BRICS Summit 2026: ख्वाब हो तुम या कोई हकीकत! भारत की कूटनीतिक पहल से बदला वैश्विक समीकरण
ब्रिक्स 2026 का घोषणापत्र पास हो गया और इस तरह भारत अपनी पहल पर खरा उतरा. रूस, चीन, ब्राजील समेत ब्रिक्स के सभी 11 देशों ने आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने, युद्ध को रोकने और टैरिफ के विरुद्ध डट कर खड़े होने पर सहमति जताई. फलिस्तीन के समर्थन पर सहमति भी बनी. लेकिन एक खास बात और हुई और वह यह कि विश्व मंच से पाक द्वारा पहलगाम पर हुए आतंकी हमले की कड़ी निंदा की गई.
रूस, ब्राजील और चीन जैसी शक्तियों के साथ भारत द्वारा एक साझा प्रस्ताव पास करा लेना एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है. इससे वैश्विक स्तर पर भारत की साख बढ़ी. परंतु चीन, रूस, सऊदी अरब, यूएई, ईरान तथा ब्राजील आदि देश कितना युद्धों को रोकने के आह्वान पर अमल करते हैं, यह भविष्य के गर्भ में है. इजराइल और ईरान के बीच दुश्मनी है और ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान हूती आतंकी सऊदी के बेड़े पर हमले कर रही थे.
20 वर्ष का सफर, ग्लोबल नॉर्थ को टक्कर
BRIC का गठन ब्राजील, रूस, इंडिया और चीन ने मिल कर 2006 में किया था. हालांकि इस तरह का संगठन बनाने की शुरुआत 2001 में हो गई थी. शुरू में इसका नाम BRIC ही रखा गया था. लेकिन इस बीच 2009 में साउथ अफ़्रीका के जुड़ने के बाद इसका नाम BRICS हो गया. तब सोचा गया था कि इस मंच के माध्यम से ग्लोबल साउथ इतना मजबूत हो जाएगा कि वह ग्लोबल नॉर्थ को टक्कर दे सकेगा. अब वह हकीकत बनता दिख रहा है.
आज BRICS के साथ एशिया, अफ़्रीका और यूरोप के 11 देश जुड़ हुए हैं तथा 10 और देश इसके पार्टनर सदस्य हैं. इस तरह 21 सदस्यों का यह संगठन दुनिया के दूसरे अपेक्षाकृत संपन्न देशों के संगठन के बराबर आ गया है. खासकर ग्लोबल नॉर्थ के देश. रूस, चीन, भारत और ब्राजील के अलावा अन्य सदस्य देश आकार में भले छोटे हों पर उनमें से कोई भी देश अब पिछड़ा नहीं कहा जा सकता.
BRICS समिट के मलेशिया PM के गाने की चर्चा
ऐसे में ब्रिक्स 2026 का सम्मेलन दिल्ली में होना भारत के लिए एक बड़ी चुनौती थी. खुद ब्रिक्स के देश आपस में भिड़े हुए हैं. सऊदी अरब, यूएई पर ईरान हमले करता ही रहता है. फरवरी से चल रहे ईरान-अमेरिका युद्ध के बावजूद दिल्ली सम्मेलन में ईरान भी आया और यूएई तथा सऊदी अरब के प्रतिनिधि भी. खास बात कि धरातल पर परस्पर वैमनस्य पाले ईरान और यूएई ने निजी बातचीत भी की.
सबसे मजेदार बात तो यह हुई कि मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने 1965 की हिंदी फिल्म तीन देवियां का गाना ख्वाब हो या तुम कोई हकीकत भी गया. इसमें एक लाइन आती है, और करीब आ जाओ! इस गाने का वीडियो बना कर उन्होंने X पर शेयर भी किया. संयोग था, कि यह गाना उन्होंने हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर गाया. इसकी वजह से लोग उनकी इस प्रस्तुति पर उनके मुरीद हो गए.
शी जिनपिंग के साथ उनके सहयोगी काई चो भी आए
अभी मई में जब ब्रिक्स के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन हुआ था, तब किसी भी प्रकार की आम सहमति नहीं बन सकी थी. इससे एक सांसत थी कि पता नहीं 12-13 सितंबर को होने वाली ब्रिक्स मीट में क्या होगा! खासकर चीन के रवैये को ले कर. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आयेंगे या नहीं इसको लेकर शंकाएं थीं, पर वे आए और अपने साथ 400 लोगों का एक काफिला भी लाए. जिसमें कूटनीतिकों के अलावा वहां के उद्योग और व्यापार की कई हस्तियां भी आईं.
शी जिनपिंग के सबसे विश्वस्त सहयोगी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो मेंबर काई चो भी आए तथा वहाँ के विदेश मंत्री भी. इससे यह तो स्पष्ट हुआ कि आज की वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए चीन के लिए भारत के साथ दोस्ती रखना बहुत जरूरी है. परंतु दोस्ती सदैव पारस्परिक सहयोग और भरोसे से चलता है. अब देखना यह है कि चीन अपनी बातों पर खरा उतरता है या नहीं.
कड़वे रिश्तों में मिठास आएगी!
