Explainer: अमरनाथ में समय से पहले क्यों पिघल गया बर्फ का शिवलिंग? जानिए क्या एलीवेशन डिपेंडेंट वार्मिंग| Navbharat Live

Updated On: Jul 12, 2026 | 10:17 PM IST

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सार

Amarnath Yatra 2026: अमरनाथ यात्रा के बीच प्राकृतिक रूप से बनने वाला बर्फ का शिवलिंग समय से पहले ही 90 प्रतिशत से अधिक पिघल गया है, जिसने पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।

Amarnath Yatra 2026

समय से पहले पिघला अमरनाथ गुफा में शिवलिंग (AI जेनरेटेड इमेज)

विस्तार

Amarnath Ice Lingam Melting: 3 जुलाई 2026 को अमरनाथ यात्रा की शुरुआत हुई। इसके बाद से ही श्रद्धालु लगातार बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए आ रहे हैं। लेकिन इस बार एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने श्रद्धालुओं के साथ-साथ वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों की भी चिंता बढ़ा दी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्राकृतिक रूप से बनने वाला बर्फ का शिवलिंग यात्रा पूरी होने से पहले ही 90 प्रतिशत से अधिक पिघल चुका है। इसने हर किसी के मन में सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि यहां बात केवल शिवलिंग के छोटे होने की नहीं है, बल्कि यह है कि आखिर ऐसा इतनी जल्दी क्यों हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे जलवायु परिवर्तन और हिमालय में तेजी से बढ़ता तापमान बड़ी वजह हो सकते हैं। 

तेजी से गर्म हो रहा है हिमालय

अमरनाथ गुफा समुद्र तल से करीब 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां का तापमान सामान्य रूप से इतना ठंडा रहता है कि गुफा के अंदर प्राकृतिक रूप से बर्फ का शिवलिंग बनता है। लेकिन इस बार आसपास का तापमान सामान्य से अधिक रहा, जिससे बर्फ लंबे समय तक टिक नहीं सकी।

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एलिवेशन डिपेंडेंट वार्मिंग (AI जेनरेटेड इमेज)

विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र दुनिया के औसत तापमान की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। वैज्ञानिक इसे एलीवेशन डिपेंडेंट वार्मिंग कहते हैं। यानी ऊंचाई वाले इलाकों में तापमान तेजी से बढ़ता है और इसका असर सबसे पहले बर्फ और ग्लेशियरों पर दिखाई देता है।

बारिश और बर्फबारी के बदलते पैटर्न का भी असर

विशेषज्ञों के मुताबिक, सिर्फ बढ़ता तापमान ही नहीं, बल्कि बारिश और बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव भी शिवलिंग के आकार को प्रभावित करते हैं। अगर सर्दियों में पर्याप्त बर्फबारी नहीं होती, तो गर्मी शुरू होने से पहले शिवलिंग भी पहले जितना बड़ा नहीं बन पाता। इस साल कम बर्फबारी और जल्दी बढ़ी गर्मी ने मिलकर बर्फ के शिवलिंग को तेजी से पिघलाने में भूमिका निभाई।

23 प्रतिशत घटा हिमालय का बर्फीला क्षेत्र

पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक, साल 2000 से 2022 के बीच हिमालय के बर्फ और ग्लेशियर वाले क्षेत्र में 23 प्रतिशत से ज्यादा की कमी दर्ज की गई है। सबसे चिंता की बात यह है कि 2010 के बाद यह प्रक्रिया और तेज हो गई है।

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हिमालय में तेजी से पिघल रही है बर्फ (AI जेनरेटेड इमेज)

अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा, तो इस सदी के अंत तक हिमालय के कुछ ऊंचे इलाकों में तापमान 5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। इससे ग्लेशियर तेजी से पिघलेंगे, बर्फ का क्षेत्र और छोटा होगा और जल स्रोतों पर भी असर पड़ेगा।

पश्चिमी हिमालय सबसे ज्यादा प्रभावित

वैज्ञानिकों का कहना है कि पश्चिमी हिमालय में तापमान सबसे तेजी से बढ़ रहा है। अमरनाथ गुफा भी इसी क्षेत्र में स्थित है। पहले जहां शिवलिंग लगभग एक महीने तक बना रहता था, वहीं इस बार वह करीब 15 दिनों में ही काफी हद तक पिघल गया।

