकामियों का सामना किया हो। करीब 40 परीक्षाओं में उसे हार मिली हो। फिर भी उस इंसान ने हार मानना नहीं सीखा। यह किसी बॉलीवुड फिल्म की स्क्रिप्ट नहीं है बल्कि मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले के खपरिया गांव के रहने वाले मनोज पाल की असल जिंदगी की कहानी है। मनोज ने मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी) की राज्य सेवा परीक्षा 2024 में असिस्टेंट डायरेक्टर (फाइनेंस) का पद हासिल किया है। उनकी यह कामयाबी रातों-रात नहीं मिली है बल्कि इसके पीछे सालों का संघर्ष, पैसों की भारी किल्लत और लगातार मिल रही हार के बावजूद खुद पर अटूट भरोसा शामिल है। मनोज ने कैसे तय किया ये सफर, आइए जानते हैं।
12वीं में आए थे सिर्फ 50 फीसदी नंबर
मनोज की शुरुआती पढ़ाई उनके गांव में ही हुई। 12वीं तक की पढ़ाई उन्होंने अपने इलाके के सरकारी स्कूल से की और करीब 50 फीसदी नंबरों के साथ पास हुए। उनका परिवार बहुत ही सीमित साधनों के सहारे गुजारा करता था। ऐसे हालात में आगे की पढ़ाई करना उनके लिए कोई आसान काम नहीं था। लेकिन मनोज ने हार नहीं मानी। वो आगे की पढ़ाई के लिए नर्मदापुरम चले गए। कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया और यहीं से कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स की तैयारी में भी जुट गए।
कोरोना काल में करनी पड़ी मजदूरी
मनोज की जिंदगी का सबसे मुश्किल दौर तब आया जब कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया में कोहराम मचा दिया। कामकाज ठप हो गए और आमदनी का कोई जरिया नहीं बचा। मनोज के पास जो थोड़ी-बहुत बचत थी, वो भी खत्म हो गई। पैसों की तंगी इतनी ज्यादा हो गई कि परीक्षा की तैयारी जारी रखना नामुमकिन सा लगने लगा। इस बुरे वक्त में मनोज वापस अपने गांव लौट आए और पैसे जुटाने के लिए मजदूरी तक की। खून-पसीना एक करके उन्होंने कुछ पैसे जमा किए और फिर से तैयारी के लिए इंदौर का रुख किया। इंदौर जैसे बड़े शहर में अपना और पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए उन्होंने वहां भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया और एक कोचिंग सेंटर में काम किया।
40 बार मिली नाकामी का दर्द
अपने 12 साल लंबे सफर में मनोज करीब 40 प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठे। उन्होंने पुलिस कांस्टेबल, फॉरेस्ट गार्ड, पटवारी, ऑडिटर और एडमिनिस्ट्रेटर जैसी कई भर्तियों में अपनी किस्मत आजमाई। इसके अलावा उन्होंने SSC (एमटीएस, एएचएसएल, सीजीएल) की परीक्षाएं भी दीं। एमपीपीएससी की बात करें तो उन्होंने राज्य सेवा, रजिस्ट्रार और असिस्टेंट प्रोफेसर जैसी भर्तियों के एग्जाम भी दिए। कई परीक्षाओं में वे आखिरी दौर तक पहुंचे, लेकिन फाइनल मेरिट लिस्ट में उनका नाम नहीं आ पाता था।
ऐसा रहा MPPSC
एमपीपीएससी की परीक्षा में मनोज का सफर किसी संघर्षपूर्ण कहानी से कम नहीं रहा। उन्होंने इस परीक्षा को एक-दो नहीं, बल्कि 9 बार दिया। सबसे खास बात यह रही कि मनोज ने हर बार प्रीलिम्स परीक्षा पास की, यानी 9 में से 9 बार उन्होंने शुरुआती पड़ाव पार किया। इसके बाद उन्होंने 8 बार मेन्स परीक्षा भी सफलतापूर्वक पास की और इंटरव्यू तक पहुंचे। वह 7 बार इंटरव्यू राउंड में शामिल हुए, लेकिन हर बार अंतिम चयन से कुछ कदम दूर रह गए। बार-बार मिली इस निराशा के बावजूद मनोज ने हार नहीं मानी और एमपीपीएससी के इस चक्रव्यूह को तोड़ने की अपनी जिद बरकरार रखी। बार-बार दिल टूटने के बावजूद मनोज ने अपनी किताबों से दूरी नहीं बनाई। आखिर में उनकी तपस्या रंग लाई और 2024 की राज्य सेवा परीक्षा में उन्होंने बाजी मार ली।
मनोज एक लोअर-मिडिल क्लास किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं और गड़रिया समाज से आते हैं। उन्होंने बताया कि उनके परिवार ने हमेशा उनका साथ दिया, लेकिन एक लंबे वक्त तक बेरोजगार रहने की वजह से घर वालों की चिंता भी बढ़ने लगी थी। उम्र बढ़ रही थी, बहनों की शादी करनी थी और घर वालों को लगने लगा था कि अब मनोज को कोई ढंग की नौकरी कर लेनी चाहिए ताकि घर में दो पैसे आ सकें। समाज और आस-पड़ोस के लोगों को भी मनोज से कोई खास उम्मीद नहीं बची थी।
कैसा था मनोज का रूटीन?
मनोज की तैयारी का तरीका बेहद अनुशासित और लगातार मेहनत से भरा हुआ था। वह रोज सुबह करीब 6 बजे उठकर सीधे लाइब्रेरी पहुंच जाते थे। दिन में कुछ समय के लिए वापस आकर खुद खाना बनाते और खाने के बाद फिर लाइब्रेरी लौट जाते थे। इसके बाद देर रात 12 से 1 बजे तक पढ़ाई जारी रहती थी। सुबह के समय वह कोचिंग सेंटर में बच्चों को पढ़ाने का काम भी करते थे। इसके बावजूद वह रोजाना करीब 6 से 8 घंटे सेल्फ स्टडी के लिए निकाल लेते थे।
मनोज ने अपनी तैयारी को सिर्फ घंटों तक किताबों के सामने बैठने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि एक रणनीति के साथ आगे बढ़ाया। उन्होंने पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों का बारीकी से विश्लेषण किया और उसी के आधार पर अपनी तैयारी की दिशा तय की। इसके साथ ही उन्होंने बड़ी संख्या में मॉक टेस्ट दिए, अपनी गलतियों को पहचाना और उन्हें दोबारा न दोहराने पर काम किया। वह दोस्तों के साथ अलग-अलग टॉपिक्स पर चर्चा भी करते थे, जिससे विषयों को समझने और अपनी कमियों को दूर करने में मदद मिलती थी। इस तरह अनुशासन, सेल्फ स्टडी, प्रैक्टिस और लगातार अपनी गलतियों से सीखने की आदत उनकी तैयारी की सबसे बड़ी ताकत बनी।
मनोज के अफसर बनने की खबर उनके पूरे परिवार के लिए बेहद भावुक कर देने वाला पल था। उनके घर वालों का कहना था, "भगवान के घर देर हो सकती है, लेकिन अंधेर नहीं। जब उसने इतनी मेहनत की है, तो कामयाबी तो मिलनी ही थी।" मनोज अपनी इस शानदार कामयाबी का पूरा श्रेय अपने माता-पिता के आशीर्वाद, परिवार के सपोर्ट और 'मां नर्मदा की कृपा' को देते हैं।