सुभाष चंद्रा केस में 99.97% हेयरकट पर फिर अटका मामला! NCLT में क्यों नहीं बन पाई सहमति?

Essel ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा से जुड़े करीब ₹22,000 करोड़ के व्यक्तिगत दिवालिया मामले में सोमवार को बड़ा मोड़ आ गया। NCLT (National Company Law Tribunal) की दो सदस्यीय बेंच इस मामले में अंतिम फैसला नहीं दे सकी, क्योंकि ट्रिब्यूनल के तीसरे सदस्य की अलग राय के कारण बहुमत का फैसला नहीं बन पाया। अब मामला एक बार फिर NCLT के अध्यक्ष के पास भेज दिया गया है। अध्यक्ष या तो किसी अन्य सदस्य को इस मामले में शामिल कर सकते हैं या खुद आगे की प्रक्रिया के तहत बहुमत की राय तैयार कराने का रास्ता तय कर सकते हैं। यह मामला करीब 4 साल से चल रहा है। इसमें सबसे बड़ा विवाद उस रीपेमेंट प्लान को लेकर है, जिसके तहत हजारों करोड़ रुपये के दावों के मुकाबले बेहद छोटी रकम चुकाने का प्रस्ताव है।

दरअसल, सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत इनसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रॉसेस (Insolvency Resolution Process) में लेनदारों के करीब ₹22,006.57 करोड़ के दावे स्वीकार किए गए थे। इसके मुकाबले रीपेमेंट प्लान (Repayment Plan) में करीब ₹6.25 करोड़ का भुगतान लेनदारों को और करीब ₹25 लाख प्रक्रिया से जुड़े खर्च के लिए प्रस्तावित किए गए थे, यानी कुल दावे की तुलना में भुगतान बेहद कम है और इसे करीब 99.97% हेयरकट माना जा रहा है।

PTI की एक रिपोर्ट के मुताबिक, NCLT के तीसरे सदस्य ने 25 अगस्त को 144 पन्नों के अपने आदेश में इस योजना को मंजूरी दी थी। हालांकि, इसके बाद जब मामला मूल दो सदस्यीय बेंच के सामने औपचारिक आदेश के लिए आया, तो दोनों सदस्यों और तीसरे सदस्य की राय में अंतर सामने आ गया। सोमवार को बेंच ने कहा कि तीसरे सदस्य ने स्वतंत्र राय दी है और इसलिए मामले में कोई स्पष्ट बहुमत नहीं बन पाया है।

विवाद की जड़ IBC (Insolvency and Bankruptcy Code) की अलग-अलग धाराओं की व्याख्या में है। मूल बेंच में ज्यूडिशियल मेंबर (Judicial Member) अशोक कुमार भारद्वाज ने रीपेमेंट प्लान को केवल उन लेनदारों तक सीमित रखने की राय दी थी, जिन्होंने इसे मंजूरी दी थी। बताया गया कि करीब 80.8% लेनदारों ने योजना के पक्ष में वोट किया था।

वहीं करीब 19.2% असहमत बैंक और वित्तीय संस्थानों को अपने बकाये की अलग से वसूली करने की अनुमति देने की बात कही गई थी। दूसरी ओर टेक्निकल मेंबर (Technical Member) रीना सिन्हा पुरी ने योजना को स्वीकार नहीं किया था। तीसरे सदस्य ने इससे अलग रुख अपनाते हुए योजना को मंजूरी दी और सेक्शन 115(1) को सभी लेनदारों पर समान रूप से लागू किया। इसका मतलब यह हुआ कि असहमत बैंकों और वित्तीय संस्थानों के दावे भी समाप्त हो जाते।

इस मामले में LIC हाउसिंग फाइनेंस (Housing Finance) समेत कुछ असहमत लेनदारों ने रीपेमेंट प्लान (Repayment Plan) का विरोध किया था। उनका तर्क था कि हजारों करोड़ रुपये के स्वीकार किए गए दावों के सामने इतनी कम रकम का भुगतान प्रस्तावित करना व्यावहारिक और कानूनी रूप से उचित नहीं है। हालांकि, तीसरे सदस्य के आदेश में कहा गया कि रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल (Resolution Professional) की ओर से किए गए मूल्यांकन के अनुसार सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति की वास्तविक कीमत योजना के तहत प्रस्तावित रकम से भी काफी कम थी। इसलिए योजना को खारिज करने पर असहमत लेनदारों को ज्यादा रकम मिलने की संभावना नहीं दिखती। ऐसे में उन्हें योजना स्वीकार करने की तुलना में दिवालियापन की स्थिति में कम रिकवरी का जोखिम हो सकता है।

अब NCLT अध्यक्ष के पास मामला दोबारा पहुंचने से इस लंबे समय से चल रहे व्यक्तिगत इनसॉल्वेंसी केस (Insolvency Case) में आगे की दिशा तय होगी। फिलहाल, ₹22,006 करोड़ से ज्यादा के दावों के मुकाबले करीब ₹6.5 करोड़ के भुगतान वाले प्लान पर अंतिम आदेश नहीं आया है, यानी 99.97% हेयरकट (Haircut) वाला यह प्रस्ताव अभी अंतिम रूप से लागू नहीं हुआ है और NCLT में इसकी कानूनी प्रक्रिया जारी है।

सुभाष चंद्रा के दिवालिया मामले में 'हेयरकट' (Haircut) वित्तीय टर्म का मतलब है- कर्ज की कुल रकम और उसकी वास्तविक वसूली (रिपेमेंट) के बीच आने वाला भारी अंतर या नुकसान। इसका मतलब यह है कि कर्जदाताओं को उनके कुल क्लेम का सिर्फ 0.03% हिस्सा ही मिलेगा और बाकी बचा लगभग 99.97% हिस्सा 'हेयरकट' यानी कर्जदाताओं के नुकसान के रूप में खत्म हो जाएगा।