IIT कैंपस में क्लास बनाम कास्ट! छात्रों के सुसाइड का हल क्या है? साहिल की मौत से उठे सवाल

आईआईटी मुंबई में छात्र सुसाइड पर बवाल.
आज भी IIT देश में इंजीनियरिंग के सबसे प्रीमियर संस्थानों में से हैं. यहां से किसी भी फैकल्टी में डिग्री पाने के लिए छात्रों को लगातार कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है. हर सेमेस्टर में अच्छे प्रदर्शन के लिए होड़ मची रहती है. यहां एक भी नंबर से पिछड़ जाने का मतलब जिंदगी में सदैव लूजर बने रहना. इसलिए यहां पढ़ने वाले छात्र एक-एक नंबर के लिए जी-जान लगा देते हैं. क्योंकि सबको पता है, आईआईटी पास आउट छात्र जीवन की हर परीक्षा में सफल ही रहेगा.
दुनिया की बड़ी से बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों में लाखों-करोड़ों के पैकेज और दुनिया के हर कोने में हर देश आईआईटी से पढ़े छात्रों को लपकने को आतुर रहते हैं. इसलिए जिस किसी भी छात्र को आईआईटी में प्रवेश मिल जाता है, उसका भविष्य स्वतः बन जाता है. और इस भविष्य तथा कैरियर की रेस में कोई भी छात्र पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहता है. उसे बस किसी तरह सफल रहना है.
IIT यानी सफलता की होड़
सफलता की यह रेस उसे जीवन के ऐसे अंधे कुएं में धकेलती है, जहां उसे बस अपना लक्ष्य दिखता है. यदि वह किसी भी सेमेस्टर में चूका तो उसे लगता है, उसका भविष्य चौपट. ऐसा ही कुछ IIT बॉम्बे के सेकंड ईयर के छात्र साहिल वाकोडे के साथ हुआ. दूसरे सेमेस्टर की परीक्षा के दौरान उसे AI की CHAT-GPT की मदद से नकल करते हुए पकड़ा गया तो वह हॉस्टल लौट आया और कुछ देर बाद उसकी लाश हॉस्टल से बाहर लाई गई. सब कुछ इतनी आनन-फानन हुआ कि न तो टीचर कुछ समझ पाये न वहां के छात्र. मामला तब गरमाया जब उस छात्र के पिता ने अपने बच्चे के साथ हुए जाति-गत दुर्भावना का आरोप लगाया. पूरा मामला पलट गया. आईआईटी ने फौरन डीन और प्रोफेसर सूर्य नारायण दुल्ला को पद से निलंबित कर दिया. प्रोफेसर दुल्ला भी ओबीसी बिरादरी से हैं. लेकिन यह एक ऐसा घृणित आरोप है कि प्रोफेसर के साथ खड़े होना भी मुश्किल है.
आईआईटी में जातिगत भेदभाव शर्मनाक
किसी छात्र द्वारा आईआईटी की कठिन परीक्षा से घबरा कर आत्महत्या जैसा कदम उठा लेना और उस छात्र के साथ फैकल्टी द्वारा जाति-गत दुर्भावना रखना दोनों अलग-अलग अपराध हैं. यद्यपि अभी तक यह साबित नहीं हो पाया है कि प्रोफेसर दुल्ला उससे जाति-गत दुर्भावना रखते थे या नहीं. न ही यह पता चल सका है कि दलित बिरादरी से संबद्ध उस छात्र से उसके अन्य सहपाठी कैसा व्यवहार करते थे. यह सब बातें जांच के अधीन हैं. पर अगर ऐसा हुआ है तो आईआईटी जैसे प्रीमियर शिक्षा संस्थानों के लिए यह बेहद शर्मनाक है. कहने को हम आधुनिक समाज के हैं लेकिन जाति-बिरादरी को लेकर बर्बर युग की मान्यताएं पाले हैं. देश में आईआईटी की स्थापनाओं से लेकर आज तक ऐसी सूचनाएं दबे-छुपे आती रही हैं. किंतु ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी छात्र के पैरेंट्स ने यह आरोप खुल कर लगाया है.
