EVM वोटों को गिनने का टोटलाइजर मेथड क्या है? कांग्रेस-बीजेपी के साथ चुनाव आयोग भी कर रही है विरोध

वोटों की गिनती का टोटलाइजर मेथड क्या है?
भारत में चुनावी वोटों की गिनती का तरीका एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के सवालों के केंद्र में है. यहां के चुनावी व्यवस्था में वोटों की गिनती बूथ के हिसाब से होती है. सुप्रीम कोर्ट ने अब इससे जुड़े एक मामले में केंद्र और चुनाव आयोग से पूछा है कि जब टोटलाइजर मेथड वोटर की पसंद को गुमनाम रखने में मदद कर सकता है, तो इसे EVM की गिनती में क्यों नहीं अपनाया जा सकता? अब कोर्ट ने ECI ने इसके फायदे माने हैं, लेकिन बूथवार पारदर्शिता, Form 17C से मिलान और EVM-VVPAT की मौजूदा जांच व्यवस्था पर इसके असर को लेकर व्यावहारिक और कानूनी अड़चनें गिनाई हैं.
अगर किसी विधानसभा सीट पर 300 बूथ हैं. हर बूथ पर इस्तेमाल हुई EVM की कंट्रोल को काउंटिंग सेंटर पर लाया जाता है. फिर एक-एक EVM का रिजल्ट बटन दबाने पर उसमें अलग-अलग उम्मीदवारों को मिले वोट सामने आते हैं. फिर सभी बूथों के आंकड़े जोड़कर विधानसभा क्षेत्र का अंतिम परिणाम तैयार किया जाता है. चुनाव के मुताबिक मौजूदा व्यवस्था में Form 17 C के जरिए बूथ पर दर्ज कुल वोटों का मिलान काउंटिंग के दौरान EVM के आंकड़ों से किया जाता है.
वहीं, टोटलाइजर प्रक्रिया हर EVM का उम्मीदवारवार रिजल्ट अलग-अलग सार्वजनिक करने के बजाय कई EVM को एक साथ जोड़कर उनका संयुक्त रिजल्ट निकाला जाएगा. इसका मतलब अगर किसी क्षेत्र में 14 बूथ हैं तो इस मेथड से सिर्फ यह पता चल पाएगा कि 14 बूथों में मिलाकर उम्मीदवार A को कितने वोट, उम्मीदवार B को कितने वोट और उम्मीदवार C को कितने वोट मिले.लेकिन यह पता नहीं चलेगा कि इन 14 में से किस खास बूथ पर किस उम्मीदवार को कितने वोट मिले.
अभी वोटों की गिनती की व्यवस्था क्या है?
अभी की व्यवस्था में चारों बूथ का अलग-अलग रिजल्ट सामने आता है.इससे राजनीतिक दलों को पता चल जाता है कि किस बूथ पर उनका प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा और किस बूथ पर बहुत खराब. टोटलाइजर प्रक्रिया में यह किसी को पता नहीं चल सकता है कि बूथ नंबर 1 पर A को 500 मिले या 100. यानी वोट का सामूहिक परिणाम सामने आएगा, लेकिन बूथ का वोटिंग पैटर्न छिपा रहेगा. ECI के दस्तावेजों में भी बताया गया है कि इसका इस्तेमाल 14 EVM के समूह का संयुक्त परिणाम निकालने के लिए प्रस्तावित किया गया था, ताकि किसी खास बूथ पर हुए मतदान का रुझान सामने न आए.

