पठानकोट-शहीद कमलजीत की समाधि पर 54 वर्षों से राखी: जालंधर निवासी नायक 1971 में हुए शहीद, कैंसर के अंतिम स्टेज में बहन नहीं टूटने दी डोर - Pathankot News

भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित सिंबल गांव की ‘बीएसएफ नायक कमलजीत पोस्ट’ एक अनूठी और भावुक परंपरा की गवाह है। यहां 1971 के भारत-पाक युद्ध में देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले रेडियो ऑपरेटर शहीद नायक कमलजीत सिंह की समाधि पर प

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यह पोस्ट और समाधि हर साल देशप्रेम और भाई-बहन के पवित्र रिश्ते की एक बेमिसाल कहानी बयां करती है।

43 वर्षों तक बहन अमृतपाल कौर ने निभाया फर्ज

शहीद नायक कमलजीत सिंह जालंधर के रहने वाले थे। युद्ध में उनके शहीद होने के बाद, उनकी सगी बहन अमृतपाल कौर ने लगातार 43 वर्षों तक अपने इकलौते भाई की समाधि पर आकर राखी बांधी। वह हर साल बिना चूके भारत-पाक सीमा की जीरो लाइन पर स्थित इस दुर्गम पोस्ट पर पहुंचती थीं, शहीद भाई की समाधि पर तिलक लगाती थीं और उनकी याद में भावुक हो उठती थीं।

कैंसर से जंग के बीच भी नहीं टूटी डोर

शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के महासचिव कुंवर रविन्द्र सिंह विक्की ने एक भावुक संस्मरण साझा करते हुए बताया कि लगभग दस वर्ष पहले अमृतपाल कौर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हो गई थीं। उनके निधन से महज तीन दिन पहले, परिषद के सदस्य जालंधर के एक अस्पताल में उनसे मिलने गए थे। बीमारी की अंतिम स्थिति में होने के बावजूद उनके मन में अपने शहीद भाई के प्रति अगाध प्रेम और रक्षाबंधन की परंपरा को लेकर गहरी चिंता थी।

निधन के बाद चचेरी बहन ने संभाली जिम्मेदारी

दस वर्ष पहले अमृतपाल कौर का कैंसर के कारण निधन हो गया। अपनी मृत्यु के समय तक वह इस परंपरा को निभाती रहीं। उनके जाने के बाद, उनकी चचेरी बहन अमितपाल कौर ने इस जिम्मेदारी को आगे बढ़ाया और सिंबल पोस्ट पर जाकर शहीद नायक कमलजीत सिंह की समाधि पर राखी बांधी।

बीएसएफ और परिषद आगे बढ़ा रहे हैं परंपरा

अमितपाल कौर ने उस समय सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवानों और शहीद सैनिक परिवार सुरक्षा परिषद के सदस्यों को इस पवित्र परंपरा को कभी न टूटने देने का वचन दिया था। हालांकि, कतिपय कारणों से वह उसके बाद दोबारा पोस्ट पर राखी बांधने नहीं आ सकीं, लेकिन सीमा पर तैनात बीएसएफ के जवान और देश के शहीदों का सम्मान करने वाली संस्थाएं आज भी इस अनूठी परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ जीवित रखे हुए हैं।

हर साल रक्षाबंधन पर देश के इस वीर सपूत की समाधि को सजाया जाता है और तिरंगे की छांव में उन्हें याद कर राखी अर्पित की जाती है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रभक्ति की एक महान मिसाल है।