Explainer: बॉलीवुड में कब और कैसे हुई Ganesh Chaturthi की शुरुआत? यहां पर जानिए इसके पीछे की पूरी कहानी

Ganesh Chaturthi in Bollywood: गणेश चतुर्थी का नाम आते ही आंखों के सामने भगवान गणेश की खूबसूरत प्रतिमा, फूलों से सजे पंडाल, ढोल-नगाड़े, गणपति बप्पा मोरया के जयकारे और विसर्जन की भव्य तस्वीर सामने आ जाती है. महाराष्ट्र में तो इस त्योहार का उत्साह देखते ही बनता है. जी हां, मुंबई और पुणे की गलियों से लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों तक गणेशोत्सव आज एक बड़े सामाजिक और सांस्कृतिक त्योहार का रूप ले चुका है. वहीं बॉलीवुड भी इससे अछूता नहीं है. हर साल कई सितारे अपने घर गणपति बप्पा की स्थापना करते हैं और सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें और वीडियो शेयर करते हैं.

लेकिन सवाल ये उठता है कि गणेश चतुर्थी की शुरुआत आखिर कब हुई? क्या हमेशा से इसे इतने बड़े स्तर पर मनाया जाता था? और घरों में होने वाली गणेश पूजा कब पब्लिक सेलिब्रेशन में बदल गई? इसकी कहानी सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है. चलिए इसके बारे में डिटेल में समझते हैं. 

सबसे पहले समझिए क्या है गणेश चतुर्थी

गणेश चतुर्थी को भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है. हिंदू कैलेंडर के अनुसार ये त्योहार भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होता है. भगवान गणेश को विघ्नहर्ता यानी बाधाओं को दूर करने वाला और शुभ कार्यों की शुरुआत का देवता माना जाता है. भारत में इस त्योहार की धार्मिक परंपरा सदियों पुरानी है. खास तौर पर दक्कन के इलाकों यानी आज के महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में गणेश पूजा की परंपरा लंबे समय से रही है. ऐतिहासिक स्रोतों के मुताबिक 13वीं सदी से पहले भी गणेश से जुड़े उत्सव मनाए जाने के प्रमाण मिलते हैं. 

पेशवाओं के दौर में भी होता था गणेशोत्सव

महाराष्ट्र में गणेश पूजा को एक नया सामाजिक और राजकीय स्वरूप पेशवाओं के समय मिला. पेशवा शासक भगवान गणेश के बड़े भक्त माने जाते थे. पुणे के शनिवारवाड़ा में भी गणेश पूजा और उत्सव का खास महत्व था. इतिहास से जुड़े विवरणों के मुताबिक भाद्रपद के दौरान मिट्टी की गणेश प्रतिमा स्थापित की जाती थी और उत्सव कई दिनों तक चलता था. उस समय संगीत, डांस और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते थे. बड़ी संख्या में लोग दर्शन और प्रसाद के लिए पहुंचते थे. हालांकि पेशवाओं के पतन और ब्रिटिश शासन के मजबूत होने के बाद इस तरह के बड़े राजकीय गणेशोत्सव का स्वरूप कमजोर पड़ गया. इसके बाद गणेश पूजा मुख्य रूप से परिवारों और सीमित समुदायों तक सिमटती चली गई.

1893 से बदल गई गणेशोत्सव की तस्वीर

अब कहानी में आते हैं लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक. 19वीं सदी के आखिरी दशक में भारत अंग्रेजी हुकूमत के अधीन था. उस समय भारतीयों के लिए बड़ी संख्या में एक जगह इकट्ठा होकर राजनीतिक चर्चा करना आसान नहीं था. तिलक इस बात को समझ चुके थे कि अगर देशवासियों को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट करना है तो उन्हें किसी ऐसे मंच की जरूरत होगी, जहां लोग बड़ी संख्या में एक साथ आ सकें. यहीं से गणेशोत्सव को सार्वजनिक रूप देने का विचार सामने आया.