टोटलाइजर मेथड की जरूरत क्यों महसूस हुई?
- टोटलाइजर के पीछे सबसे बड़ा तर्क वोटर की गोपनीयता और सुरक्षा है.
- मान लीजिए किसी गांव के एक बूथ पर किसी पार्टी को सिर्फ कम प्रतिशत वोट मिले दूसरी पार्टी को ज्यादा.
- अगर बूथवार आंकड़े सामने हैं तो राजनीतिक दलों को यह पता चल सकता है कि उस इलाके में किस पार्टी को भारी समर्थन या विरोध मिला.
- टोटलाइजर के समर्थकों का तर्क है कि इससे चुनाव के बाद वोटरों की पहचान उनके मतदान व्यवहार से जोड़ने की संभावना कम होगी.
- किसी पार्टी के लिए यह जानना कि कौन-सा गांव या बूथ उसके खिलाफ गया, स्थानीय स्तर पर दबाव, धमकी या चुनाव बाद प्रताड़ना की आशंका पैदा कर सकता है.
- इसी वजह से चुनाव आयोग ने 2008 में सरकार से नियमों में बदलाव की सिफारिश की थी.
- बाद में लॉ कमीशन की 255वीं रिपोर्ट ने भी उन परिस्थितियों में टोटलाइजर की प्रक्रिया के इस्तेमाल की सिफारिश की थी,
- जहां चुनाव आयोग को मतदाताओं के डराने या चुनाव के बाद प्रताड़ित किए जाने की आशंका हो.
फिर टोटलाइजर मेथड देश में लागू क्यों नहीं हुआ?
चुनाव आयोग ने पहले टोटलाइजर की प्रक्रि.ा का समर्थन किया था. लेकिन इसे लागू करने पर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर विरोध होने लगा. आयोग ने 2016 में राजनीतिक दलों से इस पर राय मांगी गई थी. ECI के अनुसार 3 में से 3 राष्ट्रीय दल और 29 में से 18 राज्य दलों ने इसका विरोध किया था. इसके बाद 2016 में बनी ग्रुप ऑफ मिनिस्टर कमिटी ने भी प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया. विरोध करने वालों का तर्क था कि बूथवार परिणाम भी चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता का अहम हिस्सा
विरोध कर रहे लोगों का यह भी तर्क था अगर किसी बूथ की EVM में कोई गड़बड़ी होती है, तो बूथवार रिजल्ट से उसे अलग पहचानना आसान होता है. लेकिन कई EVM के वोटों को एक साथ जोड़ दिया जाए तो किसी एक मशीन में मौजूद संभावित गड़बड़ियां पूरे समूह के आंकड़े में छिप सकती है.यही चुनाव आयोग की मौजूदा आपत्ति का एक बड़ा आधार है. आयोग का कहना है कि बूथवार Form 17C और EVM के आंकड़ों के बीच एक-से-एक मिलान मौजूदा चुनावी प्रक्रिया की स्व-सत्यापन करने वाला और ट्रांसपैरेंट व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है.
टोटलाइजर मेथड के लिए समर्थकों और विरोधियों का क्या है तर्क?
टोटलाइजर मेथड के पक्ष में तर्क हैवोटर की निजता सुरक्षित रहेगी. लेकिन विरोधियों का यह तर्क है कि बूथवार आंकड़े चुनाव की निगरानी और पारदर्शिता के लिए जरूरी हैं. अगर कई EVM के आंकड़े मिला दिए गए तो किसी खास मशीन या बूथ के आंकड़े की स्वतंत्र जांच मुश्किल हो सकती है. यानी विवाद असल में ‘पारदर्शिता बनाम वोटर प्राइवेसी’ का है.
सुप्रीम कोर्ट ने अब चुनाव आयोग क्या पूछा?
1 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में इसी मुद्दे पर सुनवाई हुई. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने केंद्र और चुनाव आयोग से पूछा कि बूथवार गिनती के बजाय टोटलाइजर से वोटों की गिनती क्यों नहीं की जा सकती? कोर्ट ने यह भी पूछा कि जब कंडक्ट ऑफ इलेक्शन रूल में पेपर बैलेट के लिए रूल 59A के तहत कुछ परिस्थितियों में टोटलाइजेशन का प्रावधान मौजूद है, तो EVM के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकती.
टोटलाइजर मेथड लागू करने को लेकर कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस जॉयमल्या बागची ने भी माना कि सिद्धांत के स्तर पर टोटलाइजर वोटर की पसंद को गोपनीय करने का माध्यम हो सकता है. लेकिन समस्या यह है कि इसके लिए कानूनी आधार चाहिए.यानी कोर्ट सीधे यह नहीं कह रहा कि टोटलाइजर लागू ही कर दिया जाए. सवाल यह है कि अगर इसकी जरूरत महसूस होती है तो क्या मौजूदा चुनाव कानूनों में बदलाव करके ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है.

सचिन धर दुबे
सचिन धर दुबे को डिजिटल पत्रकारिता में करीब 7 साल का अनुभव है. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में न्यूज 18 से की. फिर गांव कनेक्शन, ANI, आजतक होते हुए अब TV9 Hindi तक पहुंचे. न्यूज 18 में असाइनमेंट पर कॉपी एडिटर, गांव कनेक्शन में मल्टीमीडिया जर्नलिस्ट, ANI में कंटेंट राइटर और आजतक में सीनियर सब एडिटर पद पर काम किया. सचिन ने कृषि पत्रकारिता में काफी समय बिताया. उनकी राजनीति, विश्व, स्पोर्ट्स, हिस्ट्री ओरिएंटेड विषयों पर लिखने में काफी इंटरेस्ट है. सचिन ने गांव कनेक्शन में रहते हुए ग्राउंड रिपोर्टिंग में भी हाथ आजमाया है. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से Msc इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के रहने वाले हैं.
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