GenZ की नाराजगी से खतरे में पड़ेगी मोदी की कुर्सी? C-Voter सर्वे ने खोली युवाओं की सोच, किस मुद्दे पर गुस्सा?

Time Published: Tuesday, August 11, 2026, 19:55 [IST]

भारत की राजनीति में Gen Z अब सिर्फ सोशल मीडिया पर एक्टिव युवा वर्ग नहीं रह गया है। यह ऐसा वोटर ग्रुप बन रहा है, जिसे नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं होगा। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मोदी सरकार के कार्यकाल की वह पहली घटना बनी, जब युवाओं दबाव के आगे किसी मंत्री को कुर्सी छोड़नी पड़ी। इसी बीच C-Voter स्नैप पोल के आंकड़े राजनीतिक दलों के लिए बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। देश के करीब 60% युवाओं का मानना है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी उनकी जरूरतों और चिंताओं को नहीं समझती।

सर्वे में शामिल 18 से 35 साल के लोगों में 58.7% ने कहा कि राजनीतिक पार्टियां Gen Z की चिंताओं को समझ ही नहीं रही हैं। सिर्फ 20.7% लोगों को लगा कि पार्टियां युवाओं की बात समझती हैं। करीब 20.5% लोग इस सवाल पर न्यूट्रल रहे या उन्होंने जवाब नहीं दिया। यह सर्वे करीब 1,270 लोगों के बीच किया गया था।

Gen Z C-Voter Poll

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की अगुआई में जंतर-मंतर, पंजाब और झारखंड में हुए छात्र आंदोलनों के बाद यह सर्वे सामने आया है। 18 से 35 साल के 1,270 युवाओं के बीच किए गए इस पोल से साफ होता है कि देश का यूथ अब राजनीति और मुद्दों को किस नजरिए से देखता है।

यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या युवाओं की यह नाराजगी आने वाले चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और BJP के लिए चुनौती बन सकती है? सर्वे चुनाव का नतीजा नहीं बताता, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि युवा वोटर किन मुद्दों पर सोच रहा है।

BJP समर्थकों में भी उठ रहे सवाल

इस सर्वे की खास बात यह है कि युवाओं की नाराजगी सिर्फ विपक्षी वोटरों तक सीमित नहीं है। NDA समर्थक 54% युवाओं ने भी कहा कि राजनीतिक पार्टियां Gen Z की चिंताओं से कनेक्ट नहीं कर पा रही हैं। सिर्फ 26% NDA समर्थकों ने माना कि पार्टियां युवाओं को समझती हैं।

विपक्ष के समर्थकों में यह आंकड़ा और ऊपर चला गया। करीब 64% विपक्षी समर्थकों ने माना कि राजनीतिक दल युवाओं की सोच से कटे हुए हैं। दूसरी पार्टियों को सपोर्ट करने वाले करीब 58.5% लोगों ने भी यही राय दी। यानी संदेश साफ है। युवा वोटर को सिर्फ पार्टी के नाम से संतुष्ट करना मुश्किल होता जा रहा है।

रोजगार और पढ़ाई सबसे बड़ा मुद्दा

Gen Z आखिर चुनाव में चाहता क्या है? सी-वोटर सर्वे में 53% युवाओं ने रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य को सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बताया। इसके बाद महंगाई 13.1% के साथ दूसरे नंबर पर रही। भ्रष्टाचार को 11.9% लोगों ने सबसे अहम मुद्दा माना।

वहीं बिजली, पानी और सड़क जैसे पुराने चुनावी मुद्दे अभी भी मौजूद हैं। इन्हें 8.2% युवाओं ने प्राथमिकता दी। कानून-व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा 4.8% लोगों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा रही। राष्ट्रीय सुरक्षा को सिर्फ 2.7% युवाओं ने अपनी पहली प्राथमिकता बताया। इसका मतलब यह नहीं कि Gen Z को राष्ट्रवाद या सुरक्षा की चिंता नहीं है। बल्कि आंकड़े बताते हैं कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े सवाल फिलहाल ज्यादा वजन रखते हैं।

नेता नहीं, मुद्दा तय करेगा वोट?

