सनी देओल-अक्षय खन्ना की Ikka का असल मुद्दा क्या है? दर्शकों तक क्यों नहीं पहुंचा इसका मैसेज

इक्का में सनी देओल, अक्षय खन्ना और दीया मिर्जा
सनी देओल और अक्षय खन्ना जैसे सुपरस्टार्स अगर ओटीटी पर डेब्यू करें तो सुर्खियां बनती है. दर्शकों की अपेक्षाओं का अनुमान लगाया जा सकता हैं. दोनों एक्टर बॉक्स ऑफिस पर गदर मचाने वाले रहे हैं. सनी देओल वकील किरदार में पहले भी दमदार भूमिका निभा चुके हैं तो गदर फिल्म में तारा सिंह बनकर जबरदस्त थ्रिल पैदा कर चुके हैं. जाट की जंग ने जबरदस्त माहौल बनाया. वहीं अक्षय खन्ना औरंगजेब और रहमान डकैत बनकर बॉक्स ऑफिस पर लोकप्रियता लूट चुके हैं. दोनों कलाकार आज से उन्तीस साल पहले बॉर्डर में साथ-साथ दिखे थे. कुल मिलाकर डायरेक्टर सिद्धार्थ पी. मलहोत्रा ने कास्टिंग की कैमेस्ट्री ही कुछ ऐसी बनाई थी जिसकी रिलीज से पहले चर्चा होनी ही थी. फिल्म से उम्मीद सबको कुछ ज्यादा ही थी.
लेकिन क्या इस हाइप के आगे फिल्म के असल मुद्दे पर भी सबका ध्यान गया? शायद नहीं. हमने इस फिल्म के अंदर सिल्वर स्क्रीन पर ढाई किलो का मुक्का बरसाने वाले, गला फाड़कर संवाद बोलने वाले सनी देओल को खोजा तो कसाईनुमा मौत देने वाले रहमान डकैत के रूप में अक्षय खन्ना की क्रूरता को. कोई हैरत नहीं कि इस मोर्चे पर ज्यादातर दर्शकों को निराशा हाथ लगी. यह भूल ही गए कि इक्का थिएट्रिकल नहीं बल्कि ओटीटी मूवी है. दोनों प्लेटफॉर्म की फिल्मों की कास्टिंग और बजट में फर्क होता है. स्क्रिप्ट और एक्शन में अंतर होता है. इक्का में बमुश्किल आधा दर्जन किरदार हैं. सनी देओल या अक्षय खन्ना की किस थिएट्रिकल मूवी में इतनी छोटी स्टार कास्ट है?
ओटीटी का टिपिकल क्राइम ड्रामा
इक्का की कहानी और सनी देओल के किरदार के संवादों में इस फिल्म का असल मुद्दा छिपा है. बेशक फिल्म की कहानी प्रिडेक्टेबल है, और अंतिम भाग ओटीटी के किसी टिपिकल क्राइम ड्रामा की भेंट चढ़ जाता है. लेकिन इससे फिल्म का असल मुद्दा प्रभावित नहीं होता. फिल्म के अंदर हम सनी और अक्षय की टिपिकल इमेज की तलाश में इस गंभीर मुद्दे को ओझल कर देते हैं.
सबसे पहले कहानी को समझते हैं. फिल्म में सबसे पहले दिखाया जाता है कि आधी रात के वक्त एक कार से खून से लथपथ सोमा मित्तल नाम की एक युवती को सड़क के बीचों बीच धकेल कर गिरा दिया जाता है. बाद में पता चलता है कि वह कार अक्षय खन्ना चला रहे थे. जो कि जाने माने राजनेता के बेटे शौर्यमान गौड़ के रोल में हैं. अब उसे बचाने के लिए शहर के सबसे बड़े वकील अर्जुन मेहरा को हायर किया जाता है. अर्जुन मेहरा को इक्का इसलिए कहा जाता है वह आज तक कोई केस हारे नहीं. अर्जुन पहले तो वह केस नहीं लेना चाहता क्योंकि उसका उसूल कहता है कि कानून पीड़ितों की सहायता के लिए बनाया गया है न कि आरोपी को बचाने के लिए.
सनी के एक डायलॉग में फिल्म का सार
कहानी में तब मोड़ आता है जब सनी देओल और दीया मिर्जा की मासूम बेटी के बारे में पता चलता है कि उसे कैंसर है. इसके बाद जरूरतमंद अर्जुन मेहरा शौर्यमान गौड़ का केस लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं. अर्जुन मेहरा यह केस भले ही लड़ रहे हैं लेकिन उसका ज़मीर शौर्यमान गौड़ का साथ देने के लिए तैयार है. कहानी में इसके आगे क्या क्या होता है अर्जुन मेहरा क्या इस केस को लड़ते हैं या फिर शौर्यमान गौड़ को कोर्ट से सजा होती है या नहीं-ये जानने के लिए नेटफ्लिक्स पर यह फिल्म देखें. लेकिन इस दौरान अर्जुन मेहरा के रोल में सनी देओल का एक डायलॉग पूरी फिल्म का सार है.
