645 इंजेक्शन और वेंटिलेटर के सपोर्ट से बचाई 3 जिंदगी: बाड़मेर जिला अस्पताल के एनेस्थेसिया आईसीयू में भर्ती 3 मरीज जिंदगी की हारी जंग जीते - Barmer News
पहले बाड़मेर जिला अस्पताल से मरीजों को जोधपुर रेफर कर दिया जाता था, लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। बाड़मेर की क्रिटिकल केयर व मेडिसिन टीम ने एक ही समय में एनेस्थेसिया आईसीयू में भर्ती तीन ऐसे अति गंभीर मरीजों की जान बचाई है, जिनका बचना किसी चमत्कार से
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यह तीन केस, जिनमें डॉक्टरों ने दिखाई संजीवनी जैसी ताकत
केस 1: सैचुरेशन 50 के नीचे, बचाई फौजी की जान: 45 वर्षीय आर्मी जवान सीसी भाई तेज बुखार गिरती प्लेटलेट्स और अत्यधिक शॉक की हालत में इमरजेंसी पहुंचे थे। उनका ऑक्सीजन सैचुरेशन 50 से भी नीचे जा चुका था। एक्स-रे में दोनों फेफड़ों में पानी का भराव था। यह एआरडीएस की स्थिति थी, जिसमें मृत्यु दर 12% से 44% तक होती है। घबराए परिजन उन्हें जोधपुर ले जाने का दबाव बना रहे थे, लेकिन क्रिटिकल केयर टीम ने काउंसलिंग कर उन्हें रोका और यहीं हाई-रिस्क वेंटिलेटर व बीपी सपोर्ट पर फौजी की जान बचा ली।
केस 2: 17 साल के पप्पू को लगाए गए 645 एट्रोपिन इंजेक्शन: रामसर के बनवा हुडों की ढाणी निवासी 17 वर्षीय पप्पू खेतों में कीटनाशक के छिड़काव के दौरान अचेत हो गई थी। जहर जहां धड़कन को रोक देता है, वहीं एट्रोपिन धड़कन को 60 से 200 तक पहुंचा देता है। इस बेहद नाजुक संतुलन के बीच आईसीयू में इस युवती को 4 दिन वेंटिलेटर पर रखा गया और 645 लाइफ सेविंग एट्रोपिन इंजेक्शन दिए गए और बचा लिया।
केस 3: सांप का घातक डंक, 5 दिन वेंटिलेटर पर रहकर जीता युवक: फगलिया निवासी 21 वर्षीय लाल खान को रेगिस्तानी पीवणा सांप ने काट लिया था। पीवणा का अत्यधिक न्यूरोटॉक्सिक जहर सीधे नर्वस सिस्टम को पैरालाइज कर देता है। मरीज बेहोश था और उसका एक तरफ का फेफड़ा पूरी तरह प्रभावित हो चुका था। इसके बावजूद डॉक्टरों ने 5 दिन तक उसे वेंटिलेटर और सतत न्यूरो-रेस्पिरेटरी सपोर्ट पर रखकर नया जीवन दिया।
टीम वर्क और मॉनिटरिंग का कमाल
इमरजेंसी में आते ही तीनों मरीजों की तुरंत सीटी स्कैन, एक्स-रे और ब्लड इन्वेस्टिगेशन की गई। फौजी जवान को फ्लूइड रिस्ट्रिक्शन, जहर के मामले में घंटों मॉनिटरिंग और सर्पदंश में न्यूरोमस्कुलर वार्निंग को वेंटिलेटर पर न्यूट्रलाइज किया गया। मेडिसिन प्रोफेसर डॉ. शालू परिहार और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रमेश कटारिया ने सहयोग किया। अस्पताल अधीक्षक डॉ. हनुमानराम चौधरी ने इस सफलता का श्रेय पूरे स्टाफ के टीम वर्क को दिया है।
टीम की सफलता ने साबित कर दिया
डॉक्टर का विजन ओपीसी पॉइजनिंग में 645 एट्रोपिन देना तकनीकी जोखिम और धैर्य दोनों की परीक्षा थी। वहीं, परिजनों के दबाव के बीच फौजी को बचाना और पीवणा के न्यूरोटॉक्सिक असर को काटना शानदार टीम वर्क का नतीजा है। - डॉ. जगदीश कुमावत, एनेस्थेसिया आईसीयू इंचार्ज।