चीन के साथ हमारे रिश्ते पिछले छह दशक से कड़वे ही रहे हैं. 1962 से 2020 तक चीन ने हमारे साथ घात ही किया है. प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई से गले मिल कर दोस्ती की थी. पंचशील समझौता किया परंतु फिर भी चीन ने 1962 में भारत पर हमला कर दिया. तब भारत की सेना और सेना के पास हथियारों की भी कमी थी.
भारत को पीछे हटना पड़ा और आज तक चीन ने जो 38 हजार वर्ग किमी का अक्साई चिन का इलाका हथिया लिया था, वह वापस नहीं किया. इसी तरह नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने तब उन होने पड़ोसी देशों के साथ दोस्ती रखने की पहल शुरू की थी, उसमें भी धोखा हुआ. शी जिनपिंग 2019 में भारत आए और मोदी के साथ खूब गलबहियां कीं. तथा अच्छे रिश्ते बनाये रखने का वायदा किया. किंतु कुछ ही महीनों बाद गलवान घाटी वाली घटना हो गई.
गलवान की कड़वाहट और ट्रंप का टैरिफ
गलवान घाटी संघर्ष में भारत और चीन की सेनाएं सीमा पर भिड़ गईं. इसमें भारतीय सेना के 20 लोग मारे गए. चीन ने अपनी सेना के चार लोगों के मारे जाने की बात कही. लेकिन इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गई. अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग आपस में मिलने से बचते रहे. अक्टूबर 2019 में शी जिनपिंग भारत आए थे और जून 2020 में गलवान घाटी में झड़प हो गई.
इसके बाद मोदी और शी छह वर्ष बाद अगस्त 2025 में SCO की बैठक में चीन के तियानजिन चौक पर मिले. यह वह दौर था जब चीन और भारत दोनों राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ से परेशान थे. ऐसे में एशिया के इन दोनों देशों के बीच दोस्ती जरूरी थी. दोनों बड़ी आबादी वाले देश हैं और इनके उत्पाद की अधिकतर खपत अमेरिका में होती थी. मगर ट्रम्प द्वारा टैरिफ लाद दिए जाने से भारतीय और चीनी दोनों के उत्पाद महंगे हो गए.
पिरामिड के उदाहरण से ग्लोबल नॉर्थ पर हमला
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स की बैठक में पिरामिड फार्मूले की बात उठा कर स्पष्ट किया कि आज की वैश्विक अर्थ व्यवस्था में बराबरी की बात बेमानी है क्योंकि कुछ देश ही शिखर पर हैं. शेष नीचे पड़े हैं. जबकि होना यह चाहिए सबको बराबर के मौके मिलें. जाहिर उनका यह कहने का आशय G-7 देशों से था, जो वैशेक व्यवस्था के नाम पर लाभ तो सारे लेते हैं लेकिन टैरिफ और लेवी लगा कर गरीब मुल्कों को आगे नहीं आने देना चाहते.
ये शिखर पर बैठे देश ग्लोबल नॉर्थ के हैं, इसलिए उनसे कंप्टीट करने के लिए ग्लोबल साउथ के देशों के बीच पारस्पाइक सहयोग, संवेदना जरूरी है. BRICS के इस बीसवें सम्मेलन में ग्लोबल साउथ देशों की महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर जोर दिया गया. प्रगतिशील देशों को जोड़ने की भी अपील की गई.
ब्रिक्स की मुद्रा पर कोई राय नहीं
पिछली ब्रिक्स सम्मेलन में डॉलर के समानातर ब्रिक्स देशों की एक साझा मुद्रा (करेंसी) लाने पर जोर दिया गया था. किंतु 2026 की दिल्ली बैठक में इसका कोई हल नहीं निकला. बस इतना कहा कि हर देश अपनी-अपनी मुद्रा में व्यापार करेगा. परंतु समस्या तब पैदा होगी जब ब्रिक्स देशों के बीच के पारस्परिक व्यापार से आए पैसों से ब्रिक्स के बाहर वाले देशों से व्यापार करने के वक़्त. क्योंकि वे डॉलर में व्यापार करेंगे. और आशंका है कि अमेरिका डॉलर के मुकाबले उस देश की मुद्रा की कीमत घटा दे.
यूं भारत किसी साझा मुद्रा का समर्थन नहीं करता. सिर्फ़ रूस, चीन और ईरान साझा मुद्रा के पक्ष में हैं. अभी साझा मुद्रा पर शायद ही आने वाले वर्षों में कोई पारस्परिक सहमति बने. कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर अभी भी सदस्य देशों में काफी मतभेद भी हैं. उनका कोई साझा समाधान निकल आए तब ही इस मुद्दे पर काम हो सकेगा.
पुतिन में पर्याप्त उत्साह दिखा
BRICS देशों के ताकतवर गुट में सिर्फ रूस ही ऐसा देश रहा, जो पूरे उत्साह से दिल्ली बैठक में उपस्थित रहा. राष्ट्रपति पुतिन 11 सितंबर को ही भारत आ गए थे और अपनी टीम के साथ ITC सम्राट होटल में रुके. चीन के शी जिनपिंग 12 सितंबर को बारह बजे आए. वे होटल ताज पैलेस में रुके हुए थे. ढाई बजे वे भारत मंडपम पहुंचे और बैठक में हिस्सा लिया. शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रू-ब-रू मीटिंग की. लेकिन उसी रात को BRICS देशों के साथ आयोजित सामूहिक भोज में शी जिनपिंग नहीं आए.
