क्या आपकी आंखें बता सकती हैं दिमाग का हाल? अल्जाइमर और पार्किंसंस को लेकर AIIMS के डॉक्टर का बड़ा खुलासा - can your eyes reveal the state of your brain aiims doctor makes a major revelation regarding alzheimers and parkinsons

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हमारी आंखें और दिमाग सीपीयू और मॉनिटर की तरह काम करते हैं यानी दोनों के बीच एक मजबूत कनेक्शन होता है। ...और पढ़ें

आंखों से पता लग सकती हैं दिमाग की बीमारियां? (Picture Courtesy: Freepik)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दिमाग संबंधी समस्याओं में सबसे अधिक देखने में आते हैं अल्जाइमर और पार्किसंस से पीड़ित लोग। इन समस्याओं को हम आंखों के जरिये देख सकते हैं। लोगों को जानकर यह आश्चर्य होगा कि दिमाग संबंधी कई समस्याओं को आंखों की जांच करके पता लगा सकते हैं।

डॉ. रोहित सक्सेना (वरिष्ठ नेत्ररोग विशेषज्ञ, एम्स, नई दिल्ली) बताते हैं कि शरीर में केवल आंखें ही हैं, जहां हम खून की नसों के अंदर देख सकते हैं, बाकी शरीर में कहीं भी खून की नसों के अंदर देखना संभव नहीं है। 

आंखों की ब्लड वेसल्स के जरिये शरीर की कई और समस्याओं का पता लगाया जा सकता है। आंखों के जरिये यह भी पता लग जाता है कि कुछ खास अंगों को कितनी क्षति पहुंची है। बदलते दौर के साथ तकनीक में काफी उन्नति हुई है। तकनीक ने हमें बहुत सी शारीरिक और मानसिक समस्याओं को समझने में बहुत मदद की है। आजकल आंखों के कई टेस्ट के जरिये यह भी पता लग जाता है कि दिमाग में शुरुआती अल्जाइमर या पार्किंसंस के लक्षण नजर आने लगे हैं। 

यही नहीं कई अन्य समस्याएं भी होती हैं, जिनमें देखने की क्षमता प्रभावित होती है, जैसे मल्टीपल स्केलोरिसिस। इसमें आगे चलकर कई सारी समस्याएं होने लगती हैं। इनमें शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की समस्याएं शामिल होती हैं। इसमें देखने की समस्या के साथ ही चलने-फिरने में भी दिक्कत होने लगती है। इन समस्याओं को भी हम आंखों के जरिये पकड़ सकते हैं। इसके अतिरिक्त बच्चों में होने वाली कई प्रकार की मानसिक समस्याएं भी आगे चलकर आंखों की समस्या का कारण बन जाती हैं। 

उदाहरण के लिए बच्चा पैदा होने के बाद काफी देर से रोता है तो इसका मतलब है कि उसको आक्सीजन सही से नहीं मिल पा रही है। अगर बच्चा देर से रोता है तो इसका असर आगे चलकर दिमाग और आंखों दोनों पर ही पड़ता है।जब बच्चा पेट में होता है तो उसको आक्सीजन मां के जरिए प्राप्त होता है, लेकिन पैदा होने के बाद जब तक वह पहली सांस नहीं ले लेता है, तब तक वह बगैर आक्सीजन के होता है। यह कई कारणों से हो सकता है, लेकिन इसका असर बच्चों के दिमाग पर तो पड़ता ही है साथ ही आंखों पर भी इसका गहरा असर पड़ता है। हालांकि यह समस्या पहले के दौर में बहुत अधिक होती थी, लेकिन अब यह समस्या काफी कम होती जा रही है।

बदलती जीवनशैली और भागदौड़ भरी जिंदगी के कारण तनाव और अवसाद हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बनता जा रहा है। ऐसे में कहीं न कहीं तनाव और अवसाद भी आंखों की समस्या का एक कारण बन रहा है। इस संबंध में काफी नए-नए टेस्ट हो रहे हैं साथ ही नई-नई रिसर्च भी हो रही है, जिनके जरिये यह पता लगाया जा सकता है तनाव आंखों पर कितना गहरा असर डाल सकता है। आजकल इस पर भी रिसर्च हो रही है कि आंखों की जांचों के जरिये यह पता लगाया जा सके कि दिमाग में तनाव या अवसाद का स्तर क्या है। तनाव और अवसाद के कारण आंखों में भारीपन होना और अन्य समस्याएं भी हो सकती हैं।

स्क्रीन का आंखों पर दुष्प्रभाव

आजकल अधिकांश लोगों का लगभग सात-आठ घंटे का समय कंप्यूटर या लैपटाप पर काम करते हुए, बाकी बचा हुआ समय मोबाइल देखते हुए बीतता है। बच्चे भी आजकल मोबाइल, टैबलेट आदि पर काफी समय बिताते देखे जाते हैं। बड़ों और बच्चों दोनों की आंखों और दिमाग पर असर पड़ना स्वाभाविक है। बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास बाधित हो जाता है। 

