पद्मश्री कैलाश चंद्र पंत नहीं रहे: भोपाल में हिंदी भवन को साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र बनाने वाले पंत का 90 वर्ष की उम्र में निधन
Kailash Chandra Pant: साहित्यकार, समाजसेवा और वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री पंडित कैलाश चन्द्र पंत का शुक्रवार, 31 जुलाई को निधन हो गया। वे लम्बे समय से बीमार चल रहे थे। 90 साल की उम्र में पंडित पंत ने अंतिम सांस ली। इस साल मार्च में उन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने वर्ष 2025 के पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया था।
सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पद्मश्री श्रद्धेय कैलाशचंद्र पंत जी के निधन का समाचार अत्यंत दुखद है। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।
मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में श्री पंत जी लंबे समय तक सक्रिय रहे, उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत को अपने श्रीचरणों… pic.twitter.com/QMKgZFs7qE
— Dr Mohan Yadav (@DrMohanYadav51) July 31, 2026
मुख्यमंत्री ने पद्मश्री पंत को दी श्रद्धांजलि
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पद्मश्री कैलाशचंद्र पंत के निधन श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने अपने X पोस्ट पर लिखा-सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पद्मश्री श्रद्धेय कैलाशचंद्र पंत जी के निधन का समाचार अत्यंत दुखद है। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।
मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में श्री पंत जी लंबे समय तक सक्रिय रहे, उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।
ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोकाकुल परिजनों को असीम दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करें।
बचपन में ही आरएसएस से जुड़े
कैलाश चन्द्र पंत का जन्म 26 अप्रैल 1936 को मध्यप्रदेश के महू नगर में हुआ था। इनके पिता का नाम लीलाधर पंत और मां का नाम हरिप्रिया पंत था। पंत ने साहित्याचार्य एवं साहित्य रत्न के साथ ही हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि अर्जित की थी। आप बचपन से ही आरएसएस से जुड़ गए थे। इसके साथ ही आर्य समाज और संतों के प्रभाव से समाजसेवा के संस्कार प्राप्त हुए।
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विद्यार्थी जीवन से ही स्वावलंबी थे
पद्मश्री पंत महू (इंदौर) में स्वाध्याय विद्यापीठ की स्थापना की तथा राष्ट्र भाषा प्रचार समिति से भी जुड़े। क्रिश्चियन कॉलेज इंदौर के मेधावी और प्रतिभावान छात्र के रूप में जहां साहित्यिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों में आपकी सहभागिता रही वहीं वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भी पुरस्कृत किए गए। विद्यार्थी जीवन में ही स्वावलंबन, अनुशासन एवं अध्यवसाय आपके जीवन के अंग बन चुके थे।
कई अखबारों और पत्रिकाओं के रहे संपादक
शिक्षा पूरी होते ही अदालत की नौकरी के बाद इंदौर के परसराम पुरिया हाई स्कूल में अध्यापन किया। बाद में पंत ने पत्रकारिता को अपनी आजीविका का साधन बनाया और सोशलिस्ट कांग्रेस- दिल्ली, नवभारत भोपाल, नव प्रभात भोपाल के सह संपादक, मासिक शिक्षा प्रदीप के संपादक तथा इंदौर समाचार के संवाददाता रहे। सन् 1977 में साप्ताहिक जनधर्म का प्रकाशन प्रारम्भ किया और 1998 तक उसका संपादन और प्रकाशन किया। इस बीच आपने अनेक महत्वपूर्ण विशेषांक निकाले जिनमें आद्य शंकराचार्य स्मृति अंक, मंत्र - यंत्र - तंत्र विशेषांक, मालव विशेषांक, छत्तीसगढ़ विशेषांक शामिल हैं।
"सारस्वत सम्मान" की स्थापना
जनधर्म की ओर से पंत ने "सारस्वत सम्मान" की स्थापना की। जिससे भवानी प्रसाद मिश्र, नरेश मेहता, शिव मंगल सिंह सुमन सहित देश के अनेक मूर्धन्य साहित्य मनीषियों को सम्मानित किया गया। पंत हिन्दी साहित्य समिति इंदौर के उपसभापति तथा शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल पत्रकारिता ट्रस्ट भोपाल के सचिव रहे।
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हिंदी भवन को साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र बनाया
सन् 1988 में बैजनाथ प्रसाद दुबे के निधन के पश्चात कैलाश चन्द्र पंत को सर्व सम्मति से राष्ट्र भाषा प्रचार समिति का मंत्री, संचालक निर्वाचित किया गया। उन्होंने हिन्दी भवन भोपाल में साहित्यिक गतिविधियों का क्रम प्रारंभ किया। जिनमें साहित्य गोष्ठियों एवं व्याख्यान मालाओं के आयोजन के साथ ही विद्यालयों और महाविद्यालयों को भी साहित्यिक गतिविधियों से जोड़ा गया।
कैलाश चन्द्र पंत के कार्यों में हिन्दी भवन परिसर में पंडित मोतीलाल नेहरू पुस्तकालय की स्थापना, नरेश मेहता गोष्ठी कक्ष, महादेवी वर्मा और वीरेन्द्र तिवारी कक्ष तथा साहित्यकार निवास का निर्माण तथा साहित्यिक पत्रिका अक्षरा का प्रकाशन प्रमुख है। इसके अलावा हिन्दी भवन के संधारण तथा राष्ट्र भाषा प्रचार समिति के आयोजनों के लिए आय के स्थायी साधन निर्मित किए। पंत के नेतृत्व में वर्तमान में हिन्दी भवन प्रदेश का प्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र बन चुका है।
पंत, जहां बाल निकेतन एवं पंडित उद्धवदास मेहता न्यास जैसे संस्थानों के न्यासी रहे, वहीं अनेक सामाजिक संस्थाओं के मार्गदर्शक तथा पदाधिकारी भी रहे। जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के दीक्षित शिष्य थे।
पंत के प्रयासों में यह भी शामिल
पंत के प्रयासों से ही जगद्गुरु स्वामी स्वरूपानंद के द्वारा तात्या टोपे नगर स्थित झरनेश्वर मंदिर का निर्माण एवं विकास कार्य संभव हुआ। शंकराचार्य की प्रेरणा से पंत ने विश्व की सबसे बड़ी भोपाल गैस त्रासदी में दिवंगत आत्माओं की शांति एवं पर्यावरण शुद्धि के लिए 1986 में भोपाल के दशहरा मैदान पर अतिरुद्र महायज्ञ का आयोजन किया तथा फरवरी 94 में आयोजित साध्वी इंदिरा बेटी की भागवत कथा में पूर्ण सहयोग कर आयोजन को सफल बनाया।
पंत की कृतियां
पंत द्वारा रचित एवं संपादित कृतियों में कौन किसका आदमी, धुंध के आर-पार, शब्द का विचार पक्ष, शैलेष मटियानी : सृजन यात्रा, संस्कार संस्कृति और समाज, संकल्प की प्रतीक्षा में प्रमुख हैं। पंत अनेक पत्र-पत्रिकाओं के स्तंभ लेखक भी रहे हैं।
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