स्वास्थ्य पर 60 गुना ज्यादा खर्च करते हैं अमीर देश, आकंड़ों से समझिए भारत समेत पूरी दुनिया का हाल

स्वास्थ्य पर 60 गुना ज्यादा खर्च करते हैं अमीर देश, आकंड़ों से समझिए भारत समेत पूरी दुनिया का हाल

हेल्थ पर कितना खर्च करता है भारत?

दुनिया के अमीर और गरीब देशों के बीच स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च की खाई बेहद चौड़ी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और वर्ल्ड बैंक के ताजा आंकड़ों पर आधारित ऑवर वर्ल्ड इन डेटा के एनालिसिस के मुताबिक, हाई-इनकम यानी अमीर देश हर व्यक्ति पर सालाना औसतन करीब 6.98 लाख रुपये स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं, जबकि लो-इनकम यानी सबसे गरीब देशों में यह आंकड़ा महज 11,097 से 11,958 रुपये के बीच है. इसकी तुलना में भारत में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य खर्च सालाना करीब 33,098 रुपये है. यानी दुनिया के सबसे अमीर देश, सबसे गरीब देशों के मुकाबले स्वास्थ्य पर करीब 60 गुना ज्यादा खर्च कर रहे हैं, जबकि भारत के मुकाबले अमीर देशों का खर्च 21 गुना ज्यादा है.

दुनिया कितना खर्च करती है

ऑवर वर्ल्ड इन डेटा ने 2023 के आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट में बताया है कि इसमें सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह के स्वास्थ्य खर्च को शामिल किया गया है. साथ ही अलग-अलग देशों में रहने की लागत के अंतर को भी ध्यान में रखा गया है. इसके मुताबिक, इनकम के लेवल के आधार पर दुनिया चार हिस्सों में बंटी है. हाई-इनकम देशों में प्रति व्यक्ति खर्च करीब 6.98 लाख रुपये है, अपर-मिडिल-इनकम देशों में यह घटकर लगभग 1.27 लाख रुपये रह जाता है, लोअर-मिडिल-इनकम देशों में यह और गिरकर करीब 31,568 रुपये पर आ जाता है और लो-इनकम देशों में यह सिमटकर केवल 11,097 रुपये रह जाता है.

Rich Vs Poor Country

यह सिर्फ पैसों का अंतर नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर लोगों की सेहत और उम्र पर भी पड़ता है. रिपोर्ट के अनुसार गरीब देशों में लोगों की औसत उम्र अमीर देशों की तुलना में करीब 16 साल कम है. इसके अलावा शिशु मृत्यु दर, डिलीवरी के दौरान होने वाली मौतें और बीमारियों का बोझ भी गरीब देशों में काफी ज्यादा है. यानी पैसों और संसाधनों की यह असमानता सीधे तौर पर लोगों की सेहत में अंतर में बदल जाती है.

भारत की स्थिति कहां ठहरती है

रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य खर्च करीब 33,098 रुपये है, जो अमीर देशों के औसत के 20वें हिस्से से भी कम है, लेकिन लो-इनकम देशों के औसत से करीब तीन गुना ज्यादा है. दिलचस्प बात यह है कि भारत का आंकड़ा लोअर-मिडिल-इनकम देशों के औसत खर्च के लगभग बराबर है. यह तुलना पर्चेजिंग पावर पैरिटी यानी PPP के आधार पर की गई है, जो अलग-अलग देशों में चीजों और सेवाओं की कीमतों के अंतर को एडजस्ट करती है.

हालांकि, भारत के अपने नेशनल हेल्थ अकाउंट्स के आंकड़े एक अलग तस्वीर दिखाते हैं. वर्ष 2021-22 में देश का कुल स्वास्थ्य खर्च करीब 9.04 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो GDP का 3.83 फीसदी है. प्रति व्यक्ति खर्च की बात करें तो यह मौजूदा कीमतों पर करीब 6,602 रुपये बैठता है. इसमें सरकार का हिस्सा 48 फीसदी है, जबकि परिवारों को अपनी जेब से सीधे 39.4 फीसदी खर्च उठाना पड़ता है, जो प्रति व्यक्ति करीब 2,600 रुपये के बराबर है.

