'कहां मर गए तुम लोग', अभिजीत दीपके का सौरव दास,आशुतोष रांका पर क्यों फूटा था गुस्सा? क्या CJP में आई दरार?
Updated: Sunday, August 30, 2026, 23:16 [IST]
कॉकरोच जनता पार्टी ( CJP) के फाउंडर अभिजीत दीपके का एक बयान अब उनकी टीम को लेकर सवाल खड़े कर रहा है। मामला 20 जुलाई के 'संसद चलो' मार्च का है। उस दिन दीपके अपनी ही पार्टी के प्रवक्ताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की गैरमौजूदगी से काफी नाराज थे।
BBC को दिए इंटरव्यू में अभिजीत दीपके ने उस दिन क्या-क्या हुआ था,उसके बारे में बताया। उन्होंने बताया कि दोनों प्रवक्ताओं सौरव दास और आशुतोष रांका को BJP नेताओं ने बातचीत के लिए बुलाया था। मीटिंग करीब 10 मिनट की थी, लेकिन दोनों करीब पांच घंटे तक वहीं फंसे रहे। इसी दौरान जंतर-मंतर पर मौजूद प्रदर्शनकारी मार्च आगे बढ़ाने के लिए बेचैन हो रहे थे।
BJP नेताओं से मिलने गए थे दोनों, फिर पांच घंटे तक क्यों नहीं लौटे?
अभिजीत दीपके के मुताबिक, 20 जुलाई को सौरव दास और आशुतोष रांका को BJP के प्रतिनिधिमंडल ने बातचीत के लिए बुलाया था। दोनों मीटिंग में चले गए। दीपके का कहना है कि बातचीत करीब 10 मिनट में खत्म हो गई थी, लेकिन इसके बावजूद दोनों को लगभग पांच घंटे तक वहां रोके रखा गया।
दीपके ने कहा, "दोनों को BJP की तरफ से बातचीत के लिए बुलाया गया था। मीटिंग करीब 10 मिनट चली, लेकिन उन्हें वहां लगभग पांच घंटे तक रुकना पड़ा।" इस दौरान जंतर-मंतर पर माहौल बदल रहा था। प्रदर्शनकारी आगे बढ़कर संसद की तरफ मार्च करना चाहते थे। लेकिन दीपके खुद भूख हड़ताल के तीसरे दिन थे और काफी कमजोर हो चुके थे।
फोन भी नहीं लग रहे थे, भीड़ को कौन संभाले?
अभिजीत दीपके ने बताया कि उन्होंने सौरव दास और आशुतोष रांका से संपर्क करने की कई कोशिशें कीं। लेकिन दोनों के फोन नहीं लग रहे थे। इससे उनकी नाराजगी और बढ़ गई। उनका कहना था कि उस वक्त भीड़ को संबोधित करने की हालत में वह खुद नहीं थे।
ऐसे में उन्हें उम्मीद थी कि दोनों प्रवक्ता वहां मौजूद रहकर प्रदर्शनकारियों से बात करेंगे और मार्च को संभालेंगे। अभिजीत दीपके ने कहा, "मैं उन दोनों से बहुत नाराज था। मेरे पास भीड़ को संबोधित करने की ताकत नहीं बची थी और प्रदर्शनकारी लगातार मार्च शुरू करने की मांग कर रहे थे। ऐसे वक्त में उनका वहां होना बहुत जरूरी था।"
तीसरे दिन ही क्यों टूट गई अभिजीत दीपके की ताकत?
अभिजीत दीपके ने यह भी माना कि उन्हें भूख हड़ताल के दौरान अपनी शारीरिक सीमाओं का अंदाजा नहीं था। उन्होंने कहा कि पहले दो दिनों तक वह लगातार प्रदर्शनकारियों से बात करते रहे और भीड़ को संबोधित करते रहे। इसका असर तीसरे दिन साफ दिखा। 20 जुलाई को वह काफी कमजोर हो गए थे। उन्होंने बताया कि सुबह वह बेहोश तक हो गए थे। चलने में भी दिक्कत थी। इसी वजह से उन्हें ट्रक पर चढ़कर आगे जाना पड़ा।
अभिजीत दीपके ने कहा, "मुझे पहले यह समझ नहीं था कि भूख हड़ताल के दौरान शरीर को कितना आराम देना चाहिए। मैं दो दिन तक लगातार लोगों से मिलता और उन्हें संबोधित करता रहा। तीसरे दिन मेरी हालत इतनी खराब हो गई कि मेरे अंदर बिल्कुल ऊर्जा नहीं बची थी। सुबह मैं बेहोश भी हो गया था और चल नहीं पा रहा था।"
अगर सौरव दास-आशुतोष रांका वहीं होते तो क्या बदल जाता?
अभिजीत दीपके के मुताबिक, अगर सौरव दास और आशुतोष रांका उस समय जंतर-मंतर पर मौजूद होते तो प्रदर्शनकारियों को संभालना आसान होता। वह खुद भीड़ के बीच सक्रिय नहीं हो पा रहे थे। ऐसे में दोनों प्रवक्ताओं की भूमिका और अहम हो जाती।
हालांकि इस बयान को सीधे तौर पर CJP में दरार का सबूत कहना अभी जल्दबाजी होगी। अभिजीत दीपके ने अपने इंटरव्यू में उस दिन की नाराजगी और परिस्थितियों के बारे में बात की है। उपलब्ध जानकारी में उन्होंने यह नहीं कहा कि दोनों के साथ उनका राजनीतिक या संगठनात्मक रिश्ता खत्म हो गया है।
क्या था 20 जुलाई का 'संसद चलो' मार्च?
20 जुलाई का मार्च CJP के उस लंबे आंदोलन का हिस्सा था, जिसमें NEET UG परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की जा रही थी। 20 जुलाई को संसद के मानसून सत्र का पहला दिन था। प्रदर्शनकारियों ने जंतर-मंतर से संसद की तरफ बढ़ने की कोशिश की।
इस दौरान जंतर-मंतर, संसद के आसपास, रायसीना रोड, जनपथ, कनॉट प्लेस और इंडिया गेट जैसे इलाकों में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच कई बार झड़पें हुईं। यह आंदोलन करीब 37 दिनों तक चला। इसके बाद 25 जुलाई को तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद CJP ने आंदोलन वापस लेने का ऐलान किया।
तो क्या CJP में सच में दरार है?
सामने आए इस बयान से इतना जरूर पता चलता है कि 20 जुलाई को अभिजीत दीपके सौरव दास और आशुतोष रांका की गैरमौजूदगी से बेहद नाराज थे। इसकी वजह संगठन के भीतर कोई बड़ा विवाद था या सिर्फ उस दिन की असाधारण परिस्थितियां, यह अलग सवाल है। अभिजीत दीपके की बातों से फिलहाल इसे एक कॉर्डिनेशन इश्यू के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा। टीम में स्थायी दरार है, इसका कोई स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आया है।