6 राज्यों में बिछेगा 1800 किमी का नया पाइपलाइन जाल, अब बिना रुकावट सीधे पहुंचेगी LPG

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देशभर में रसोई गैस की बढ़ती मांग और इसकी सुरक्षित आपूर्ति को ध्यान में रखते हुए सरकार ने एक बड़ा रणनीतिक कदम उठाया है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड यानी पीएनजीआरबी ने देश के छह प्रमुख राज्यों में लगभग 1800 किलोमीटर लंबी नई एलपीजी पाइपलाइन बिछाने के प्रस्ताव को अपनी अंतिम मंजूरी दे दी है। इस पूरे प्रोजेक्ट पर करीब सात हजार करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा। इस बड़े विस्तार की जिम्मेदारी सरकारी क्षेत्र की प्रमुख कंपनी गेल इंडिया लिमिटेड को सौंपी गई है। इस महत्वाकांक्षी योजना के जमीन पर उतरने के बाद देश में अधिकृत एलपीजी पाइपलाइन का कुल नेटवर्क लगभग पच्चीस प्रतिशत बढ़कर 9500 किलोमीटर के पार पहुंच जाएगा।

आयातित गैस की सप्लाई होगी आसान

भारत में घरेलू गैस सिलेंडरों की जरूरत को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर एलपीजी का आयात किया जाता है। समुद्र के रास्ते आने वाली गैस पहले तटीय आयात टर्मिनलों पर पहुंचती है और फिर वहां से देश के भीतरी हिस्सों में स्थित बॉटलिंग प्लांट्स और घरों तक भेजी जाती है। वर्तमान में लंबी दूरी तक गैस ले जाने के लिए भारी संख्या में सड़क टैंकरों का इस्तेमाल करना पड़ता है। नए पाइपलाइन नेटवर्क के बनने से तटीय टर्मिनलों से देश के अंदरूनी इलाकों तक भारी मात्रा में गैस की आवाजाही बेहद आसान, तेज और भरोसेमंद हो जाएगी।

तीन नए रूटों से जुड़ेगा बड़ा इलाका

नियामक की ओर से मंजूर की गई इस योजना में मुख्य रूप से तीन बड़े रूट शामिल किए गए हैं। पहला रूट 556 किलोमीटर लंबा है जो तेलंगाना के चेरलापल्ली से शुरू होकर महाराष्ट्र के नागपुर तक जाएगा। दूसरा बड़ा रूट 611 किलोमीटर का है, जिसके जरिए उत्तर प्रदेश के झांसी को उत्तराखंड के सितारगंज से सीधे जोड़ा जाएगा। तीसरा रूट 633 किलोमीटर लंबा होगा, जो महाराष्ट्र के शिक्रापुर से निकलकर कर्नाटक के हुबली और गोवा तक पहुंचेगा। इन तीनों रूटों के तैयार होने से उत्तर, पश्चिम और दक्षिण भारत के एक बड़े हिस्से में गैस सप्लाई का एक मजबूत चक्र तैयार हो जाएगा।

सड़क हादसों पर लगेगी लगाम

एलपीजी गैस का सड़क मार्ग से परिवहन हमेशा जोखिम भरा माना जाता है। हाईवे पर चलने वाले बड़े गैस टैंकर अक्सर दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं, जिससे जान-माल का भारी नुकसान होने का डर बना रहता है। सुरक्षा के लिहाज से पाइपलाइन को सबसे सुरक्षित और टिकाऊ माध्यम माना जाता है। इस प्रोजेक्ट के पूरा होते ही हाईवे पर दौड़ने वाले हजारों टैंकरों की संख्या में भारी कमी आएगी। इससे न केवल सड़कों पर ट्रैफिक का दबाव घटेगा बल्कि खतरनाक हादसों की संभावना भी न के बराबर रह जाएगी।

पर्यावरण को लाभ और कम होगा खर्च

सड़क मार्ग से हजारों ट्रकों और टैंकरों के चलने से भारी मात्रा में डीजल की खपत होती है, जिससे प्रदूषण बढ़ता है। भूमिगत पाइपलाइन से गैस भेजने पर किसी भी तरह का कार्बन उत्सर्जन नहीं होता है। इसके साथ ही लंबी दूरी के लिए पाइपलाइन से ईंधन भेजना सड़क परिवहन की तुलना में काफी सस्ता पड़ता है। परिवहन लागत कम होने से तेल और गैस कंपनियों का लॉजिस्टिक्स खर्च घटेगा, जिसका सकारात्मक असर पूरे ऊर्जा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

भविष्य की ऊर्जा जरूरतों की तैयारी

देश में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना और शहरीकरण के विस्तार के बाद एलपीजी का उपयोग करने वाले परिवारों की संख्या में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है। बढ़ती आबादी के साथ आने वाले वर्षों में ईंधन की यह मांग और तेजी से बढ़ेगी। ऐसे में पुराना ढांचा भविष्य की मांग को संभालने के लिए नाकाफी साबित हो सकता था। सात हजार करोड़ रुपये की यह नई परियोजना आने वाले कई दशकों तक देश के ऊर्जा ढांचे को मजबूती देने का काम करेगी। छह राज्यों में फैले इस नए नेटवर्क से बॉटलिंग प्लांट्स को चौबीसों घंटे बिना किसी रुकावट के गैस मिलती रहेगी, जिससे आम उपभोक्ताओं को समय पर सिलेंडर मिलने में कभी कोई परेशानी नहीं होगी।