Ganpati Sthapana Muhurat : भूलकर भी भद्रा काल में न लाएं बप्पा, जानें 14 सितंबर को स्थापना का सबसे शुभ समय
गणेश चतुर्थी पर बप्पा की प्रतिमा स्थापित करते समय भद्रा काल का ध्यान रखना जरूरी है, क्योंकि इस अवधि में स्थापना वर्जित मानी जाती है। 14 सितंबर को शाम 7:22 बजे भद्रा शुरू होने से पहले शुभ मुहूर्त में विधि-विधान और 21 पत्र चढ़ाकर पूजन संपन्न करें।
Ganpati Sthapana Muhurat : भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर घर-घर गणपति बप्पा का आगमन होता है। बप्पा की अगवानी को लेकर हर तरफ उत्साह रहता है, लेकिन शास्त्रों के अनुसार प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा और स्थापना हमेशा शुभ चौघड़िया और योग में ही की जानी चाहिए।
14 सितंबर को गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन विशेष ग्रह-नक्षत्रों का संयोग बन रहा है, मगर शाम के समय भद्रा भी लग रही है। इसलिए प्रतिमा स्थापित करने से पहले समय और सही विधि की जानकारी होना बहुत जरूरी है।
स्थापना से पहले नोट करें भद्रा और शुभ मुहूर्त
चतुर्थी तिथि 14 सितंबर की सुबह 07:08 बजे से शुरू होकर अगले दिन 15 सितंबर को सुबह 07:45 बजे तक रहेगी। इस दौरान अमृत योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का शुभ संयोग भी रहेगा।
खास बात यह है कि 14 सितंबर की शाम 07:22 बजे से भद्रा लग जाएगी, जो अगले दिन सुबह तक प्रभावी रहेगी। भद्रा काल में मांगलिक कार्य या मूर्ति स्थापना करना शुभ नहीं माना जाता।
इसलिए 14 सितंबर को सुबह 07:08 बजे से लेकर शाम 07:22 बजे के बीच ही गणेश जी की स्थापना पूरी कर लें। 10 दिनों का यह महापर्व 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन विसर्जन के साथ पूरा होगा। अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार आप 1, 5 या 10 दिनों के लिए बप्पा को घर में रख सकते हैं।
घर में किस दिशा में रखें गणपति की प्रतिमा?
घर के पूजा स्थल या उत्तर दिशा के साफ स्थान पर स्थापना की तैयारी करें। उस स्थान पर पहले गंगाजल छिड़कें, फिर हल्दी से पवित्र स्वास्तिक बनाएं।
इसके ऊपर पीले रंग का कपड़ा बिछाकर सुंदर आसन तैयार करें। मूर्ति स्थापित करते समय ध्यान रखें कि भगवान गणेश का मुख दक्षिण दिशा की ओर और उनकी पीठ उत्तर दिशा की तरफ रहे। पूजा करते समय आपका मुख उत्तर दिशा की तरफ होना चाहिए।
21 नामों के साथ 21 पत्रों को अर्पित करने का नियम
पुराणों में गणेश चतुर्थी के दिन ‘पत्र पूजा’ का विशेष महत्व बताया गया है। भगवान गणेश के 21 स्वरूपों का ध्यान करते हुए उन्हें 21 अलग-अलग पेड़ों की पत्तियां चढ़ाई जाती हैं। पूजा से पहले ही इन सभी पत्तियों को एकत्र कर लें:
- सुमुखाय नमः बोलकर शमी पत्र अर्पित करें
- गणाधीशाय नमः के साथ माका (भृंगराज) का पत्ता चढ़ाएं
- उमापुत्राय नमः कहकर बेलपत्र अर्पित करें
- गणमुखाय नमः बोलकर हरी दूर्वा चढ़ाएं
- लम्बोदराय नमः के साथ बेर का पत्ता दें
- हरसूनवे नमः बोलकर धतूरे का पत्ता या फल चढ़ाएं
- शूर्पकर्णाय नमः कहकर तुलसी पत्र अर्पित करें (गणेश चतुर्थी के विशेष विधान में)
- वक्रतुण्डाय नमः बोलकर सेम (वरवटी) का पत्ता चढ़ाएं
- गुहाग्रजाय नमः कहकर अपामार्ग (आंधीझाड़ा) का पत्ता दें
- एकदन्ताय नमः बोलकर भटकटैया (रिंगाणी) का पत्ता अर्पित करें
- हेरम्बाय नमः कहकर पलाश का पत्ता चढ़ाएं
- चतुर्होत्रे नमः बोलकर दालचीनी का पत्ता दें
- सर्वेश्वराय नमः कहकर अगस्त्य पत्र अर्पित करें
- विकटाय नमः बोलकर कनेर का पत्ता चढ़ाएं
- इभतुण्डाय नमः कहकर पाषाणभेद (पत्थरचट्टा) का पत्ता अर्पित करें
- विनायकाय नमः बोलकर मदार या कपास का पत्ता चढ़ाएं
- कपिलाय नमः कहकर अर्जुन वृक्ष का पत्ता दें
- कटवे नमः बोलकर देवदारु का पत्ता अर्पित करें
- भालचन्द्राय नमः कहकर मरुवा का पत्ता चढ़ाएं
- सुराग्रजाय नमः बोलकर गांधारी पत्र अर्पित करें
- सिद्धिविनायकाय नमः बोलकर केतकी पत्र चढ़ाएं
भोग और आरती से संपन्न करें पूजा
सभी 21 पत्तियों को अर्पित करने के बाद भगवान को ताजे लाल या पीले फूल चढ़ाएं। इसके बाद बप्पा के प्रिय मोदक या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं।
संख्या अपनी श्रद्धा अनुसार 5, 11 या 21 रख सकते हैं। धूप-दीप जलाकर गणेश जी की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।