युवाओं के वोटिंग पैटर्न में भी एक बड़ा बदलाव दिखता है। सर्वे में 33.3% युवाओं ने कहा कि उनका वोट मुख्य तौर पर मुद्दों पर तय होगा।

नेता दूसरे नंबर पर रहे। करीब 20% लोगों ने नेतृत्व को वोट का आधार बताया। पार्टी को प्राथमिकता देने वालों की संख्या सिर्फ 13.9% रही।

वहीं महज 7.7% लोगों ने कहा कि उम्मीदवार उनके वोट का सबसे बड़ा आधार होगा। यानी राजनीतिक दलों के लिए चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि वे युवा चेहरों को मैदान में उतारें। असली सवाल है कि वे युवाओं के रोजगार, शिक्षा और परीक्षा से जुड़े सवालों पर क्या ठोस जवाब देते हैं।

सोशल मीडिया असरदार, लेकिन माता-पिता पर सबसे ज्यादा भरोसा

Gen Z की राजनीति को समझना सोशल मीडिया के बिना अधूरा है। सर्वे में 49.3% युवाओं ने माना कि सोशल मीडिया उनकी राजनीतिक सोच को प्रभावित करता है।

लेकिन यहां एक दिलचस्प ट्विस्ट है। जब पूछा गया कि जिंदगी से जुड़े मामलों पर सबसे ज्यादा भरोसा किस पर है, तो 75.1% ने माता-पिता को चुना। दोस्तों पर 6.9% और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स पर 6.8% लोगों ने भरोसा जताया।

Gen Z को चाहिए युवा नेता, लेकिन संसद में युवा कितने?

सर्वे का एक और आंकड़ा राजनीतिक दलों के लिए खासा अहम है। 74.6% युवाओं ने कहा कि अगर पार्टियां युवा उम्मीदवार उतारती हैं तो वे उन्हें वोट देना पसंद करेंगे। लेकिन मौजूदा लोकसभा की तस्वीर इससे काफी अलग है। सांसदों की औसत उम्र करीब 56 साल है और सिर्फ 11% सांसद 40 साल या उससे कम उम्र के हैं। Gen Z सांसदों की संख्या भी सिर्फ तीन बताई गई है। यानी युवा वोटर राजनीति में अपनी उम्र के करीब चेहरे देखना चाहता है।

पढ़ाई-लिखाई भी वोट का फैक्टर

Gen Z के लिए नेता की शैक्षणिक योग्यता भी मायने रखती है। 59.5% युवाओं ने इसे वोट तय करने में बहुत जरूरी बताया। राष्ट्रवाद को भी करीब आधे युवा अहम मानते हैं। 49.5% लोगों ने इसे अपने वोट के लिए महत्वपूर्ण माना। वहीं जाति का असर तुलनात्मक तौर पर कमजोर दिखा। सिर्फ 24.4% युवाओं ने कहा कि वे अपनी जाति के उम्मीदवार को प्राथमिकता देंगे। इसके उलट 48.2% ने कहा कि जाति उनके वोट का आधार नहीं होगी।

छात्र आंदोलनों के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी, वरिष्ठ नेताओं और यहां तक कि उनकी दिवंगत माताजी को लेकर अभद्र भाषा के वीडियो वायरल हुए थे। इस पर सर्वे में पूछा गया कि क्या सोशल मीडिया पर ऐसी भाषा सही है? सर्वे में शामिल 21% लोगों ने कहा कि नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा 'बिल्कुल बर्दाश्त के काबिल नहीं है' और 29.1% ने माना कि 'यह सही नहीं है'।

PM मोदी के लिए असली खतरा क्या है?

तो क्या सिर्फ इस सी-वोटर सर्वे के आधार पर यह कह दिया जाए कि Gen Z की वजह से PM मोदी अगला चुनाव हार जाएंगे? बिल्कुल नहीं। कोई भीस्नैप पोल चुनावी नतीजे की गारंटी नहीं देता। वोटिंग में क्षेत्र, गठबंधन, उम्मीदवार, सरकार का प्रदर्शन, स्थानीय मुद्दे और चुनाव के समय का माहौल जैसे कई फैक्टर काम करते हैं।

लेकिन सर्वे एक साफ संकेत जरूर देता है। युवा वोटर अब सिर्फ बड़े राजनीतिक नैरेटिव से संतुष्ट नहीं है। उसे नौकरी चाहिए। बेहतर शिक्षा चाहिए। स्वास्थ्य और परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा चाहिए। वह सोशल मीडिया पर सवाल पूछता है और राजनीतिक दलों से ज्यादा सीधे जवाब चाहता है।

यही वजह है कि Gen Z को लेकर आने वाले चुनावों में BJP समेत हर पार्टी की रणनीति अहम होगी। युवाओं को कौन सिर्फ वोटर समझता है और कौन उनकी बात सच में समझकर नीति और राजनीति में जगह देता है, यह फर्क चुनावी मैदान में बड़ा बन सकता है।