1893 में तिलक ने गणपति उत्सव को निजी धार्मिक आयोजन से निकालकर सार्वजनिक उत्सव के रूप में लोकप्रिय बनाने की दिशा में काम शुरू किया. उस दौर में ये एक महत्वपूर्ण कदम था, क्योंकि धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन के नाम पर बड़ी संख्या में लोग एक जगह जमा हो सकते थे. कुछ ऐतिहासिक स्रोतों में 1893 को तिलक की सार्वजनिक पहल का शुरुआती साल बताया गया है, जबकि कुछ शोध 1894 में पुणे में इसके व्यवस्थित सार्वजनिक स्वरूप को महत्वपूर्ण मानते हैं. इसलिए इतिहास में 1893-94 दोनों सालों का जिक्र मिलता है.

तिलक ने गणेश जी को ही क्यों चुना?

सवाल ये उठता है कि तिलक ने सार्वजनिक आंदोलन के लिए गणेश उत्सव को ही क्यों चुना? इसका सबसे बड़ा कारण था भगवान गणेश की पॉपुलेरिटी. गणेश जी की पूजा महाराष्ट्र के अलग-अलग सामाजिक वर्गों में पहले से होती थी. इसलिए उनके नाम पर लोगों को एक साथ लाना  आसान था. तिलक चाहते थे कि अलग-अलग सामाजिक वर्गों के लोग एक मंच पर आएं. उस समय सार्वजनिक राजनीतिक गतिविधियों पर अंग्रेजों की निगरानी रहती थी, लेकिन धार्मिक उत्सव पर उसी तरह रोक लगाना आसान नहीं था. इस तरह गणेश उत्सव सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं रहा. पंडालों में सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम होने लगे. लोगों के बीच विचारों का आदान-प्रदान हुआ और राष्ट्रवादी भावनाओं को भी जगह मिलने लगी.

पुणे से मुंबई और फिर पूरे महाराष्ट्र में फैला उत्सव

सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत पुणे में हुई और जल्द ही इसका असर महाराष्ट्र के दूसरे इलाकों में दिखाई देने लगा. मुंबई की चॉल संस्कृति ने भी इसे लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई. 1893 में मुंबई के केशवजी नाइक चॉल में आयोजित गणेशोत्सव को शुरुआती सार्वजनिक आयोजनों में गिना जाता है. वहां गणेश पूजा सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं रही, बल्कि पूरी कम्युनिटी को जोड़ने वाला आयोजन बन गई. इसके बाद अलग-अलग मोहल्लों और बस्तियों में गणेश मंडल बनने लगे. लोग चंदा इकट्ठा करते, पंडाल सजाते और सामूहिक रूप से पूजा और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने लगे. धीरे-धीरे ये परंपरा महाराष्ट्र से निकलकर देश के दूसरे हिस्सों में भी फैलती गई.

10 दिनों का उत्सव कब से इतना पॉपुलर हुआ?

आज गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक करीब 10 दिनों तक गणेशोत्सव मनाने की परंपरा बेहद पॉपुलर है. इस दौरान लोग गणपति की स्थापना करते हैं, सुबह-शाम आरती करते हैं, प्रसाद चढ़ाते हैं और कई जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. उत्सव के आखिरी दिन गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है. इसी दौरान ‘गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ’ जैसे जयकारे पूरे माहौल को भावुक बना देते हैं.

बॉलीवुड से कैसे जुड़ा गणेशोत्सव?

मुंबई और बॉलीवुड का रिश्ता बहुत पुराना है. मुंबई में गणेशोत्सव की भव्यता बढ़ने के साथ फिल्म इंडस्ट्री के सितारे भी इससे जुड़ते गए. आज अमिताभ बच्चन से लेकर सलमान खान, शाहरुख खान और कई दूसरे बॉलीवुड सितारे गणपति उत्सव मनाते नजर आते हैं. कई स्टार्स अपने घर गणपति की स्थापना करते हैं और परिवार के साथ पूजा-अर्चना करते हैं. खास बात ये है कि बॉलीवुड में गणेशोत्सव सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि मुंबई की सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा बन चुका है. फिल्मों में भी गणपति उत्सव को कई बार दिखाया गया है. ‘अग्निपथ’ का ‘देवा श्री गणेशा’ और ‘एबीसीडी’ का ‘गणपति बप्पा मोरया’ जैसे गाने इस उत्सव की लोकप्रियता को सिनेमाई पर्दे पर भी दिखाते हैं.

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