आउटपुट घंटे से ज्यादा जरूरी, CFA की कहानी के बाद LinkedIn पर छिड़ी वर्क कल्चर की बहस

फोकस हो तो लंबे घंटे जरूरी नहींImage Credit source: Getty Images
दिल्ली के एक स्टार्टअप फाउंडर ने हाल ही में एक युवा कर्मचारी से जुड़ा अपना एक्सपीरियंस शेयर किया, जिसने काम के घंटों और प्रोडक्टिविटी को लेकर उनकी सोच ही बदल दी. उनका कहना है कि ऑफिस में ज्यादा घंटे बिताना जरूरी नहीं कि ज्यादा काम करने के बराबर हो. अगर कोई व्यक्ति अपने तय समय में पूरी फोकस और डिसिप्लिन के साथ काम करे, तो वह कम समय में भी बेहतर नतीजे दे सकता है.
फिंग्रोथ मीडिया के फाउंडर कनन बहल ने LinkedIn पर अपनी एक पोस्ट में बताया कि कुछ समय पहले तक उनकी सोच थी कि जो कर्मचारी बिल्कुल तय समय के हिसाब से काम करते हैं, वे कंपनी के लिए ज्यादा उपयोगी नहीं होते. उन्हें लगता था कि ऐसे लोग एक्सट्रा जिम्मेदारी लेने या जरूरत पड़ने पर ज्यादा समय देने से बचते हैं, लेकिन एक युवा CFA ने उनकी यह धारणा पूरी तरह बदल दी. कनन ने बताया कि उन्होंने एक युवा CFA को नौकरी पर रखा था.
फोकस और डिसिप्लिन जरूरी
इस कर्मचारी ने साफ कर दिया था कि वह शाम 6:30 बजे के बाद एक मिनट भी ऑफिस में नहीं रुकेगी. शुरुआत में यह बात शायद कनन को थोड़ी अलग लगी होगी, क्योंकि वे ऐसे कर्मचारियों को ज्यादा पसंद करते थे जो जरूरत पड़ने पर लंबे समय तक काम कर सकें.
हालांकि, कुछ ही समय में उन्हें समझ आ गया कि इस कर्मचारी का तय समय पर ऑफिस से निकलना उसकी काम के प्रति लापरवाही नहीं, बल्कि उसकी अच्छी टाइम मैनेजमेंट का हिस्सा था. कनन के मुताबिक, वह कर्मचारी ऑफिस के दौरान बेवजह की बातचीत में समय नहीं गंवाती थी. चाय-कॉफी के लंबे ब्रेक लेने की उसकी आदत नहीं थी और काम के अलावा वह शायद ही किसी से बातचीत करती थी. उसका पूरा ध्यान अपने काम पर रहता था.
सबसे खास बात यह थी कि वह करीब 9 घंटे काम करके उतना या उससे भी ज्यादा काम पूरा कर लेती थी, जितना कई लोग 13 घंटे ऑफिस में रहकर भी नहीं कर पाते थे. कनन ने ये भी बताया कि इंटरव्यू के दौरान वह अक्सर उम्मीदवारों से पूछते थे कि क्या वे जरूरत पड़ने पर कई हफ्तों तक रोजाना 14-15 घंटे काम कर सकते हैं. लेकिन इस युवा CFA के इंटरव्यू में वह यह सवाल पूछना भूल गए. बाद में उन्हें खुशी हुई कि उन्होंने ऐसा किया, क्योंकि अगर वह सवाल पूछते तो शायद उन्हें यह बेहतरीन कर्मचारी मिलती ही नहीं.
इस एक्सपीरियंस ने कनन को एक अहम बात समझाई कि किसी कर्मचारी की काबिलियत को सिर्फ इस आधार पर नहीं आंकना चाहिए कि वह ऑफिस में कितने घंटे रहता है. असली मायने इस बात के हैं कि वह अपने काम के समय में कितना प्रभावी और प्रोडक्टिव है. उनकी पोस्ट के बाद LinkedIn पर भी लोगों के बीच बहस शुरू हो गई. कुछ लोगों ने कहा कि लगातार 9 घंटे बिना ब्रेक काम करना भी सही नहीं है और छोटे ब्रेक व सहकर्मियों से बातचीत जरूरी होती है. वहीं कई यूजर्स ने माना कि कर्मचारियों को उनके ऑफिस में बिताए घंटों से नहीं, बल्कि उनके काम की क्वालिटी, नतीजों और एफिशिएंसी से आंकना चाहिए.
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एक यूजर ने कहा कि अब समय आ गया है जब कंपनियां इस बात को महत्व देना बंद करें कि कोई कर्मचारी कितने घंटे ऑफिस में रहा. उसके बजाय उसकी सोच, मेहनत, इरादा, क्षमता और रिजल्ट पर ध्यान दिया जाना चाहिए. कनन की कहानी का सीधा सा संदेश है कि **लंबे समय तक काम करना और ज्यादा प्रोडक्टिव होना एक ही बात नहीं है.
यहां देखिए पोस्ट

आयुष कुमार
आयुष कुमार, टीवी9 डिजिटल में सीनियर सब एडिटर हैं. अशोक और चाणक्य की धरती बिहार से हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की तालीम हासिल की है. पत्रकारिता में तीन साल से तिल को बिना ताड़ बनाए किसी भी सोशल मुद्दे को 360 डिग्री समझाने की कोशिश करते हैं.<p></p> अमर उजाला, फिरकी डॉट इन से अपने पत्रकारीय सफर की शुरुआत की है. पाठकों तक सरल शब्दों में खबरें पहुंचाना उद्देश्य रहा है. लेखन की इस दुनिया में दिलचस्पी इसलिए बढ़ गई, क्योंकि बचपन से ही काफी ज्यादा बातूनी रहे हैं. <p></p>फिलहाल, टीवी9 में फीचर राइटिंग करते हुए सोशल मीडिया की नब्ज पकड़ने में माहिर हो गए है. अजीबोगरीब खबरों को गजब तरीके से लिखकर आप सबके सामने पेश करते हैं.
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