ईरान में हिजाब की जंग: महिलाएं क्यों नहीं मान रहीं अयातुल्लाओं का फरमान? 6 सवालों से समझिए

ईरान में हिजाब को लेकर टकराव फिर तेज हो गया है. कई ईरानी महिलाएं अब सार्वजनिक जगहों पर बिना हिजाब दिखाई दे रही हैं, जबकि हार्डलाइनर नेता सरकार पर फिर सख्ती से कानून लागू करने का दबाव बना रहे हैं. यानी सत्ता फिर से सख्ती चाहती है, जबकि महिलाएं बिना हिजाब सार्वजनिक जीवन में मौजूद रहकर कानून को चुनौती दे रही हैं. 1979 से लागू अनिवार्य हिजाब के खिलाफ शुरू हुआ विरोध अब बड़े आंदोलन से आगे बढ़कर समाज के एक हिस्से की रोजमर्रा की जिंदगी और विरोध का तरीका बन चुका है.

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1. ईरान में हिजाब इतना बड़ा राजनीतिक मुद्दा क्यों है?

ईरान में अनिवार्य हिजाब सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि इस्लामिक रिपब्लिक की व्यवस्था का हिस्सा है. 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद महिलाओं के पहनावे पर राज्य का नियंत्रण बढ़ा और 1983 में सार्वजनिक जगहों पर हिजाब अनिवार्य कर दिया गया. नियम के मुताबिक महिलाओं को बाल ढकने और शरीर को ढीले कपड़ों से ढकने की जरूरत होती है. नियम तोड़ने पर पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है. इसके लिए मोरैलिटी पुलिस यानी गश्त-ए-एरशाद बनाई गई. इसकी टीमें सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं के पहनावे की निगरानी करती रही हैं.

2. 2022 में ऐसा क्या हुआ, जिसने पूरी लड़ाई बदल दी?

16 सितंबर 2022 को 22 साल की महसा जिना अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत हो गई. उन्हें 13 सितंबर को तेहरान में गलत तरीके से हिजाब पहनने के आरोप में पकड़ा गया था. उनकी मौत के बाद पूरे ईरान में प्रदर्शन शुरू हुए और वुमन, लाइफ, फ्रीडम आंदोलन दुनिया भर में चर्चा का विषय बना.

महिलाओं ने सड़कों पर हिजाब उतारा, बाल काटे और सरकार के खिलाफ नारे लगाए. सरकार ने प्रदर्शन को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर कार्रवाई की. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक अधिकारियों ने 22 हजार से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी को स्वीकार किया था. मानवाधिकार संगठनों के अनुसार सैकड़ों लोगों की मौत हुई. यही वजह है कि आज बिना हिजाब सार्वजनिक जगह पर निकलना सिर्फ ड्रेस का चुनाव नहीं रह गया है. यह कई महिलाओं के लिए उस व्यवस्था को चुनौती देने का प्रतीक बन चुका है.

3. सरकार ने महिलाओं को रोकने के लिए क्या-क्या किया?

2022 के बाद ईरान ने सिर्फ सड़क पर पुलिस तैनात करने के बजाय तकनीक और निगरानी का भी इस्तेमाल बढ़ाया. 2023 में आई रायटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, बिना हिजाब महिलाओं की पहचान के लिए सार्वजनिक जगहों के कैमरों और चेहरे पहचानने वाली तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा था. इसके अलावा महिलाओं पर जुर्माना, गिरफ्तारी और दूसरी पाबंदियों का खतरा बना रहा. सरकार ने कारोबारों को भी हिजाब नियम लागू कराने का माध्यम बनाया. 2024 में संसद से पास हिजाब एंड चैस्टिटी कानून में पहले से ज्यादा कड़े प्रतिबंध और सजा का प्रावधान किया गया.

4. फिर महिलाएं अब भी बिना हिजाब क्यों निकल रही हैं?

क्योंकि 2022 के बाद विरोध का तरीका बदल गया है. पहले हजारों लोग सड़कों पर उतरते थे, अब कई महिलाएं बिना हिजाब सामान्य जिंदगी जीकर विरोध दर्ज करा रही हैं. 2025 में छपी एक स्टडी में भी बताया गया था कि बड़े पैमाने पर संगठन और नेतृत्व पर कार्रवाई के बाद महिलाओं का प्रतिरोध ज्यादा छोटा, बिखरा हुआ और नेतृत्वविहीन हुआ, लेकिन सार्वजनिक जगहों पर बिना हिजाब दिखना उसका महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा.

यही कारण है कि सरकार के लिए समस्या सिर्फ कुछ प्रदर्शनकारियों की नहीं है. अगर हजारों-लाखों महिलाएं रोजमर्रा की जिंदगी में नियम को नजरअंदाज करने लगें तो हर व्यक्ति को पुलिस से रोकना मुश्किल हो जाता है.

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5. 2026 में फिर हिजाब पर सख्ती क्यों बढ़ रही है?

2026 में ईरान युद्ध, सुरक्षा संकट और आर्थिक दबाव से गुजर रहा है. युद्ध के दौरान हिजाब लागू कराने का मुद्दा पीछे चला गया था. लेकिन जैसे ही लड़ाई कमजोर पड़ी, हार्डलाइनर फिर से इसे सत्ता और धार्मिक पहचान का मुद्दा बनाने लगे. हार्डलाइनर अब उस हिजाब एंड चैस्टिटी कानून को फिर लागू कराने का दबाव बढ़ा रहे हैं, जिसके लागू होने को पहले रोक दिया गया था. साथ ही बिना हिजाब महिलाओं को लेकर कैफे और अन्य कारोबारों पर कार्रवाई की खबरें भी सामने आई हैं.

यानी ईरान के सत्ता तंत्र के भीतर भी इस मुद्दे पर एकमत नहीं है. एक तरफ हार्डलाइनर इसे धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान का सवाल मानते हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार को डर है कि ज्यादा सख्ती फिर से बड़े सामाजिक विरोध को जन्म दे सकती है.

6. क्या महिलाएं यह लड़ाई जीत रही हैं?

कानूनी तौर पर नहीं, लेकिन सामाजिक स्तर पर तस्वीर जरूर बदल गई है. ईरान में अनिवार्य हिजाब अभी खत्म नहीं हुआ है. सरकार के पास कानून, पुलिस, निगरानी और न्यायिक कार्रवाई के साधन मौजूद हैं. लेकिन दूसरी तरफ 2022 के बाद महिलाओं के व्यवहार में जो बदलाव आया है, उसे सिर्फ पुलिस कार्रवाई से वापस बदलना मुश्किल दिखाई देता है.

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शुभेंदु प्रताप भूमंडल

शुभेंदु प्रताप भूमंडल

पत्रकारिता में बीते 5 साल से सक्रिय हैं. नेशनल और इंटरनेशनल न्यूज राइटिंग का अनुभव. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से साइंस में ग्रेजुएशन, फिर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता और वीडियो प्रोडक्शन की पढ़ाई. दैनिक भास्कर डिजिटल से करियर की शुरुआत. बतौर न्यूज ब्रीफ एडिटर भास्कर डिजिटल में 800 से ज्यादा बाइलाइन स्टोरी. वीडियो स्क्रिप्टिंग का भी अनुभव. अगस्त 2025 से टीवी9 डिजिटल के साथ नई पारी का आगाज.

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