कौन थे सुदिव्य कुमार सोनू? चुनाव से लेकर छात्र आंदोलन तक, हर मोर्चे पर JMM के लिए बने 'संकटमोचक'

रांची. झामुमो नेता और राज्य सरकार में मंत्री रहे सुदिव्य कुमार के निधन से पार्टी ने एक ऐसे नेता को खो दिया, जिनकी राजनीतिक भूमिका उनके मंत्री पद से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण थी. 56 वर्षीय सुदिव्य कुमार गिरिडीह से दो बार विधायक रहे थे. सरकार में उनके पास तकनीकी एवं उच्च शिक्षा, शहरी विकास, पर्यटन और खेल एवं युवा मामलों जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी थी.

संकट में संभालते थे पार्टी की कमान

सुदिव्य कुमार के परिवार में पत्नी श्वेता शर्मा, दो बेटियां और एक बेटा है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के भरोसेमंद सहयोगियों में शामिल सुदिव्य कुमार झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के उन नेताओं में गिने जाते थे, जो मुश्किल समय में आगे बढ़कर पार्टी का मोर्चा संभालते थे.

हेमंत सोरेन के लिए बड़े भाई जैसे

सुदिव्य कुमार और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के बीच बेहद भरोसे का रिश्ता था. सुदिव्य कुमार को हेमंत सोरेन के लिए बड़े भाई की तरह माना जाता था. जनवरी 2024 में कथित भूमि घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने हेमंत सोरेन को गिरफ्तार किया था. इसके बाद झामुमो के सामने राजनीतिक और संगठनात्मक स्तर पर बड़ी चुनौती खड़ी हो गयी थी.

इस मुश्किल दौर में सुदिव्य कुमार ने पार्टी के भीतर समन्वय बनाए रखने और कार्यकर्ताओं के बीच नेतृत्व का भरोसा कायम रखने में अहम भूमिका निभायी. वह लगातार पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ संपर्क में रहे.

कल्पना सोरेन के चुनाव अभियान की संभाली कमान

हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के कुछ समय बाद सुदिव्य कुमार को एक और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गयी. गांडेय विधानसभा उपचुनाव में झामुमो के चुनाव अभियान की कमान उन्हें सौंपी गयी. यह चुनाव कल्पना सोरेन का पहला चुनाव था. सुदिव्य कुमार ने पार्टी की मुख्य चुनाव अभियान समिति का नेतृत्व किया और चुनावी रणनीति तैयार करने में केंद्रीय भूमिका निभायी. जून 2024 में कल्पना सोरेन की जीत से झामुमो को महत्वपूर्ण राजनीतिक बढ़त मिली. इसके साथ ही कल्पना सोरेन पार्टी के प्रमुख चुनावी चेहरों में शामिल हो गयीं.

बिहार विधानसभा चुनाव में सीट बंटवारे की बातचीत में प्रमुख वार्ताकार

2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के साथ सीट बंटवारे को लेकर हुई बातचीत में भी सुदिव्य कुमार झामुमो के प्रमुख वार्ताकारों में शामिल रहे. उनकी भूमिका केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं थी. वह पार्टी संगठन और सरकार के बीच महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम करते थे. चुनावी रणनीति, राजनीतिक बातचीत और संवेदनशील मामलों में पार्टी नेतृत्व उन पर भरोसा करता था. यही वजह थी कि मुश्किल परिस्थितियों में उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जाती थीं.

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छात्र आंदोलन में भी संभाला मोर्चा

सुदिव्य कुमार की संकट से निपटने की क्षमता हालिया छात्र आंदोलन के दौरान भी सामने आयी. परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर नौकरी के इच्छुक अभ्यर्थियों के आंदोलन के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक मंत्रिमंडलीय समिति का गठन किया था. इस समिति की अध्यक्षता सुदिव्य कुमार को सौंपी गयी थी. उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ कई दौर की बातचीत की और आंदोलन को लेकर बने गतिरोध को खत्म करने का प्रयास किया.

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भरोसेमंद संकटमोचक खो दिया

सुदिव्य कुमार की पहचान ऐसे नेता के रूप में थी, जो पार्टी और सरकार के सामने मुश्किल परिस्थितियां आने पर जिम्मेदारी संभालने से पीछे नहीं हटते थे. उनके आकस्मिक निधन से झामुमो ने एक अनुभवी नेता और भरोसेमंद संकटमोचक खो दिया है.