बैतूल में 4246 से घटकर 2 पर पहुंचे मलेरिया केस: मछलियों वाले 123 साल पुराने फॉर्मूले से बैतूल का मलेरिया नियंत्रण का मॉडल बना - Betul News

मध्यप्रदेश का बैतूल जिला कभी मलेरिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता था। बारिश शुरू होते ही वनांचल और ग्रामीण इलाकों में मलेरिया तेजी से फैल जाता था। कई गांवों में एक साथ लोग बुखार की चपेट में आ जाते थे। जानलेवा प्लास्मोडियम फाल्सीपेरम (PF)

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लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। वर्ष 2014 में जहां जिले में 4246 मलेरिया मरीज मिले थे, वहीं वर्ष 2026 में अब तक सिर्फ 2 मरीज सामने आए हैं। दोनों मरीज प्लास्मोडियम विवैक्स (PV) से संक्रमित हैं और दोनों ही बाहर के जिले से आए हैं। जिले में फिलहाल स्थानीय संक्रमण का कोई मामला सामने नहीं आया है।

इस बदलाव के पीछे सिर्फ दवाइयां और कीटनाशक छिड़काव ही नहीं, बल्कि एक छोटी सी मछली ने भी बड़ी भूमिका निभाई है। यह है गम्बूसिया (Gambusia Affinis), जिसे पूरी दुनिया में "मच्छरों की दुश्मन" यानी Mosquitofish के नाम से जाना जाता है।

गम्बूसिया मछली

गम्बूसिया मछली

123 साल पुराना तरीका, आज भी कारगर

मच्छरों के नियंत्रण के लिए मछलियों का इस्तेमाल कोई नया तरीका नहीं है। सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों में इसका उपयोग वर्ष 1903 से किया जा रहा है। मच्छरों के लार्वा खाने वाली मछलियों में गाम्बूसिया एफिनिस (Gambusia affinis) को सबसे प्रभावी माना जाता है। इसके अलावा गप्पी (Poecilia reticulata) मछली का भी उपयोग किया जाता है, लेकिन मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रमों में गाम्बूसिया को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है। यह मछली पानी में मौजूद मच्छरों के लार्वा को खाकर उनकी संख्या को नियंत्रित करती है, जिससे मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों की नई पीढ़ी तैयार नहीं हो पाती।

बैतूल में तैयार होती हैं लाखों गम्बूसिया मछलियां

बैतूल जिला मलेरिया कार्यालय में ही गाम्बूसिया मछलियों की विशेष हैचरी तैयार की गई है। यहां करीब 25×40 फीट लंबे और लगभग 8 फीट गहरे तालाबनुमा पौंड में सालभर लाखों मछलियों का पालन किया जाता है। बारिश शुरू होने के साथ ही इन मछलियों को जिले के अलग-अलग जलस्रोतों में छोड़ा जाता है। इसके अलावा शहर के कई तालाबों में भी इनका संरक्षण किया गया है, ताकि जरूरत पड़ने पर बड़ी संख्या में इन्हें दूसरे क्षेत्रों में छोड़ा जा सके।

तैयार की जा रहीं लाखों गम्बूसिया मछलियां

तैयार की जा रहीं लाखों गम्बूसिया मछलियां

गूगल अर्थ से खोजे गए 2 हजार जलस्रोत

इस बार स्वास्थ्य विभाग ने तकनीक का इस्तेमाल करते हुए जिले के करीब 2000 जलस्रोतों की पहचान गूगल अर्थ के माध्यम से की है। इन चिन्हित जलस्रोतों में करीब 3 लाख गम्बूसिया मछलियां छोड़े जाने की योजना है। अधिकारियों का दावा है कि डिजिटल मैपिंग के जरिए जलस्रोतों की पहचान करने वाला बैतूल प्रदेश का पहला जिला है।

गूगल अर्थ की मदद से खोजे जाएंगे 2,000 जलस्रोत, मत्स्य पालन को बढ़ावा देने छोड़ी जाएंगी 3 लाख मछलियां

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आखिर क्यों खास है गम्बूसिया मछली?

गम्बूसिया आकार में छोटी लेकिन बेहद मजबूत मछली होती है। यह तालाब, कुएं, गड्ढों, उथले जलाशयों और धीमे बहाव वाले पानी में आसानी से जीवित रह सकती है। इस मछली को पालने के लिए किसी विशेष भोजन की आवश्यकता नहीं होती। यह पानी में मौजूद काई, छोटे जलीय जीव और सबसे ज्यादा मच्छरों के लार्वा खाती है। पूर्ण विकसित गम्बूसिया मछली प्रतिदिन लगभग 100 से 300 मच्छरों के लार्वा खा सकती है। यही कारण है कि जिस जलस्रोत में इसे छोड़ा जाता है, वहां मच्छरों के प्रजनन की संभावना काफी कम हो जाती है।

गम्बूसिया मछली बनी सबसे बड़ा हथियार

गम्बूसिया मछली बनी सबसे बड़ा हथियार

एक बार छोड़ी तो वर्षों तक करती है काम

मलेरिया नियंत्रण में गम्बूसिया (Gambusia affinis) मछली की अहम भूमिका रही। इसे दुनिया भर में "Mosquitofish" यानी "मच्छरों की दुश्मन" कहा जाता है। यह मछली तालाबों, पोखरों और जलभराव वाले क्षेत्रों में छोड़ी जाती है, जहां यह मच्छरों के लार्वा खाकर उनकी संख्या तेजी से कम करती है। इससे मच्छरों का प्रजनन रुकता है और मलेरिया फैलने की संभावना काफी घट जाती है। स्वास्थ्य विभाग ने जिले के कई जलस्रोतों में गम्बूसिया मछलियां छोड़कर जैविक नियंत्रण (Biological Control) की प्रभावी रणनीति अपनाई।

