CAG की रिपोर्ट में 'हर घर नल का जल योजना' पर बड़े खुलासे: लाखों परिवारों तक नहीं पहुंचा पानी, करोड़ों की योजनाओं में मिली बेहद गंभीर गड़बड़ियां
PATNA: बिहार सरकार की हर घर नल का जल योजना को लेकर भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। बिहार विधानसभा में पेश CAG की रिपोर्ट में योजना के क्रियान्वयन, लक्ष्य निर्धारण, जल गुणवत्ता, निगरानी और वित्तीय प्रबंधन में कई बड़ी गड़बड़ी का खुलासा किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि योजना पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद लाखों परिवार सुरक्षित पेयजल से वंचित रह गए और कई स्थानों पर बिना जरूरत के संयंत्र लगाए गए, जबकि कहीं जरूरी क्षेत्रों को ही छोड़ दिया गया।
हर घर नल का जल योजना का उद्देश्य पूरा नहीं हुआ
सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर 2015 में बिहार सरकार ने 'हर घर नल का जल योजना' शुरू की थी। इसका उद्देश्य राज्य के प्रत्येक परिवार तक पाइपलाइन के जरिए सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना, पानी से होने वाली बीमारियों को कम करना और साल 2020 तक लोगों की हैंडपंप पर निर्भरता समाप्त करना था। योजना का क्रियान्वयन पंचायती राज विभाग, लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (PHED) और नगर विकास एवं आवास विभाग के माध्यम से किया गया। साल 2017-18 से 2022-23 के बीच इन विभागों को हर घऱ नल का जल योजना के लिए 30,500.92 करोड़ रुपये आवंटित किए गए।
लाखों परिवारों तक नहीं पहुंचा पानी
सीएजी ने पाया कि योजना को लेकर किये गये दावे और हकीकत में बहुत अंतर है. सरकरा ने इस योजना के वास्तविक कवरेज का सही आकलन नहीं ही नहीं किया. रिपोर्ट के मुताबिक केवल लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग ही 46,633 ग्रामीण वार्डों के 11.22 लाख परिवारों तक योजना नहीं पहुंचा सका। इनमें 8.07 लाख परिवार ऐसे वार्डों में रहते हैं जहां पानी की गुणवत्ता पहले से ही खराब थी.
गंदे पानी वाले क्षेत्रों में भी नहीं लगाए गए वाटर ट्रीटमेंट प्लांट
रिपोर्ट में कहा गया है कि हर घऱ नल का जल योजना को लेकर राज्य सरकार के PHED और पंचायती राज विभाग के बीच वार्डों के बंटवारे को लेकर स्पष्टता नहीं थी, जिससे समन्वय की कमी रही। लेखापरीक्षा में पाया गया कि पीने के पानी का संकट झेल रहे 77 वार्डों में बिना वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाए ही जलापूर्ति शुरू कर दी गई, जबकि 19 प्रभावित वार्डों को योजना के तहत कवर ही नहीं किया गया।
जहां फ्लोराइड नहीं था, वहां लगा दिए फ्लोराइड रिमूवल प्लांट
रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि PHED ने 1,000 फ्लोराइड प्रभावित बसावटों में विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) और सर्वेक्षण के बिना योजनाएं लागू कर दीं। इसके तहत 2.77 करोड़ रुपये खर्च कर 15 फ्लोराइड रिमूवल प्लांट लगाए गए, लेकिन बाद में पाया गया कि उन स्थानों के पानी में फ्लोराइड की मात्रा अधिक थी ही नहीं।
समय पर काम शुरू नहीं हुआ
रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिकांश योजनाओं को वर्ष 2019-20 तक पूरा होना था, लेकिन 59 प्रतिशत योजनाएं 2018-19 के अंतिम चरण या 2019-20 में ही शुरू हुईं, जिससे लोगों को समय पर नल का जल उपलब्ध नहीं हो सका।
काम हुए बिना ही 2.31 करोड़ रुपये का भुगतान
सीएजी ने वित्तीय अनियमितता का भी खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार पांच लोक स्वास्थ्य प्रमंडलों की जांच में पाया गया कि वास्तविक कार्य किए बिना ही ठेकेदारों को 2.31 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया गया।
कवरेज के आंकड़ों में भी सवाल
रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2023 तक सरकार ने दावा किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में 98.70 प्रतिशत परिवारों तक योजना पहुंच चुकी है। लेकिन नवंबर 2025 तक वास्तविक कवरेज 95.71 प्रतिशत ही पाया गया। इसी तरह शहरी क्षेत्रों में भी मार्च 2023 तक केवल 94 प्रतिशत कवरेज दर्ज किया गया, जबकि लक्ष्य 100 प्रतिशत था।
जल गुणवत्ता प्रबंधन भी कमजोर
सीएजी ने कहा कि जल गुणवत्ता प्रभावित कई वार्डों में या तो पानी को साफ करने वाले संयंत्र लगाए ही नहीं गए या लगाए गए संयंत्र काम नहीं कर रहे थे या फिर उनकी क्षमता पर्याप्त नहीं थी। इसके अलावा पंचायती राज विभाग और शहरी निकायों की अधिकांश योजनाओं में क्लोरीनेटर नहीं लगाए गए, जिससे पेयजल के कीटाणुशोधन के मानकों का पालन सुनिश्चित नहीं हो सका।
पानी की जांच की व्यवस्था भी अधूरी
रिपोर्ट के अनुसार प्रयोगशालाओं, उपकरणों और तकनीकी कर्मचारियों की कमी के कारण जल गुणवत्ता की पर्याप्त जांच नहीं हो सकी। कई प्रयोगशालाओं को राष्ट्रीय परीक्षण एवं अंशशोधन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड (NABL) की मान्यता भी नहीं मिल सकी। इसके कारण कई घरों तक दूषित पानी पहुंचने की आशंका बनी रही और योजना का मूल उद्देश्य प्रभावित हुआ।
निगरानी और शिकायत व्यवस्था भी कमजोर
सीएजी ने निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार राज्य और जिला स्तर की परियोजना प्रबंधन इकाइयों में कर्मचारियों की कमी रही, जिससे प्रभावी मॉनिटरिंग नहीं हो सकी। योजना की निगरानी के लिए विकसित डिजिटल प्लेटफॉर्म भी पूरी तरह विश्वसनीय या सक्रिय नहीं पाए गए। वहीं लोगों को शिकायत दर्ज कराने की जानकारी कम थी और शिकायतों के निस्तारण का समुचित रिकॉर्ड भी नहीं रखा गया।
जागरूकता अभियान भी रहे कमजोर
रिपोर्ट में कहा गया है कि लाभुक समितियों, जल चौपाल और स्वास्थ्य शिविरों के माध्यम से लोगों को जागरूक करने के कार्यक्रम बहुत सीमित रहे। साथ ही तीसरे पक्ष द्वारा गुणवत्ता जांच की व्यवस्था का भी पर्याप्त उपयोग नहीं किया गया।