विदेशों से फैकल्टी मेंबर आते थे
आजादी के फौरन बाद अपने देश में कुशल इंजीनियर बनाने के लिए आईआईटी खोले जाने का काम शुरू हुआ. पहला आईआईटी 1951 में खड़गपुर (पश्चिम बंगाल) में स्थापित हुआ. इसके बाद बंबई (अब मुंबई), मद्रास, कानपुर और दिल्ली में आईआईटी खोले गए. इसके बाद रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज और BHU से संबद्ध इंजीनियरिग कॉलेज को भी आईआईटी का दर्जा मिल गया. आज की तारीख में देश में 23 आईआईटी हैं. शुरू में तो इन सारी आईआईटी का माहौल अंग्रेजीमय था. अधिकतर में तो फैकल्टी मेंबर भी यूरोप या अमेरिका से आते. क्योंकि ये सभी आईआईटी किसी न किसी विकसित देश की मदद से बनी थीं. सोवियत संघ, अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी की मदद से स्थापित हुई थीं. इसलिए इन IIT में तकनीकी, आर्थिक सहायता भी इन्हीं देशों से मिलती थी. आईआईटी छात्रों को प्रशिक्षण भी इन्हीं देशों की फैकल्टी से होता था.
SC छात्रों की पीड़ा
इन सभी आईआईटी में संविधान की व्याख्या के अंतर्गत SC और ST छात्रों को आरक्षण मिलता था. अधिकांश छात्र समाज के उन्नत वर्गों से आते थे. बड़े-बड़े नौकरशाहों, पुलिस के आला अफसरों, टेक्नोक्रेट्स और उद्यमियों के बच्चे पढ़ते थे. वे सभी अंग्रेजी स्कूलों के पढ़े हुए होते थे. इसलिए उनको विदेशी प्रोफेसरों से कोई परेशानी नहीं होती थी. न क्लास की न कास्ट की न यहां के एलीट माहौल की. मगर जो यहां SC/ST छात्र पढ़ने आते उनके लिए यहां का माहौल दम घोंटू होता. फैकल्टी के प्रोफेसर मान कर चलते कि यहां सभी फर्राटेदार अंग्रेजी समझ लेते हैं, इसलिए किसी भी फैकल्टी मेंबर ने सरल भाषा में तकनीक को समझने का यत्न कभी नहीं किया. वंचित और दलित वर्गों से आए ये छात्र घबरा कर संस्थान छोड़ देते. जो रहते भी उन्हें इतना परिश्रम करना पड़ता जो बहुत अधिक यातना देने वाला था.
1980 में दलित छात्रों द्वारा सुसाइड कर लेने का मामला
1980 का दशक आते-आते देश में आरक्षण की सुविधा पा कर SC और ST वर्गों में से एक ऐसा मध्य वर्ग उभर रहा था, जो विपरीत परिस्थितियों में अपने बच्चों को हर हाल में आईआईटी से पास आउट कराना चाहता था. यह वह दौर था, जिसमें इन वर्गों ने कई छात्रों ने सुसाइड जैसा आत्मघाती कदम उठाया. रुड़की विश्वविद्यालय (तब यह IIT नहीं बना था, लेकिन इंजीनियरिंग का यह अकेला विश्वविद्यालय था, में एक हरिजन (तब दलितों को यही संबोधन था) छात्र ने सुसाइड कर लिया. मैं उस घटना को कवर करने के लिए कानपुर से रुड़की आया था. तब वहां कोई स्टूडेंट यूनियन तो नहीं थी किंतु उनकी एसोसिएशन थीं. उन लोगों ने विश्वविद्यालय प्रबंधन पर तानाशाही बरतने और छात्रों के प्रति निर्मम रहने का आरोप तो लगाया था, किंतु किसी ने भी जाति सूचक शब्दों से छात्र को अपमानित किए जाने की बात नहीं की थी.