विशेषज्ञों के अनुसार, गम्बूसिया एक बार किसी जलस्रोत में स्थापित हो जाए तो लंबे समय तक वहां रहकर अपनी संख्या बढ़ाती रहती है।मादा गम्बूसिया करीब 3 से 6 महीने में प्रजनन योग्य हो जाती है और अपने जीवनकाल में लगभग 900 से 1200 बच्चे पैदा कर सकती है। यह मछली 24 से 34 डिग्री सेल्सियस तापमान में सबसे बेहतर तरीके से विकसित होती है, लेकिन इससे कम तापमान को भी सहन कर सकती है। यही कारण है कि भारत के अधिकांश हिस्सों में इसका उपयोग सफल रहा है।

कम खर्च में ज्यादा असर देने वाला उपाय

रासायनिक दवाओं और कीटनाशकों की तुलना में गम्बूसिया मछली का उपयोग बेहद कम खर्चीला है। इसे पालने के लिए महंगे संसाधनों या विशेष भोजन की जरूरत नहीं होती। यह प्राकृतिक रूप से उपलब्ध भोजन पर जीवित रहती है और लगातार मच्छरों के लार्वा को खत्म करती रहती है। इसलिए इसे पर्यावरण के अनुकूल जैविक नियंत्रण तकनीक माना जाता है।

कम खर्च में ज्यादा असर देने वाला उपाय

कम खर्च में ज्यादा असर देने वाला उपाय

2016 से शुरू हुआ मिशन, बदली पूरी तस्वीर

जिला मलेरिया अधिकारी जितेंद्र सिंह राजपूत के अनुसार, वर्ष 2016 में बैतूल आने के समय मलेरिया नियंत्रण सबसे बड़ी चुनौती थी। उस समय जिले की भौगोलिक स्थिति भी बीमारी के प्रसार के लिए अनुकूल थी। घने जंगल, दुर्गम गांव, खराब सड़कें और बारिश में कट जाने वाले रास्तों के कारण स्वास्थ्य टीमों को कई जगह पहुंचने में परेशानी होती थी। वर्ष 2015 में जिले में 3600 और वर्ष 2016 में 1946 मलेरिया मरीज सामने आए थे।इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने गांव-गांव सर्वे, बुखार जांच, समय पर इलाज, कीटनाशक छिड़काव, मच्छरदानी वितरण और जैविक नियंत्रण जैसे उपायों पर लगातार काम किया।

मच्छर हैं, लेकिन पैरासाइट नहीं

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, जिले में मच्छरों की मौजूदगी अभी भी है, लेकिन उनमें मलेरिया फैलाने वाला पैरासाइट नहीं मिल रहा है।करीब 20 सदस्यीय फील्ड टीम लगातार गांवों में निगरानी कर रही है। बुखार के मरीजों की स्लाइड बनाकर जांच की जाती है और संदिग्ध मरीजों का तत्काल उपचार शुरू किया जाता है। हर साल जून महीने में मलेरिया निरोधक माह के दौरान रथ के माध्यम से मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया से बचाव को लेकर जागरूकता अभियान चलाया जाता है। वर्ष 2024 में जिले के हाई रिस्क क्षेत्रों में 2.60 लाख कीटनाशकयुक्त मच्छरदानियां भी वितरित की गई थीं।

बैतूल में ऐसे घटा मलेरिया का ग्राफ

चुनौतियों को पछाड़कर मलेरिया नियंत्रण में मिली बड़ी सफलता, मामलों में आई भारी गिरावट

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बैतूल बना मलेरिया नियंत्रण का मॉडल

बैतूल में मलेरिया के मामलों में आई गिरावट केवल दवाइयों का परिणाम नहीं है। इसके पीछे वैज्ञानिक निगरानी, समय पर जांच, ग्रामीण जागरूकता, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मेहनत और गम्बूसिया जैसी जैविक तकनीकों का बड़ा योगदान है।

सिर्फ स्प्रे नहीं, कई मोर्चों पर एक साथ हुआ काम

  • स्वास्थ्य विभाग ने मलेरिया नियंत्रण के लिए बहुस्तरीय अभियान चलाया।
  • गांव-गांव जाकर बुखार सर्वे किया गया।
  • हर संदिग्ध मरीज की स्लाइड और रैपिड टेस्ट से जांच की गई।
  • संक्रमित मरीजों को तुरंत दवाएं उपलब्ध कराई गईं।
  • प्रभावित क्षेत्रों में नियमित कीटनाशक छिड़काव किया गया।
  • हजारों परिवारों को मच्छरदानियां वितरित की गईं।
  • आशा और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के माध्यम से लोगों को जागरूक किया गया।
  • जलभराव वाले स्थानों पर विशेष निगरानी रखी गई।

जनजागरूकता ने भी निभाई अहम भूमिका

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि केवल सरकारी योजनाओं से ही नहीं, बल्कि लोगों की बढ़ती जागरूकता से भी मलेरिया पर नियंत्रण संभव हो पाया। अब ग्रामीण क्षेत्रों में बुखार होने पर लोग तुरंत स्वास्थ्य केंद्र पहुंचते हैं, समय पर जांच कराते हैं और इलाज शुरू कर देते हैं। इससे संक्रमण फैलने की संभावना काफी कम हो गई है।ए हाई रिस्क माना जाने वाला बैतूल अब बीमारी नियंत्रण का उदाहरण बन रहा है। स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य अब जिले में जीरो लोकल मलेरिया केस बनाए रखना है, ताकि आने वाले वर्षों में बैतूल पूरी तरह मलेरिया मुक्त जिले की दिशा में आगे बढ़ सके।