Explainer: अब निजी कंपनियां भी बनाएंगी DRDO की मिसाइलें, BDL का दशकों पुराना एकाधिकार खत्म, समझें क्या बदलेगा
भारत की मिसाइल निर्माण व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है. करीब छह दशक से DRDO की ओर से विकसित की गई ज्यादातर मिसाइलों का उत्पादन एक तय व्यवस्था के तहत होता रहा है. DRDO तकनीक और मिसाइल डिजाइन तैयार करता था, इसके बाद सरकारी रक्षा कंपनी Bharat Dynamics Limited यानी BDL को अक्सर उत्पादन की जिम्मेदारी मिल जाती थी. निजी कंपनियां भी इस सप्लाई चेन का हिस्सा थीं, लेकिन उनकी भूमिका मुख्य रूप से मिसाइल के अलग-अलग हिस्से बनाने तक सीमित रहती थी.
अब इस व्यवस्था को बदल दिया गया है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO की ओर से विकसित सभी पारंपरिक यानी Conventional Missile Systems की तकनीक भारतीय रक्षा कंपनियों को ट्रांसफर करने की मंजूरी दे दी है. इसका उद्देश्य देश में मिसाइलों का उत्पादन बढ़ाना, निजी कंपनियों को रक्षा निर्माण से जोड़ना और युद्ध की स्थिति में हथियारों की उपलब्धता बढ़ाना है.
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब किसी DRDO मिसाइल का उत्पादन अपने आप किसी एक सरकारी कंपनी को नहीं मिलेगा. योग्य निजी कंपनियां भी इसके लिए प्रतिस्पर्धा कर सकेंगी. यानी भारत के मिसाइल उत्पादन मॉडल में सरकारी एकाधिकार से प्रतिस्पर्धी व्यवस्था की ओर बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा.
सरकार ने आखिर क्या मंजूर किया है?
रक्षा मंत्रालय के फैसले का सीधा मतलब है कि DRDO की ओर से विकसित पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक भारतीय कंपनियों को उत्पादन के लिए दी जा सकेगी. कंपनियों को जरूरी तकनीकी, औद्योगिक, वित्तीय और सुरक्षा मानकों को पूरा करना होगा.
योग्य कंपनियों को Development-cum-Production Partner यानी DcPP के रूप में चुना जा सकता है. ये कंपनियां DRDO के साथ मिलकर संबंधित मिसाइल प्रणाली के उत्पादन और सिस्टम इंटीग्रेशन में भूमिका निभाएंगी.
पहले ऐसी मिसाइलों के उत्पादन में BDL की भूमिका काफी हद तक तय होती थी. अब कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा होगी. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि BDL को मिसाइल उत्पादन से बाहर कर दिया गया है. उसके पास दशकों का अनुभव, उत्पादन सुविधाएं, प्रशिक्षित कर्मचारी और मजबूत सप्लायर नेटवर्क है. लेकिन अब उसे भी कई मामलों में दूसरे संभावित उत्पादन साझेदारों से मुकाबला करना पड़ सकता है.
इस फैसले से क्या-क्या बदलेगा?
भारत के रक्षा उत्पादन मॉडल में इस फैसले के बाद कई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं. आसान भाषा में इसे ऐसे समझें:
* निजी कंपनियों को मौका मिलेगा: योग्य भारतीय कंपनियां DRDO की मिसाइल तकनीक हासिल करके उनका उत्पादन कर सकेंगी.
* BDL का एकाधिकार खत्म होगा: DRDO की हर मिसाइल का उत्पादन अपने आप BDL को मिलने की पुरानी व्यवस्था खत्म होगी.
* प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी: कंपनियों का चयन उनकी तकनीकी, औद्योगिक और वित्तीय क्षमता के आधार पर होगा.
* मिसाइल उत्पादन बढ़ सकता है: एक से ज्यादा उत्पादन साझेदार होने से जरूरत के समय सप्लाई बढ़ाना आसान हो सकता है.
* DRDO पर उत्पादन का बोझ घटेगा: DRDO नई तकनीक और अगली पीढ़ी की मिसाइल विकसित करने पर ज्यादा ध्यान दे सकेगा.
* निजी रक्षा उद्योग को बड़ा बाजार मिलेगा: बड़ी कंपनियों के साथ MSME और तकनीकी सप्लायर भी मिसाइल सप्लाई चेन में ज्यादा भूमिका निभा सकते हैं.
