Bankipur To Bihar: एक जीत, एक विकल्प और एक नए मोर्चे की आहट

Time Published: Wednesday, August 5, 2026, 23:02 [IST]

Bankipur To Bihar Politics Analysis: वेब सीरीज 'महारानी' का एक बेहद चर्चित संवाद बिहार के मिजाज को बखूबी बयान करता है, 'बिहार की एक खासियत है कि जब-जब आपको लगता है, आप बिहार को समझ गए, बिहार आपको झटका देता है।' हाल ही में बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने इस संवाद को एक बार फिर प्रासंगिक बना दिया है। भारतीय जनता पार्टी के तीन दशक पुराने इस अजेय गढ़ में जन सुराज पार्टी (JSP) के संस्थापक प्रशांत किशोर (PK) की जीत ने न सिर्फ प्रदेश की राजनीति को नए सिरे से मथ दिया है, बल्कि एक मजबूत 'तीसरे विकल्प' की आहट भी दे दी है।

कहने को बांकीपुर का उपचुनाव महज एक विधानसभा का चुनाव था। लेकिन इसने राज्य की राजनीति में नए आयाम खोल दिए हैं। प्रशांत किशोर की जीत हुई लेकिन हार किसकी? दरअसल, जन सुराज ने बांकीपुर जीतकर भाजपा गठबंधन और राजद (RJD) गठबंधन दोनों के माथे पर शिकन दे दिया है। शिकन है जनाधार खोने का। राजद हो या भाजपा - हार का दर्द दोनों का एक ही है।

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पहले समझते हैं कि बांकीपुर के आंकडे क्या कहते हैं। इस उपचुनाव में प्रशांत किशोर को 64,151 वोट मिले, भाजपा के नीरज कुमार को 44,827 और राजद की रेखा कुमारी को 14,273 मत प्राप्त हुए। आठ महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में इसी बांकीपुर में भाजपा के नितिन नबीन को 98,299 वोट, राजद की रेखा कुमारी को 46,363 और जन सुराज की वंदना कुमारी को 7,717 वोट मिले थे। नितिन नबीन ने 51 हज़ार से अधिक वोटों से राजद उम्मीदवार को हराया था।

राजद-भाजपा: तेरा गम मेरा गम एक जैसा सनम...!

महज आठ महीने और प्रशांत किशोर के मैदान में आने से जन सुराज का वोट शेयर 7 हज़ार से बढकर 64 हज़ार हो गया। यहां तक तो पीके की जीत हो सकती है। लेकिन असली कहानी इससे आगे है। सत्ताधारी भाजपा का वोटशेयर 98 हज़ार से 44 हज़ार पर आ गया, आधे से भी कम और राजद की तो लुटिया ही डूब गई। 46 हज़ार से सीधा 14 हज़ार पर? वोट-शेयर में तीनगुणा कमी और MY समीकरण का बिखरना राजद के माथे पर चिंता की रेखाएं बढाने वाला है। सीमांचल में ओवैसी से अल्पसंख्यक वोटबैंक हार रहा राजद, अलग-अलग इलाकों में अपना कोर वोटबैंक इसी तरह लुटाता रहा तो सामाजिक न्याय की विरासत खतरे में पड़ जाएगी।

तेरा गम मेरा गम एक जैसा सनम, हम दोनों की एक कहानी

भाजपा के 54 हज़ार वोट कम हो गए उस विधानसभा क्षेत्र में जो उनके मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष का क्षेत्र है, जहां पर बीजेपी 3 दशकों से नहीं हारी थी, अपनी सरकार रहते हुए न केवल हार गई बल्कि वोटबैंक भी टूट गया। इस बार 2025 के मुकाबले 22 हज़ार वोट कम पड़े। चलिए ये भी मान लेते हैं कि वो सारे वोट भाजपा के ही थे, लेकिन यह भी घोर एंटी-इंकंबेंसी का परिचायक है। इसके बाद भी 32 हज़ार वोट और कम हो गए भाजपा के? कहाँ गए वो मतदाता जिस पर पार्टी को गुमान था?