एक सीन में कोर्ट में बहस के दौरान जब सनी देओल देखते हैं कि अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रही सोमा मित्तल के चरित्र से जुड़े सवाल किए जाते हैं तब वहीं मौजूद पीड़िता की मां को शर्मिंदा होना पड़ता है. सनी इस सीन के पूरे हालात से बहुत दुखी होते हैं और घर आकर उनकी पत्नी बनीं दीया मिर्जा से कहते हैं- “मैं अपनी बेटी की खातिर दूसरों की बेटी के चरित्र की इस तरह सार्वजनिक तौर पर हत्या होते नहीं देख सकता. जैसे मेरी बेटी है और उसी तरह से दूसरों की भी बेटी हैं. आज कोर्ट में मैंने एक मां को शर्मिंदा होते हुए देखा है.”
अपनी बेटी जैसी दूसरों की भी बेटी
सिल्वर स्क्रीन पर सनी देओल को हम जिस प्रकार के किरदारों के लिए जानते हैं, इक्का में उनका किरदार इसके ठीक उलट है. इक्का में ना तो सनी देओल थ्रिल पैदा करते हैं और ना ही अक्षय खन्ना दहशत पैदा करते हैं. लोगों ने इसे तारा सिंह बनाम रहमान डकैत का अनुमान बेकार ही लगा लिया था. इक्का में वैसा कुछ भी नहीं. सनी देओल यहां एक बेहद संवेदनशील किरदार में हैं. ऊपर लिखे संवाद के दौरान सनी के चेहरे पर ग्लानि और असमंजस का गहरा भाव महसूस किया जा सकता है. सनी को लेकर अगर हम पूर्वग्रह से मुक्त होकर देखें तो ऐसे सीन में वह बहुत गंभीर असर डालते हैं.
अपनी बेटी जैसी दूसरों की बेटी को भी समझना और उसका मान रखना ही इस फिल्म का असल मुद्दा है जिसका मैसेज हाई प्रोफाइल स्टार कास्ट के टिपिकल क्राइम ड्रामा होने की वजह से दर्शकों तक ठीक से पहुंच नहीं सका. फिल्म में दीया मिर्जा के अलावा जिस एक किरदार ने सबसे अधिक चौंकाया है. वह है तिलोत्तमा शोम, जिन्होंने पीड़िता सोमा मित्तल की वकील का किरदार निभाया है. सनी देओल जैसे बड़े एक्टर के सामने मधुरा बनर्जी के रोल में तिलोत्तमा जरा भी हल्की नहीं पड़ी. वह सनी की शख्सियत के मुकाबले बहुत कमजोर है लेकिन अभिनय के मोर्चे पर बहुत नेचुरल लगी हैं.
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संजीव श्रीवास्तव
संजीव श्रीवास्तव का पैतृक गांव-घर बिहार के सीतामढ़ी में है लेकिन पिछले करीब ढाई दशक से दिल्ली से लेकर मुंबई तक मीडिया की मुख्यधारा में सक्रिय हैं. ब्रेकिंग न्यूज़ से लेकर क्रिएटिव राइटिंग तक का हुनर रखते हैं, देश-विदेश की राजनीति, फिल्म, लिटरेचर, क्राइम जैसे विषयों पर बेबाकी से लिखते हैं. आसानी से समझ आने वाली और सोचने-विचारने वाली भाषा लिखना पसंद है. सिनेमा प्रिय विषय है- लिहाजा फिल्मों पर अब तक तीन किताबें, दो उपन्यास और कुछ पटकथा-संवाद भी लिख चुके हैं. कुछेक प्रिंट मीडिया में सब एडिटरी के बाद साल 2000 से टीवी न्यूज़ की दुनिया में प्रवेश. सबसे पहले जैन टीवी फिर सहारा समय में करीब 14 साल गुजारा, जहां प्राइम टाइम स्पेशल शोज/प्रोग्राम बनाने से लेकर मुंबई की एंटरटेंमेंट फील्ड में रिपोर्टिंग तक की. उसके बाद सूर्या समाचार, एबीपी न्यूज़ और न्यूज़ इंडिया के आउटपुट होते हुए अब डिजिटल मीडिया में TV9 से सम्बद्ध.
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