कौन-कौन सी मिसाइलें इसके दायरे में आएंगी?
यह फैसला भारत की सभी मिसाइलों के लिए नहीं है. इसमें Conventional Missile Systems को शामिल किया गया है. इसका मतलब ऐसी मिसाइलें हैं जो पारंपरिक विस्फोटक या अन्य गैर-परमाणु तरीके से लक्ष्य को नष्ट करती हैं.
भारत की रणनीतिक और परमाणु प्रतिरोध से जुड़ी मिसाइल प्रणालियां इस व्यवस्था से बाहर रहेंगी. Agni सीरीज और समुद्र आधारित परमाणु प्रतिरोध से जुड़ी प्रणालियों को इस व्यवस्था में शामिल नहीं किया गया है.
इसी तरह BrahMos और MRSAM जैसी संयुक्त या अंतरराष्ट्रीय साझेदारी वाली प्रणालियां भी इस फैसले के दायरे में नहीं आतीं.
दूसरी तरफ सामरिक और थिएटर स्तर की कई स्वदेशी मिसाइलों को इस नई व्यवस्था के तहत निजी क्षेत्र के लिए खोला जा रहा है. इनमें Akash और Akash-NG, VSHORADS, Astra परिवार, Rudram सीरीज, Nag, SANT, मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल, NASM-SR, स्वदेशी लैंड-अटैक क्रूज मिसाइल और Pralay जैसी प्रणालियां शामिल हैं.
इनमें Astra और Pralay जैसे सिस्टम की मांग भविष्य में बढ़ने की संभावना है, इसलिए इनके उत्पादन में निजी कंपनियों की भागीदारी महत्वपूर्ण हो सकती है.
निजी कंपनियों को DRDO की तकनीक कैसे मिलेगी?
कंपनियों को DRDO की तकनीक सीधे बेच नहीं दी जाएगी. इसके लिए Technology Transfer यानी ToT की प्रक्रिया अपनाई जाएगी. कंपनी को Licence Agreement for Transfer of Technology यानी LAToT के जरिए तकनीक इस्तेमाल करने का अधिकार दिया जाएगा.
इस व्यवस्था में मूल Intellectual Property यानी बौद्धिक संपदा का मालिकाना हक DRDO के पास ही रहेगा. कंपनी को केवल उस तकनीक का इस्तेमाल करके संबंधित मिसाइल बनाने का लाइसेंस मिलेगा.
ट्रांसफर होने वाली तकनीक में इंजीनियरिंग ड्रॉइंग, निर्माण प्रक्रिया, गुणवत्ता जांच की योजना, परीक्षण से जुड़े प्रोटोकॉल और रखरखाव की जानकारी शामिल हो सकती है. कंपनियां इस तकनीक को किसी दूसरी कंपनी को आगे ट्रांसफर नहीं कर सकेंगी और गोपनीयता से जुड़े नियम भी लागू होंगे.
मिसाइल तकनीक के निर्यात पर भी भारत के अंतरराष्ट्रीय दायित्व लागू रहेंगे. खास तौर पर Missile Technology Control Regime यानी MTCR के नियमों का पालन जरूरी होगा.
कंपनियों के लिए यह व्यवस्था कितनी फायदेमंद होगी?
सरकार ने निजी क्षेत्र को आकर्षित करने के लिए तकनीक ट्रांसफर की लागत को भी अपेक्षाकृत आसान रखा है. DcPP और कुछ अन्य पात्र साझेदारों के लिए DRDO की ओर से ToT फीस नहीं लेने का प्रावधान है.
सशस्त्र बलों और सरकारी विभागों को होने वाली बिक्री पर रॉयल्टी भी नहीं रखी गई है, जबकि व्यावसायिक और निर्यात बिक्री पर रॉयल्टी का प्रावधान है. इसके अलावा भारतीय उद्योग को DRDO के पेटेंट पूल तक पहुंच देने की व्यवस्था भी की गई है.
इसका उद्देश्य साफ है. सरकार चाहती है कि निजी कंपनियों को मिसाइल उत्पादन में बड़ा निवेश करने के लिए पर्याप्त आर्थिक प्रोत्साहन मिले और देश में उत्पादन का मजबूत नेटवर्क तैयार हो.
कंपनियों का चयन कैसे होगा?
किसी भी निजी कंपनी को केवल इसलिए मिसाइल बनाने की अनुमति नहीं मिल जाएगी कि वह रक्षा क्षेत्र में काम करती है. कंपनियों को कई कड़े मानकों को पूरा करना होगा.