अंग्रेजी के माहौल से घबराहट
उसी वर्ष कानपुर आईआईटी में एक दूसरे दलित छात्र ने सुसाइड कर लिया. वहां भी मैं गया तब एक बात अलग बात पता चली कि IIT कानपुर का माहौल विशुद्ध अंग्रेजीमय है. यूं भी कानपुर आईआईटी अमेरिकी सहायता से चल रहा था. और अक्सर कानपुर आईआईटी में प्रशिक्षण देने के लिए फैकल्टी मेंबर अमेरिका से आते. कानपुर आईआईटी में परिसर में उनके लिए अलग हवाई अड्डा बना हुआ था. प्रोफेसर अमेरिका से दिल्ली और वहां से चार्टर्ड प्लेन या हेलीकॉप्टर से सीधे आईआईटी आकर उतरते. जाहिर है, ये प्रोफेसर जो पढ़ाते वह अमरीकन अंग्रेजी में होता. कॉन्वेंट में पढ़े विद्यार्थी तो उनके लेक्चर एब्सॉर्ब कर लेते लेकिन यूपी बोर्ड स्कूलों से पढ़ कर आए छात्रों के लिए यह बहुत कठिन होता. तब आईआईटी में प्रवेश के लिए कोई JEE परीक्षा नहीं देनी होती थी. छात्र बारहवें के नंबरों के आधार पर यहां प्रवेश पा जाता.
सहपाठियों से बतियाने में भी संकोच
उस समय सामान्य वर्गों के छात्रों को भी यहां की अंग्रेजी से पार पाना असंभव होता पर वे किसी तरह डटे रहते और उनका परिवार उनके पीछे सपोर्ट करता. परंतु कठिनाई SC वर्ग से आए छात्रों के समक्ष अधिक आती. क्योंकि ST वर्ग से आया छात्र भी मिशनरी स्कूलों से पढ़ा होता, जहां अंग्रेजी का स्तर बेहतर होता. मगर SC छात्रों के लिए यह वैतरणी पार करनी मुश्किल होती. उस समय के निदेशक, डीन और प्रोफेसर छात्रों के प्रति उनकी जाति को लेकर तो कटु नहीं होते थे और न ही इस आधार पर उन्हें अपमानित करते. लेकिन भाषाई आधार पर इन छात्रों का कदम-कदम पर मजाक उड़ता. इस अपमान से क्षुब्ध होकर ये छात्र सुसाइड कर लेते. उनकी स्थिति बहुत दयनीय होती. क्योंकि न तो वे अपने सहपाठियों से बातचीत करने में सहज हो पाते न फैकल्टी मेंबर्स से. ऐसे में उन्हें सुसाइड ही सूझता.
कानपुर IIT के रजिस्ट्रार गिरिराज किशोर ने इस पीड़ा को समझा
उस समय कानपुर आईआईटी में निदेशक थे डॉ. ए भट्टाचार्य और कुल सचिव थे गिरिराज किशोर. गिरिराज किशोर चूंकि हिंदी के बड़े लेखक थे, उनके उपन्यास और कहानियां छपते रहते इसलिए वे भी इस प्रीमियर संस्थान में सदैव हीन समझे जाते. वे खुद निदेशक की अंग्रेजी के प्रति हठधर्मी के शिकार थे परंतु उनकी एक न चलती. तब तक गिरिराज किशोर का इंद्र सुनें उपन्यास बहुत चर्चित था. इस हरिजन छात्र द्वारा आत्महत्या कर लेने के बाद उन्होंने ‘परिशिष्ट’ नाम से एक उपन्यास लिखा. यह उपन्यास 1984 में आया था. इसमें आईआईटी के हरिजन छात्रों की पीड़ा को बहुत ही मार्मिक तरीके से लिखा गया था. लेकिन किसी छात्र के साथ जातिगत दुर्भावना की बात उन्होंने नहीं लिखी. लेकिन यह 46 वर्ष पुरानी बात है. अब तो SC/ST वर्गों से आए छात्र पहले की तरह घुट-घुट कर रहने वाले लोग नहीं हैं न उनका परिवार चुप रह सकता है.
