हाईकोर्ट ने आरोपी की 7 साल की सजा रद्द की: उम्र का विवाद था, ट्रायल कोर्ट ने मेडिकल विशेषज्ञों की राय को नजरअंदाज किया - Lucknow News
योगेश सोमवंशी | लखनऊ59 मिनट पहले
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक युवती की उम्र तय करने में ट्रायल कोर्ट की ओर से मेडिकल विशेषज्ञों की राय को अनदेखा करने पर आपत्ति जताई है। न्यायालय ने कहा कि जब डॉक्टरों और रेडियोलॉजिस्ट ने युवती की उम्र करीब 18 वर्ष बताई थी, तो ट्रायल कोर्ट दांत और शारीरिक बनावट के आधार पर उसकी उम्र 14 से 17 वर्ष तय नहीं कर सकता था। विशेषज्ञों की राय को दरकिनार करना सही नहीं था।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने भैया लाल रैदास की अपील मंजूर करते हुए उन्नाव की अपर सत्र अदालत के 8 फरवरी 2013 के फैसले को रद्द कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आईपीसी की धारा 366 के तहत 7 साल की कठोर जेल और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
दस्तावेज सही तरीके से रिकॉर्ड पर साबित नहीं हुए
न्यायालय ने बताया कि रेडियोलॉजिकल जांच से उम्र तय करने में दो साल तक की गलती हो सकती है। इसलिए, मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर घटना के समय युवती की उम्र 20 साल तक होने की संभावना से मना नहीं किया जा सकता। ऐसे में अभियोग पक्ष को यह साबित करना जरूरी था कि घटना के समय युवती निश्चित रूप से नाबालिग थी, लेकिन वह ऐसा करने में कामयाब नहीं रहा।
न्यायालय ने पाया कि युवती के पिता ने एफआईआर में उसकी उम्र नहीं बताई थी। उन्होंने गवाही में भी कहा कि उन्हें बेटी की जन्मतिथि या उम्र की जानकारी नहीं थी। बाद में कक्षा आठ की मार्कशीट में जन्मतिथि 25 सितंबर 1993 दर्ज होने की बात कही गई, लेकिन यह दस्तावेज सही तरीके से रिकॉर्ड पर साबित नहीं हुए।
प्रिंसिपल या जिम्मेदार अधिकारी को नहीं बुलाया गया
न तो मार्कशीट की मूल कॉपी रिकॉर्ड में थी और न ही उसकी कॉपी को सबूत के तौर पर पेश किया गया। संबंधित स्कूल के प्रिंसिपल या किसी जिम्मेदार अधिकारी को भी इसे सही साबित करने के लिए गवाही में नहीं बुलाया गया। इसलिए ट्रायल कोर्ट इस मार्कशीट को उम्र का मुख्य आधार नहीं बना सकता था। न्यायालय ने युवती के बयानों में आए अंतर को भी महत्वपूर्ण माना।
युवती आरोपी के साथ रहना चाहती थी
मजिस्ट्रेट के सामने उसने कहा था कि वह अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई थी। दोनों शादी करना चाहते थे और वह आरोपी के साथ रहना चाहती थी। उसने माता-पिता के पास लौटने से भी इनकार किया था।बाद में अदालत में उसने आरोप लगाया कि आरोपी ने उसे कुछ सुंघाकर बेहोश किया और लुधियाना ले गया। न्यायालय ने कहा कि पीड़िता की अकेली गवाही पर दोषसिद्धि हो सकती है, लेकिन उसके लिए गवाही का पूरी तरह विश्वसनीय होना जरूरी है।
कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि युवती आरोपी के साथ लुधियाना में करीब सात महीने तक रही और इस दौरान उसने बल प्रयोग किए जाने की कोई शिकायत नहीं की। इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन आरोपी के खिलाफ धारा 366 का अपराध संदेह से परे साबित नहीं कर सका। लिहाजा दोषसिद्धि और सात वर्ष की सजा रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।
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