उनकी तकनीकी क्षमता, उत्पादन सुविधाओं, गुणवत्ता नियंत्रण, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट और वित्तीय स्थिति की जांच की जाएगी. इसके बाद योग्य कंपनियों को अलग-अलग मिसाइल परियोजनाओं के लिए Request for Proposal यानी RFP प्रक्रिया में शामिल किया जा सकता है.
एक मिसाइल कार्यक्रम में कम से कम दो उत्पादन साझेदार रखने की सोच भी महत्वपूर्ण है. इसका फायदा यह होगा कि अगर किसी एक कंपनी की उत्पादन लाइन किसी कारण से बंद होती है, तो दूसरी कंपनी से सप्लाई जारी रखी जा सकती है.
युद्ध या आपात स्थिति में यह व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि उस समय मिसाइलों और गोला-बारूद की मांग अचानक कई गुना बढ़ सकती है.
यह फैसला अचानक क्यों नहीं आया?
सरकार का यह फैसला अचानक लिया गया कदम नहीं है. पिछले करीब एक दशक में रक्षा उत्पादन में निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ाने की लगातार कोशिश हुई है.
2015 में L&T पहली भारतीय निजी कंपनी बनी थी जिसे DRDO की ओर से डिजाइन किए गए पूरे सिस्टम के उत्पादन का लाइसेंस मिला था. इसके बाद रक्षा खरीद नीति में स्वदेशी डिजाइन और उत्पादन को प्राथमिकता दी गई.
iDEX और Technology Development Fund जैसी योजनाओं के जरिए स्टार्टअप और छोटी कंपनियों को रक्षा तकनीक से जोड़ा गया. कई रक्षा उपकरणों के आयात पर रोक लगाकर घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया गया.
हाल के वर्षों में निजी कंपनियां मिसाइल और रॉकेट सिस्टम से जुड़े कई प्रोजेक्ट में पहले से काम कर रही हैं. अब सरकार ने मिसाइलों की तकनीक के ट्रांसफर का रास्ता खोलकर इस प्रक्रिया को और आगे बढ़ा दिया है.
इसकी जरूरत अभी क्यों महसूस हुई?
आधुनिक युद्ध में मिसाइलों और सटीक मार करने वाले हथियारों की भूमिका तेजी से बढ़ी है. रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने दिखाया है कि बड़े सैन्य अभियान में मिसाइल और गोला-बारूद बहुत तेजी से खर्च हो सकते हैं.
ऐसे में केवल अत्याधुनिक मिसाइल विकसित करना पर्याप्त नहीं है. देश के पास उन्हें बड़ी संख्या में और लगातार बनाने की क्षमता भी होनी चाहिए.
भारत के सामने चीन और पाकिस्तान की बढ़ती मिसाइल क्षमता भी एक महत्वपूर्ण चुनौती है. चीन के पास बड़ी संख्या में पारंपरिक और रणनीतिक मिसाइल प्रणालियां हैं. पाकिस्तान ने भी अपनी पारंपरिक रॉकेट और मिसाइल क्षमताओं को ज्यादा संगठित करने की दिशा में कदम उठाए हैं.
इस स्थिति में भारत के लिए उत्पादन क्षमता बढ़ाना रणनीतिक जरूरत बन गया है.
भारत के रक्षा उद्योग को कितना फायदा हो सकता है?
भारत का रक्षा उत्पादन पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ा है. लेकिन कुल रक्षा उत्पादन में सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी अभी भी बड़ी है. निजी क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहा है और रक्षा निर्यात में भी उसकी भूमिका बढ़ी है.
मिसाइल निर्माण में निजी कंपनियों की बड़ी भागीदारी से इस क्षेत्र में निवेश बढ़ सकता है. इसके साथ ही मिसाइल के छोटे-छोटे हिस्से बनाने वाली MSME कंपनियों को भी बड़े उत्पादन नेटवर्क का हिस्सा बनने का मौका मिलेगा.
इससे देश में रोजगार, अनुसंधान और तकनीकी विकास को बढ़ावा मिल सकता है. अगर उत्पादन क्षमता पर्याप्त बढ़ती है, तो भारत भविष्य में अपने घरेलू इस्तेमाल के साथ-साथ कुछ प्रणालियों का निर्यात भी बढ़ा सकता है.
BDL के लिए अब क्या बदलेगा?