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अमरनाथ गुफा (सोर्स- सोशल मीडिया)

दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर हिमालयन स्टडीज के विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव सिर्फ एक धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं है। पूरे हिमालय में बर्फ, ग्लेशियर और मौसम का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। इसका असर वनस्पति और वन्यजीवों पर भी दिखाई दे रहा है। जो जीव-जंतु पहले 3,900 मीटर तक मिलते थे, वे अब 4,500 मीटर से अधिक ऊंचाई पर पहुंच रहे हैं।

क्या अटलांटिक महासागर की हीटवेव भी वजह है?

गर्मियों में अटलांटिक महासागर से उठने वाली हीटवेव यूरोप और भूमध्यसागर होते हुए उत्तर-पश्चिमी हिमालय तक असर डाल सकती है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम की यह पूरी प्रणाली बदल रही है और इसका प्रभाव हिमालय के तापमान पर भी पड़ रहा है। हालांकि, वैज्ञानिकों का मानना हैं कि किसी एक घटना को केवल जलवायु परिवर्तन से जोड़ना सही नहीं होगा, लेकिन यह घटना लंबे समय से दिखाई दे रहे तापमान बढ़ने के रुझान से जरूर मेल खाती है।

गुफा का नाजुक प्राकृतिक वातावरण भी प्रभावित

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बड़ी संख्या में अमरनाथ पहुंच रहे श्रद्धालु (सोर्स- सोशल मीडिया)

अमरनाथ गुफा का अपना एक विशेष सूक्ष्म वातावरण होता है। शिवलिंग के बने रहने के लिए गुफा के भीतर तापमान लगातार जमाव बिंदु या उससे नीचे रहना जरूरी है। लेकिन बाहरी गर्मी और मानव गतिविधियों से यह संतुलन बिगड़ सकता है। इस बार यात्रा के शुरुआती चार दिनों में ही 93 हजार से ज्यादा श्रद्धालु गुफा पहुंच चुके थे। बड़ी संख्या में लोगों के एक साथ आने से गुफा के भीतर गर्मी और नमी बढ़ती है। इससे भी बर्फ तेजी से पिघल सकती है।

बढ़ता इंफ्रास्ट्रक्चर भी बन रहा है चुनौती

विशेषज्ञों का कहना है कि श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पिछले कुछ सालों में गुफा के आसपास सड़कें, अस्थायी आवास, बिजली, सोलर लाइट, सामुदायिक रसोई और दूसरी सुविधाएं बढ़ाई गई हैं। हालांकि ये व्यवस्थाएं जरूरी हैं, लेकिन इनके कारण आसपास का तापमान भी बढ़ता है।

भारी मशीनों, जनरेटर और अन्य उपकरणों से निकलने वाली गर्मी गुफा के प्राकृतिक ताप संतुलन को प्रभावित करती है। पहाड़ों को काटकर सड़कें बनाने और लगातार निर्माण कार्यों से भी स्थानीय पर्यावरण पर दबाव बढ़ा है।

संतुलन बनाना सबसे बड़ी जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि अमरनाथ जैसे संवेदनशील धार्मिक स्थल की सुरक्षा के लिए आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है। इसके लिए गुफा में रोज आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या तय सीमा में रखना, प्रवेश और निकास व्यवस्था को बेहतर बनाना, अनावश्यक निर्माण पर रोक लगाना और अधिक गर्मी पैदा करने वाले उपकरणों के इस्तेमाल को सीमित करना जरूरी होगा।

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विशेषज्ञों का कहना है कि अमरनाथ में बर्फ के शिवलिंग का जल्दी पिघलना केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि हिमालय में तेजी से बदलते मौसम का संकेत भी हो सकता है। हिमालय की रक्षा करना सिर्फ उसकी प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत बचाने के लिए ही नहीं, बल्कि देश की जैव विविधता, जल सुरक्षा और करोड़ों लोगों की आजीविका के लिए भी बेहद जरूरी है। 

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