सवाल कमजोर उम्मीदवार, गलत रणनीति, भाजपा के अति-आत्मविश्वास, राजग की अगंभीरता से आगे है। प्रशांत किशोर की जीत ने जिन सवालों को जन्म दिया है उनमें सबसे अहम यह है कि क्या राज्य के मतदाता जातियों के खांचे से ऊपर उठकर, दलगत वफादारी से अलग नए विकल्प पर विचार कर सकते हैं? बांकीपुर के नतीजे में छुपे आंकड़े को देखते हुए जवाब होगा - हां। और यहीं से शुरु होती है एक नए मोर्चे की संभावना।

क्या बिहार में बनने वाला है नया सियासी मोर्चा?

बांकीपुर में बीजेपी ने भले 40 स्टार कैंपेनर की फौज उतार दी थी लेकिन गठबंधन के सहयोगी पटना में होने के बावजूद नेपथ्य में ही रहे। राजद का हाल तो और भी बुरा रहा। कहा जाता है कि कांग्रेस तो राजद को मनाने में लगी हुई थी कि प्रशांत किशोर के पक्ष में मैदान छोड़ दिया जाए। पिछले चुनाव में दूसरे नंबर की पार्टी का चुनाव मैदान से भागना गलत परसेप्शन क्रिएट कर सकता था लेकिन तेजस्वी ने भी इंडायरेक्ट वाक-ओवर तो दे ही दिया था।

खबर तो ये भी है कि बांकीपुर में जीत के बाद प्रशांत किशोर के 'अच्छे दोस्त' चिराग पासवान ने कॉलकर उन्हे बधाई दी है। 2025 में भी चिराग-प्रशांत की पारस्परिक प्रशंसा भी देखी गई थी। दोनों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा भी है। भाजपा के साथ रहकर चिराग जो हासिल नहीं कर पाए क्या जन-सुराज के साथ जाने पर उसकी संभावना अधिक है? सियासी गलियारों में 2029 के कयासों को जन्म देने के लिए इतना भी काफी है।

केवल चिराग ही नहीं, प्रशांत किशोर की जीत की बधाई जेडीयू के कई नेता भी दे रहे हैं। पर्दे के पीछे जश्न भी चल रहा है लेकिन चिंता की लकीरें तो जदयू के माथे पर भी होंगी। नीतीश युग समाप्त हो गया है। पार्टी अगले खेवनहार की प्रतीक्षा में है। अब उस सियासी जंग की कल्पना कीजिए जब निशांत की अगुवाई वाली जदयू के सामने पीके की अगुवाई वाला जन-सुराज होगा। बिहार में उपलब्ध युवा नेतृत्व के विकल्पों में प्रशांत अपने समकालीन तेजस्वी, सम्राट, निशांत, चिराग पर बेशक भारी पड़ेंगे।

हालांकि राजनीतिक प्रेक्षक यहां जदयू के लिए नई उम्मीद भी देख रहे हैं। भाजपा और राजद की बैसाखी छोड़ जदयू नए विकल्प की ओर क्यों नहीं बढ़ सकता? पीके तो पहले जदयू के नंबर 2 तक रह चुके हैं। जदयू-राजद का महागठबंधन करवाकर पीके ने 2015 में भाजपा के प्रचंड विजयरथ को बिहार में रोक दिया था। पीके के पाले में भाजपा के सवर्ण वोटबैंक का गठजोर जदयू के लव-कुश समीकरण से हो, तो राजद के एम फैक्टर की रही-सही दुविधा भी जाती रहेगी।

बिहार की सियासत इस वक्त एक दिलचस्प मोड़ पर है, जहां नए राजनीतिक समीकरणों और प्रशांत किशोर के उभार को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। एक तरफ जहाँ उन्हें पारंपरिक राजनीतिक दलों और विपक्ष के लिए एक मजबूत विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी वोटों के बिखराव और सत्तारूढ़ दल को उससे होने वाले लाभ को लेकर भी आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। प्रशांत किशोर खुद को एक प्रमुख विपक्षी चेहरे के रूप में स्थापित कर पाते हैं या पारंपरिक दल अपना वर्चस्व बरकरार रखते हैं, इसका अंतिम फैसला जनता का जनादेश ही तय करेगा। आने वाला समय बिहार की राजनीति में रणनीतियों, नए ध्रुवीकरण और अनिश्चितताओं से भरा रहने वाला है।