BDL इस पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण कंपनी बनी रहेगी. उसके पास मिसाइल उत्पादन का सबसे लंबा अनुभव और स्थापित बुनियादी ढांचा है. लेकिन नई व्यवस्था में उसे हर परियोजना का काम अपने आप मिलने की गारंटी नहीं होगी.
यानी BDL को अब अपनी तकनीकी क्षमता, उत्पादन लागत, गुणवत्ता और समय पर डिलीवरी के आधार पर प्रतिस्पर्धा करनी होगी. दूसरी ओर निजी कंपनियों को भी यह साबित करना होगा कि वे मिसाइल के सिर्फ एक हिस्से का उत्पादन नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर पूरी प्रणाली के एकीकरण और बड़े पैमाने पर उत्पादन को संभाल सकती हैं.
सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?
मिसाइल बनाना किसी सामान्य रक्षा उपकरण के उत्पादन से काफी जटिल है. इसमें propulsion, guidance, control, seeker, warhead और launcher जैसे कई सिस्टम एक साथ काम करते हैं. इन सभी को सही तरीके से जोड़ना और हर उत्पादन बैच की कड़ी जांच करना जरूरी होता है.
दूसरी बड़ी चुनौती निवेश की है. मिसाइल उत्पादन के लिए विशेष और महंगी उत्पादन लाइन तैयार करनी पड़ती है. कंपनियां तभी बड़ा निवेश करेंगी जब उन्हें लंबे समय तक पर्याप्त ऑर्डर मिलने का भरोसा होगा.
तीसरी चुनौती सुरक्षा की है. संवेदनशील रक्षा तकनीक को कई कंपनियों तक पहुंचाने के साथ साइबर सुरक्षा और गोपनीय जानकारी की सुरक्षा और महत्वपूर्ण हो जाएगी.
क्या इससे भारत की मिसाइल ताकत बढ़ेगी?
अगर यह नीति सही तरीके से लागू होती है तो भारत की मिसाइल उत्पादन क्षमता बढ़ सकती है. एक से ज्यादा कंपनियों के उत्पादन में आने से सप्लाई चेन ज्यादा मजबूत हो सकती है और किसी एक उत्पादन केंद्र पर निर्भरता कम हो सकती है.
युद्ध जैसी स्थिति में तेजी से हथियारों की जरूरत पूरी करना आसान हो सकता है. साथ ही निजी कंपनियों के आने से नई तकनीक, बेहतर उत्पादन प्रक्रिया और प्रतिस्पर्धी कीमतों को भी बढ़ावा मिल सकता है.
हालांकि इसका असली असर तभी दिखाई देगा जब कंपनियां वास्तव में उत्पादन लाइन स्थापित करें, उन्हें पर्याप्त सरकारी ऑर्डर मिलें और गुणवत्ता व सुरक्षा के मानकों से कोई समझौता न हो.
मिसाइल निर्माण में बदल रहा है भारत का मॉडल
DRDO की पारंपरिक मिसाइल तकनीक को निजी भारतीय कंपनियों के लिए खोलना देश की रक्षा उत्पादन नीति में एक बड़ा बदलाव है. यह केवल BDL की भूमिका को चुनौती देने का फैसला नहीं है, बल्कि भारत के मिसाइल उत्पादन मॉडल को ज्यादा व्यापक और प्रतिस्पर्धी बनाने की कोशिश है.
अब DRDO का फोकस नई तकनीक विकसित करने पर ज्यादा हो सकता है, जबकि सरकारी और निजी कंपनियां उस तकनीक को बड़े पैमाने पर उत्पादन में बदल सकती हैं.
अगर प्रतिस्पर्धी चयन, स्थिर ऑर्डर, गुणवत्ता नियंत्रण और तकनीक की सुरक्षा को सही तरीके से सुनिश्चित किया जाता है, तो आने वाले वर्षों में भारत की मिसाइल उत्पादन क्षमता काफी बढ़ सकती है.
कुल मिलाकर, यह फैसला भारत को ‘कुछ चुनिंदा उत्पादन एजेंसियों’ से ‘कई सक्षम उत्पादन साझेदारों’ वाले मॉडल की ओर ले जा रहा है. BDL की भूमिका खत्म नहीं हुई है, लेकिन अब उसे उन निजी कंपनियों से मुकाबला करना होगा जो पहली बार DRDO की पूरी मिसाइल तकनीक के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रही हैं.