ध्यान देने वाली बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में सरकार की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है. 2013-14 में यह महज 28.6 फीसदी थी, जो 2019-20 में बढ़कर 41.4 फीसदी और 2021-22 में 48 फीसदी तक पहुंच गई. इसके उलट परिवारों पर सीधे खर्च का बोझ घटा है, जो 64.2 फीसदी से घटकर 47.1 फीसदी और फिर 39.4 फीसदी रह गया. फिर भी नए आंकड़े बताते हैं कि आज भी भारत में स्वास्थ्य के खर्च का एक बड़ा हिस्सा लोगों को अपनी जेब से ही चुकाना पड़ता है.

India Health System

स्वास्थ्य खर्च का इतिहास

तमाम आंकड़ों के बीच इन खर्चों के इतिहास को भी समझते हैं. स्वास्थ्य पर होने वाला यह खर्च हमेशा से इतना ज्यादा नहीं रहा. आज के दौर में स्वास्थ्य सेवा को एक “मेरिट गुड” यानी ऐसी जरूरी सुविधा माना जाता है, जो किसी व्यक्ति की पैसे देने की क्षमता के बजाय उसकी जरूरत के आधार पर मिलनी चाहिए. यही सोच कई देशों में स्वास्थ्य को लोगों का बुनियादी अधिकार मानने की वजह भी बनी, लेकिन कुछ पीढ़ियों पहले तक हालात बिल्कुल अलग थे.

मध्यकालीन यूरोप में स्वास्थ्य को किस्मत यानी भाग्य का विषय माना जाता था. यह सोच बाद में मर्केंटिलिज्म और एनलाइटनमेंट के असर में बदलनी शुरू हुई, जब सरकारों ने पब्लिक हेल्थ को बढ़ावा देने में दिलचस्पी दिखानी शुरू की. इतिहासकारों का मानना है कि एनलाइटनमेंट से पहले बीमारी और मौत को ईश्वर की इच्छा और पापों की सजा के तौर पर देखा जाता था. इसलिए धार्मिक जीवन जीना ही बीमारियों से बचने का बड़ा तरीका माना जाता था. कुछ प्रमुख हाई-इनकम देशों के लंबे समय के आंकड़े बताते हैं कि 1880 में इन देशों में सरकारी स्वास्थ्य खर्च GDP के एक फीसदी से भी कम था. 20वीं सदी के शुरुआती दौर में यह तेजी से बढ़ना शुरू हुआ और 1970 आते-आते इन सभी देशों में सरकारी स्वास्थ्य खर्च GDP के दो फीसदी से ऊपर पहुंच चुका था.

बीमा से आया बदलाव

यूरोपीय देशों में स्वास्थ्य खर्च में तेज बढ़ोतरी दूसरे विश्व युद्ध के बाद देखने को मिली. इसकी बड़ी वजह 20वीं सदी के दूसरे हिस्से में मेडिकल फील्ड में हुई बड़ी खोजें थीं, खासकर पेनिसिलिन और दूसरी एंटीबायोटिक दवाओं की खोज. इससे पहले तक हेल्थ सिस्टम का मुख्य फोकस इलाज नहीं, बल्कि इनकम इंश्योरेंस हुआ करता था. यानी बीमारी की वजह से काम न कर पाने वाले लोगों को आर्थिक मदद दी जाती थी. दूसरे विश्व युद्ध से पहले ही यूरोप के कई देशों में कामगारों के लिए पब्लिक हेल्थ इंश्योरेंस काफी हद तक फैल चुका था.

इतिहासकारों के रिसर्च के मुताबिक 1929 तक यूरोप के ज्यादातर देशों में कम से कम वॉलंटरी इंश्योरेंस स्कीम मौजूद थीं और 1935 तक करीब आधी कामकाजी आबादी हेल्थ इंश्योरेंस के दायरे में आ चुकी थी. कुल मिलाकर तस्वीर यह बनती है कि अमीर देश आज भी गरीब देशों के मुकाबले स्वास्थ्य पर करीब 60 गुना ज्यादा खर्च कर रहे हैं और इसका असर लोगों की उम्र और सेहत पर भी दिखाई देता है. भारत इस मामले में लोअर-मिडिल-इनकम देशों के करीब खड़ा है. यहां सरकारी हिस्सेदारी बढ़ी है, लेकिन परिवारों को अब भी अपनी जेब से बड़ा खर्च उठाना पड़ता है.

देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय

देवेश कुमार पांडेय TV9 Hindi में बतौर सब-एडिटर काम कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के अमेठी के रहने वाले देवेश को राजनीति के अलावा इतिहास, साहित्य में दिलचस्पी है.  साल 2024 में भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) के अमरावती कैंपस से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. देवेश को घूमना, लिखना, पढ़ना और पॉडकास्ट सुनना पसंद है.

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