आजकल बच्चों में एकाग्रता की कमी भी काफी देखी जा सकती है। पहले के दौर में अगर देखा जाए तो पचास बच्चों में केवल पांच बच्चे चश्मा लगाते थे, लेकिन आजकल बिल्कुल उलटा हो गया है, अर्थात अब पचास में केवल पांच बच्चे ऐसे मिलेंगे, जो चश्मा नहीं प्रयोग करते हैं। स्क्रीन पर लगातार देखने के कारण, आंखों में सूखेपन की समस्या भी आ रही है, जिसे ड्राइ आई कहा जाता है। 

काम करने के दौरान हर आधे घंटे पर थोड़ी देर के लिए एक ब्रेक लें, जिसमें आपकी निगाहें स्क्रीन से दूसरी जगह पर हों। मोबाइल और टैबलेट के प्रयोग की जगह लैपटाप या कंप्यूटर का प्रयोग करें। इनके और आंखों के बीच की दूरी एक फुट से कम नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही यह भी ध्यान रखें कि जहां पर लैपटाप या कंप्यूटर का प्रयोग किया जा रहा है वहां पर पर्याप्त रोशनी हो। कभी भी अंधेरे कमरे में स्क्रीन न देखें। 

इससे आंखों पर गहरा विपरीत असर पड़ता है। इसके साथ ही पानी अधिक से अधिक पीना चाहिए। बच्चों को पर्याप्त पानी पीने के लिए प्रेरित करें। घर से बाहर जाते समय आंखों को धूल-धूप और अन्य प्रदूषण से भी बचाना चाहिए। इसके लिए आंखों पर चश्मा अवश्य लगाएं।

कुछ समय प्रकृति के बीच बिताएं

चाहे बड़े हों या बच्चे, सभी को प्रकृति के बीच अधिक से अधिक समय बिताना चाहिए। माता-पिता को चाहिए कि वे प्रतिदिन अपने बच्चों को खुले स्थान पर ले जाएं और कोशिश करें कि बच्चों के साथ ही आप भी कुछ आउटडोर गेम्स खेलें, जैसे बैडमिंटन, फुटबॉल, वॉलीबॉल आदि। इसके साथ ही कोशिश करें कि ऐसी जगहों पर जाएं जहां पेड़-पौधे अधिक हों। हरियाली के बीच समय बिताने पर आपकी आंखें इधर-उधर देखती रहती हैं। यह आंखों की सेहत के लिए बहुत अच्छा रहता है। कम से कम दो घंटे हर हाल में बाहर बिताएं।

फास्टफूड से रहें दूर

अगर आप चाहते हैं कि आप और आपके परिवार के लोगों की आंखें और दिमाग हमेशा स्वस्थ रहे तो आपको फ्रोजन फूड और फास्टफूड के सेवन से बचना चाहिए। इसके बजाय मौसमी हरी सब्जियों और मौसमी फलों का सेवन करना चाहिए। अगर कभी मीठे की क्रेविंग हो रही है तो बाजार का कुछ मीठा खाने के स्थान पर घर का बना कोई पौष्टिक मीठा ग्रहण करें, जिसमें विभिन्न प्रकार के नट्स का प्रयोग किया गया हो।

अध्ययन भी लगाते हैं मुहर

दिमाग और आंखों के बीच के गहरे संबंध का एक यह भी प्रमाण है कि जब हम तनाव महसूस करते हैं तो हमारा शरीर कार्टिसोल और एड्रेनालाइन नामक हार्मोन का तेजी से स्राव करता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ आप्थैल्मोलाजी के अनुसार इन हार्मोन का उच्च स्तर चाहे वह बहुत थोड़े समय के लिए ही क्यों न हो, वह हमारी दृष्टि और आंखों के स्वास्थ्य में काफी बदलाव ला सकता है। 

अध्ययनों से पता चला है कि तनावपूर्ण स्थिति के बाद आंखों के भीतरी दबाव में थोड़ी देर के लिए अस्थायी वृद्धि हो सकती है। यह ग्लूकोमा से पीड़ित लोगों के लिए चिंता का विषय हो सकता है। ग्लूकोमा की समस्या भी दिमाग से गहरे जुड़ी होती है।

जरूरी है आंखों की जांच बच्चों के मामले में, जैसे ही बच्चा स्कूल जाना शुरू करे, उसकी आंखों की जांच अवश्य करानी चाहिए। इससे शुरुआती दिनों में ही पता लग जाता है कि उसकी आंखों में कोई समस्या तो नहीं है। यदि आंखों में कोई समस्या होगी तो वह उनके दिमाग पर भी असर डालेगी। स्कूलों में हर साल बच्चों के आंखों की जांच होनी चाहिए। बड़ों के मामले में, 40 की उम्र के बाद हर साल आंखों की जांच जरूर करानी चाहिए। इससे समय रहते समस्या का पता लगाया जा सकता है।