'की-होल टू स्कार्स' बुक में बंटवारे की अनकही कहानी: विभाजन में खोया सब कुछ, 90 साल की उम्र में श्याम धवन ने लिखी अपनी आपबीती - Jaipur News
जयपुर1 घंटे पहले
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देश के बंटवारे का दर्द झेल चुके 90 साल के श्याम धवन की जिंदगी अब किताब के रूप में सामने आई है। शनिवार को जयपुर के होटल मेरियट में उनकी किताब 'की-होल टू स्कार्स' का विमोचन किया गया।
धवन ने इस पुस्तक में बंटवारे के दौरान देखे गए हालात, विस्थापन की पीड़ा और जीवन के संघर्षों को अपनी आपबीती के रूप में दर्ज किया है। पुस्तक इतिहास के उस दौर की मानवीय संवेदनाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास करती है।
श्याम धवन का जन्म 1930 में पेशावर (अब पाकिस्तान) में हुआ था। 1947 के बंटवारे के बाद उन्हें अपना घर, कारोबार और अपनों को छोड़कर भारत आना पड़ा। रिफ्यूजी के तौर पर नई जिंदगी शुरू करने के दौरान
उन्होंने जो दर्द, संघर्ष और हालात देखे, वही इस किताब का आधार हैं। किताब उनके बेटे विक्रम धवन ने लिखी है, जबकि पूरी कहानी श्याम धवन की जुबानी है।
देश के बंटवारे का दर्द झेल चुके 90 साल के श्याम धवन की जिंदगी अब किताब के रूप में सामने आई है।
पिता की आंखों देखी कहानी को किताब का दिया रूप
किताब के लेखक विक्रम धवन ने बताया कि उनके पिता अब 90 साल के हो चुके हैं। ऐसे में उनकी यादों को उसी रूप में रिकॉर्ड करना सबसे बड़ा चैलेंज था।
उन्होंने बताया- पाकिस्तान से भारत आए लाखों लोगों ने क्या-क्या परेशानियां झेलीं, यह उनसे बेहतर कोई नहीं बता सकता। मैंने और मेरी सिस्टर ने फैसला किया कि पापा की आंखों देखी कहानी को किताब का रूप दिया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ी समझ सके कि उस दौर में हालात कितने मुश्किल थे। उस समय न आज जैसे संसाधन थे और न ही सुरक्षित सफर की सुविधा, फिर भी लोग हजारों किलोमीटर का सफर तय करके भारत पहुंचे।
शनिवार को जयपुर के होटल मेरियट में उनकी किताब 'की-होल टू स्कार्स' का विमोचन किया गया।
बंटवारे के बाद नई शुरुआत करने वाले परिवारों की कहानी
उन्होंने कहा कि यह सिर्फ उनके पिता की कहानी नहीं, बल्कि उन लाखों परिवारों की कहानी है जिन्हें बंटवारे के बाद सब कुछ छोड़कर नई शुरुआत करनी पड़ी।
मेरे ग्रैंडसन के लिए लिखी है यह किताब
श्याम धवन ने कहा कि यह किताब उन्होंने खास तौर पर अपने परिवार की नई पीढ़ी के लिए लिखवाई है। उन्होंने कहा- मेरे ग्रैंडसन अक्सर अंदाजा लगाते हैं कि हम बंटवारे के बाद भारत कैसे आए होंगे। यह किताब उनके लिए है, ताकि उन्हें पता चले कि उस समय हालात कितने चुनौतीपूर्ण थे। लाखों लोग मारे गए, लाखों लोग माइग्रेट होकर भारत आए। यह सिर्फ मेरी नहीं, उन सभी लोगों की कहानी है जिन्होंने बंटवारे का दर्द झेला।
यह किताब उन लोगों को ट्रिब्यूट है जो आज हमारे बीच नहीं हैं
भावुक होते हुए श्याम धवन ने कहा- इस किताब के जरिए मैं अपने मदर-फादर, अपने दो भाइयों, बहन और उन सभी लोगों को ट्रिब्यूट देता हूं जो आज मेरे बीच नहीं हैं। अगर मैं आज यहां हूं तो उनकी वजह से हूं। यह कहते-कहते उनकी आंखें भर आईं और कुछ पल के लिए वह भावुक हो गए।
विमोचन कार्यक्रम में धवन परिवार, दोस्त, रिश्तेदार और शहर की कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं।
मैंने नफरत नहीं, मदद करने वालों को याद रखना चुना
श्याम धवन ने अपनी किताब का सबसे अहम संदेश भी साझा किया। उन्होंने कहा- मेरे पास एक विकल्प था। हर सर्वाइवर के पास यह विकल्प होता है। आप चाहें तो पूरी जिंदगी उन लोगों को याद रखें, जिन्होंने आपके अपनों की हत्या की, या फिर उन लोगों को याद रखें, जिन्होंने मुश्किल समय में आपकी मदद की। मैंने मदद करने वालों को याद रखना चुना। उन्होंने कहा कि यही सोच उन्हें जिंदगी में आगे बढ़ने की ताकत देती रही।
पेशावर से दिल्ली के रिफ्यूजी कैंप और फिर जयपुर तक का सफर
श्याम धवन का जन्म पेशावर के एक बिजनेस फैमिली में हुआ था। उनके पिता का अफगानिस्तान तक इंपोर्ट-एक्सपोर्ट का कारोबार था। परिवार में चार बहनें और तीन भाई थे। बंटवारे के बाद उन्हें सब कुछ छोड़ना पड़ा। उनका सफर पेशावर से शुरू होकर काबुल, बिजवाड़ा, दिल्ली के रिफ्यूजी कैंप और आखिर में जयपुर तक पहुंचा।
इसी सफर के दौरान उन्होंने हिंसा, बिछड़ने का दर्द, नई जगह पर जिंदगी शुरू करने की जद्दोजहद और इंसानियत के कई ऐसे चेहरे देखे, जिन्हें उन्होंने इस किताब में दर्ज कराया है।
कार्यक्रम में धवन परिवार, दोस्त, रिश्तेदार और शहर की कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं।
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