जबकि वे दिल्ली में ही थे. यह एक ऐसा अवसर था, जब कई केंद्रीय मंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री भी भोज में पहुंचे हुए थे. हालांकि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस भी इस भोज में नहीं शामिल हुए क्योंकि वे भोज के पहले ही अपने देश लौट गए थे. सिर्फ़ पुतिन ही पूरे उत्साह और मनोयोग से BRICS में सम्मिलित रहे. रूस ने बता दिया कि वह आज भी भारत का भरोसेमंद मित्र है.
भारत की उपलब्धि
BRICS 2026 की दिल्ली बैठक भारत के लिए निश्चय ही एक उपलब्धि रही. इसीलिए डोनाल्ड ट्रम्प ने जब मोदी के साथ पुतिन और शी जिनपिंग की फोटो देखी तो बोले, उन लोगों को इन तीनों के मध्य मेरी अनुपस्थिति खल रही होगी. वे मुझे मिस कर रहे होंगे. ब्रिक्स का अगला शिखर सम्मेलन चीन में होगा. चीन ने कमाल संभालते ही राष्ट्रपति शी का बयान आया कि भारत और चीन परस्पर प्रतिद्वंदी नहीं बल्कि साझेदार हैं. अब देखना यह है कि चीन इस साझेदारी को परस्पर सौहार्द से निभाता है या अंदर से उसका छिपा हुआ क्या एजेंडा होता है.

शंभूनाथ शुक्ल
शंभूनाथ शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार हैं. 1974-75 के छात्र आंदोलन के दौरान वे B.Sc. कर रहे थे किंतु पढ़ाई अधूरी छोड़ कर वे कलकत्ता चले गए. तब वहां सिद्धार्थ शंकर रॉय की सरकार आंदोलन कर रहे छात्रों पर गोलियाँ चलवा रही थी. श्री शुक्ल किसी तरह वहां से कानपुर आ गए और आईआईटी में वामपंथी छात्रों के साथ रह कर मार्क्स, एंजेल्स और लेनिन को पढ़ा. सोवियत (रूसी) और चीनी कम्युनिस्ट साहित्य की खूब पढ़ाई शुरू की. यूरोप और अमेरिका का इतिहास पढ़ा. देश और विदेश को समझने की नई दृष्टि उन्हें मिली. आईआईटी और मेडिकल छात्रों के साथ रहने से अंग्रेजी से अनुवाद में पारंगत हुए. देश में युवाओं, किसानों और दलित व पिछड़ी जातियों की पीड़ा को उन्होंने गहराई से समझा. यहीं से लेखन उनकी प्रेरणा बना क्योंकि लेखों के ज़रिए ही वे अपनी इस दृष्टि का विस्तार कर सकते थे. कोलकाता से प्रकाशित होने वाली आनंद बाज़ार पत्रिका समूह की साप्ताहिक पत्रिका ‘रविवार’ ने उनकी एक स्टोरी को कवर स्टोरी बना कर छापा- ‘अर्जक संघ; उत्तर प्रदेश का डीएमके’ यह स्टोरी बहुत चर्चित हुई और वे सक्रिय रूप से पत्रकारिता में आ गए. कानपुर में ही दैनिक जागरण ने उन्हें अपने स्टाफ में रख लिया और कुछ सीरियस विषयों पर उनसे खोजपूर्ण काम करवाए. उन दिनों आईआईटी में कई दलित छात्र अंग्रेजी के भय से सुसाइड कर लेते थे, उस पर उन्होंने इन एलीट संस्थानों के भीतर हरिजन (अब दलित) छात्रों की पीड़ा को तह तक जा कर उजागर किया. भागलपुर के आंख फोड़ो कांड की रिपोर्ट के लिए उन्हें वहां भेजा गया. उस कांड को तब तक विस्तार के साथ अरुण शौरी ने इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्ट लिखी थी. शुक्ल जी श्री शौरी से वहां मिले और दैनिक जागरण के लिए इस कांड की ज़मीनी रिपोर्टिंग की. 1983 में जब जनसत्ता निकला तब संपादक प्रभाष जी की शुरुआती टीम में शंभूनाथ शुक्ल भी थे. बाद में वे जनसत्ता के चंडीगढ़ और कोलकाता संस्करणों के संपादक बनाये गये. 2003 में अमर उजाला के कानपुर संस्करण का कामकाज संभाला और फिर दिल्ली, लखनऊ और मेरठ में अमर उजाला में कार्यकारी संपादक रहे. फ़िलहाल वे फ्री लांसिंग कर रहे हैं. पिछले कई वर्षों से वे TV 9 डिजिटल में लेख भी लिख रहे हैं. राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, दर्शन और समाज शास्त्रीय विश्लेषण में उनकी गहन रुचि है.
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