क्लास बनाम कास्ट
यही वजह है कि 18 सितंबर को मुंबई आईआईटी में हुई साहिल वाकोडे के सुसाइड का मामला अब क्लास और कास्ट का बन गया है. साहिल वाकोडे के पिता ने इस घटना के विरोध में आवाज उठाई है. हालांकि अभी कुछ लोग कह रहे हैं कि जातिगत दुर्भावना का आरोप झूठा है. यूं आरोपित प्रोफेसर भी OBC समुदाय से है इसलिए वह ऐसा क्यों करेगा? किंतु जातिगत श्रेष्ठता का भाव एक ऐसा घातक मनोविज्ञान है, जो सदैव दुतरफा वार करता है. सच-झूठ तो जांच के बाद ही पता चलेगा. आईआईटी मुंबई की फैकल्टी प्रोफेसर दुल्ला के साथ एकजुट है. छात्र आईआईटी की अन्य नाकामियों को लेकर आंदोलित हैं.

शंभूनाथ शुक्ल
शंभूनाथ शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार हैं. 1974-75 के छात्र आंदोलन के दौरान वे B.Sc. कर रहे थे किंतु पढ़ाई अधूरी छोड़ कर वे कलकत्ता चले गए. तब वहां सिद्धार्थ शंकर रॉय की सरकार आंदोलन कर रहे छात्रों पर गोलियाँ चलवा रही थी. श्री शुक्ल किसी तरह वहां से कानपुर आ गए और आईआईटी में वामपंथी छात्रों के साथ रह कर मार्क्स, एंजेल्स और लेनिन को पढ़ा. सोवियत (रूसी) और चीनी कम्युनिस्ट साहित्य की खूब पढ़ाई शुरू की. यूरोप और अमेरिका का इतिहास पढ़ा. देश और विदेश को समझने की नई दृष्टि उन्हें मिली. आईआईटी और मेडिकल छात्रों के साथ रहने से अंग्रेजी से अनुवाद में पारंगत हुए. देश में युवाओं, किसानों और दलित व पिछड़ी जातियों की पीड़ा को उन्होंने गहराई से समझा. यहीं से लेखन उनकी प्रेरणा बना क्योंकि लेखों के ज़रिए ही वे अपनी इस दृष्टि का विस्तार कर सकते थे. कोलकाता से प्रकाशित होने वाली आनंद बाज़ार पत्रिका समूह की साप्ताहिक पत्रिका ‘रविवार’ ने उनकी एक स्टोरी को कवर स्टोरी बना कर छापा- ‘अर्जक संघ; उत्तर प्रदेश का डीएमके’ यह स्टोरी बहुत चर्चित हुई और वे सक्रिय रूप से पत्रकारिता में आ गए. कानपुर में ही दैनिक जागरण ने उन्हें अपने स्टाफ में रख लिया और कुछ सीरियस विषयों पर उनसे खोजपूर्ण काम करवाए. उन दिनों आईआईटी में कई दलित छात्र अंग्रेजी के भय से सुसाइड कर लेते थे, उस पर उन्होंने इन एलीट संस्थानों के भीतर हरिजन (अब दलित) छात्रों की पीड़ा को तह तक जा कर उजागर किया. भागलपुर के आंख फोड़ो कांड की रिपोर्ट के लिए उन्हें वहां भेजा गया. उस कांड को तब तक विस्तार के साथ अरुण शौरी ने इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्ट लिखी थी. शुक्ल जी श्री शौरी से वहां मिले और दैनिक जागरण के लिए इस कांड की ज़मीनी रिपोर्टिंग की. 1983 में जब जनसत्ता निकला तब संपादक प्रभाष जी की शुरुआती टीम में शंभूनाथ शुक्ल भी थे. बाद में वे जनसत्ता के चंडीगढ़ और कोलकाता संस्करणों के संपादक बनाये गये. 2003 में अमर उजाला के कानपुर संस्करण का कामकाज संभाला और फिर दिल्ली, लखनऊ और मेरठ में अमर उजाला में कार्यकारी संपादक रहे. फ़िलहाल वे फ्री लांसिंग कर रहे हैं. पिछले कई वर्षों से वे TV 9 डिजिटल में लेख भी लिख रहे हैं. राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, दर्शन और समाज शास्त्रीय विश्लेषण में उनकी गहन रुचि है.
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