मेघालय हिंसा के बाद ILP की क्यों हो रही मांग, जानें क्या है इनर लाइन परमिट?

शिलॉन्ग में हालिया हिंसा के बाद मेघालय में इनर लाइन परमिट (ILP) की मांग एक बार फिर चर्चा में है. 19 अगस्त को खासी स्टूडेंट्स यूनियन (KSU) की ब्लैक-फ्लैग बाइक रैली के दौरान हालात बेहद खराब गए थे. तोड़फोड़ और आगजनी के बाद पुलिस ने KSU के अध्यक्ष समेत तीन नेताओं को गिरफ्तार किया गया था. इसके बाद असम-मेघालय सीमा पर भी तनाव देखने को मिला और पर्यटकों की आवाजाही प्रभावित हुई. राज्य सरकार ने यात्रियों की मदद के लिए हेल्पलाइन भी शुरू की है.

इस पूरे विवाद के केंद्र में मेघालय में इनर लाइन परमिट (ILP) लागू करने की मांग है. KSU और अन्य संगठनों का लंबे समय से तर्क रहा है कि बाहरी लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए राज्य में ILP व्यवस्था जरूरी है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इनर लाइन परमिट क्या है, मेघालय में इसे लागू करने की मांग क्यों उठ रही है और इस व्यवस्था को लेकर विवाद की असली वजह क्या है?

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क्या है इनर लाइन परमिट?

इनर लाइन परमिट यानी ILP एक विशेष सरकारी अनुमति है, जिसके तहत दूसरे राज्यों के भारतीय नागरिकों को कुछ संरक्षित पूर्वोत्तर राज्यों में प्रवेश और सीमित अवधि तक रहने के लिए परमिट लेना पड़ता है. फिलहाल अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम और मणिपुर में यह व्यवस्था लागू है. इसका उद्देश्य स्थानीय जनजातीय समुदायों की संस्कृति, जमीन और पहचान की सुरक्षा के साथ बाहरी लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करना है. मेघालय में ILP की मांग नई नहीं है. खासी और दूसरे आदिवासी संगठन लंबे समय से इसे लागू करने की मांग करते रहे हैं. उनका तर्क है कि अनियंत्रित बाहरी आबादी से स्थानीय रोजगार, जमीन और सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान पर दबाव बढ़ता है.

मेघालय में क्यों उठ रही ILP की मांग?

मेघालय में अभी दूसरे राज्यों की तरह औपचारिक ILP व्यवस्था लागू नहीं हुई है. हालांकि राज्य सरकार ILP जैसी अनिवार्य पर्यटक पंजीकरण और सत्यापन व्यवस्था शुरू करने की तैयारी कर रही है. पर्यटन मंत्री टिमोथी डी. शिरा के मुताबिक, इसके तहत राज्य में प्रवेश करने वाले लोगों की पहचान, दस्तावेज और यात्रा के उद्देश्य की जांच की जाएगी.

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बता दें कि पहला पंजीकरण केंद्र री-भोई जिले के उमलिंग में बनाया जा रहा है. आगे गारो हिल्स समेत अन्य हिस्सों में भी ऐसे केंद्र स्थापित किए जाने की योजना है. इसका मकसद राज्य में आने वाले लोगों का रिकॉर्ड तैयार करना, सुरक्षा बढ़ाना और पर्यटकों की आवाजाही पर बेहतर निगरानी रखना है.

पर्यटकों को क्या करना होगा?

नई व्यवस्था लागू होने पर यात्रियों को निर्धारित केंद्र पर पहचान संबंधी दस्तावेज और यात्रा का उद्देश्य बताकर पंजीकरण कराना पड़ सकता है. हालांकि अंतिम प्रक्रिया, ऑनलाइन पंजीकरण और किन लोगों को छूट मिलेगी, इसकी विस्तृत आधिकारिक अधिसूचना का इंतजार है. इसलिए फिलहाल इसे पारंपरिक ILP समझना सही नहीं होगा. इस बीच, हिंसा और सीमा तनाव को देखते हुए शिलॉन्ग या मेघालय की यात्रा करने वालों को स्थानीय प्रशासन की ताजा एडवाइजरी देखकर ही यात्रा की योजना बनाने की सलाह दी गई है.

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KSU की मुख्य मांगें क्या हैं?

शिलॉन्ग में बाइक रैली का ऐलान KSU के महासचिव रुएबैन नजीयार ने एक जनसभा के दौरान किया था. इस दौरान संगठन ने राज्य सरकार के सामने पांच सूत्रीय मांगें रखीं.

  • श्री सीमेंट प्रोजेक्ट की जनसुनवाई रद्द करने की मांग
  • MRSSA लागू करने की मांग
  • सरकारी भर्ती प्रक्रिया में सुधार
  • NEIGRIHMS में स्थानीय युवाओं के लिए आरक्षण
  • ILP लागू करने और यूरेनियम खनन का विरोध

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KSU क्या है?

साल 1978 में खासी स्टूडेंट्स यूनियन (KSU) मेघालय की स्थापना हुई थी. ये एक प्रमुख स्वदेशी छात्र संगठन है, जो खुद को खासी समुदाय के अधिकारों और हितों का संरक्षक बताता है. हालांकि, संगठन कई बार राज्य में बाहर से आने वाले लोगों के प्रति अपने आक्रामक रुख को लेकर विवादों में रहा है.

KSU नेपाल, बांग्लादेश और भारत के अन्य हिस्सों से मेघालय में होने वाले माइग्रेशन का विरोध करता रहा है. संगठन का तर्क है कि 1970 के दशक से जारी माइग्रेशन के कारण राज्य के स्वदेशी समुदायों की पहचान, संस्कृति और अस्तित्व पर खतरा बढ़ रहा है. हाल के दिनों में KSU उस समय भी चर्चा में आया, जब उसने भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के सभी छह छंदों को अपनाने का विरोध किया. इस मुद्दे को लेकर राज्य में राजनीतिक और सामाजिक विवाद भी देखने को मिला. वहीं, जुलाई में संगठन ने न्यू शिलोंग टाउनशिप के मावडियांगडियांग इलाके में सीबीआई कार्यालय परिसर में बन रहे एक मंदिर पर ताला लगा दिया था. इस घटना के बाद भी KSU सुर्खियों में रहा और संगठन की भूमिका को लेकर सवाल उठे.

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